नेतृत्व कोई पद नहीं, बल्कि कर्म है, शासन करने का विशेषाधिकार नहीं, बल्कि सेवा करने की ज़िम्मेदारी है, पूर्वाग्रह वही देखता है जो वह देखना चाहता है, जबकि विवेक वही देखता है जो वास्तव में विद्यमान है, पद की चकाचौंध बनाम सेवा का संकल्प
नेतृत्व कोई पद नहीं, बल्कि कर्म है, शासन करने का विशेषाधिकार नहीं, बल्कि सेवा करने की ज़िम्मेदारी है, पूर्वाग्रह वही देखता है जो वह देखना चाहता है, जबकि विवेक वही देखता है जो वास्तव में विद्यमान है, पद की चकाचौंध बनाम सेवा का संकल्प कटनी | आज के दौर में जब सत्ता और रसूख को ही सफलता का अंतिम पैमाना मान लिया गया है, तब नेतृत्व की मूल परिभाषा कहीं धुंधली पड़ती जा रही है। हमें यह याद दिलाने की सख्त जरूरत है कि नेतृत्व कोई पद नहीं, बल्कि कर्म है, यह शासन करने का विशेषाधिकार नहीं, बल्कि सेवा करने की ज़िम्मेदारी है। इतिहास गवाह है कि कुर्सियों पर बैठने वाले तो कई आए और गए, लेकिन इतिहास में दर्ज सिर्फ वही हुए जिन्होंने अपने पद को 'अधिकार' नहीं, बल्कि 'कर्तव्य' समझा। *विशेषाधिकार का भ्रम और सेवा का मार्ग* अक्सर देखा जाता है कि किसी ऊंचे पद पर बैठते ही व्यक्ति एक खास तरह के विशेषाधिकार बोध से घिर जाता है। उसे लगता है कि नियम दूसरों के लिए हैं और व्यवस्था उसकी सेवा के लिए। लेकिन वास्तविक नेतृत्व इसके ठीक उलट होता है। एक सच्चा नेता व्यवस्था की सेवा करता है, न कि व्यवस्था से अपनी से...