समय की अदालत में सब बराबर, मिट्टी का हिसाब होगा तो मालिक भी किरायेदार निकलेंगे कटनी | इंसानी सभ्यता का इतिहास अगर उठाकर देखा जाए, तो यह मूल रूप से दो चीज़ों के इर्द-गिर्द घूमता है ज़मीन और ज़मीर। इतिहास गवाह है कि साम्राज्यों के उदय और पतन की मुख्य वजह ज़मीन के एक टुकड़े पर अपना एकाधिकार ज़ाहिर करना रही है। लेकिन इस भागदौड़, युद्धों, और कागज़ी दस्तावेज़ों के बीच इंसान एक बुनियादी सत्य भूल जाता है कि जिस ज़मीन को वह अपनी जागीर समझ रहा है, वह असल में महज़ एक पड़ाव है। एक पुरानी और बेहद मशहूर दार्शनिक पंक्ति है: "जिस दिन मिट्टी से हिसाब होगा, ज़मीन के मालिक भी किरायेदार निकलेंगे।" यह पंक्ति महज़ कुछ शब्दों का मेल नहीं है, बल्कि यह मानव अस्तित्व, उसके अहंकार और प्रकृति के अंतिम न्याय पर एक ऐसा तीखा कटाक्ष है, जो हर दौर में प्रासंगिक रहता है। *अहंकार का दस्तावेज़ और प्रकृति का कानून* आधुनिक समाज में किसी व्यक्ति की सफलता का पैमाना इस बात से तय होता है कि उसके पास कितनी अचल संपत्ति है। दिल्ली, मुंबई, न्यूयॉर्क या लंदन जैसे महानगरों में ज़मीन के एक छोटे से टुकड़े की कीमत करोड़ों-अ...