क्या जरूरत थी दीपक जलवाने की प्रकाश इतना हुआ कि वोट चोरी दिख गई कटनी | किसी भी लोकतांत्रिक देश में चुनाव केवल एक तकनीकी प्रक्रिया या पांच साल में एक बार होने वाला प्रशासनिक आयोजन नहीं होते। चुनाव वास्तव में उस राष्ट्र की आत्मा और उसकी जनता के सामूहिक विश्वास का प्रकटीकरण होते हैं। जब मतदाता पोलिंग बूथ पर जाकर ईवीएम का बटन दबाता है या मतपत्र पर मुहर लगाता है, तो वह केवल एक उम्मीदवार का चुनाव नहीं कर रहा होता, बल्कि वह देश के संविधान और पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपनी निष्ठा को दर्ज कर रहा होता है। परंतु, समकालीन राजनीतिक विमर्श में पिछले कुछ वर्षों से इस भरोसे पर दरारें साफ दिखाई देने लगी हैं। व्यवस्था द्वारा चुनाव को पूरी तरह त्रुटिहीन और पारदर्शी बनाने के लिए नित नए प्रयोग किए जाते हैं कभी नई तकनीक का समावेश, कभी सख्त नियमों का पहरा तो कभी विशेष कैमरे और लाइव मॉनिटरिंग। विडंबना देखिए कि जिसे व्यवस्था की 'अतिरिक्त रोशनी' या 'दीपक' कहा जाता है, कई बार वही प्रकाश उस जगह को चमका देता है जिसे छिपाने की कोशिश की जा रही थी। यह तंज इसी प्रशासनिक अति-उत्साह या तकनीकी चूक ...