नेतृत्व कोई पद नहीं, बल्कि कर्म है, शासन करने का विशेषाधिकार नहीं, बल्कि सेवा करने की ज़िम्मेदारी है, पूर्वाग्रह वही देखता है जो वह देखना चाहता है, जबकि विवेक वही देखता है जो वास्तव में विद्यमान है, पद की चकाचौंध बनाम सेवा का संकल्प
नेतृत्व कोई पद नहीं, बल्कि कर्म है, शासन करने का विशेषाधिकार नहीं, बल्कि सेवा करने की ज़िम्मेदारी है, पूर्वाग्रह वही देखता है जो वह देखना चाहता है, जबकि विवेक वही देखता है जो वास्तव में विद्यमान है, पद की चकाचौंध बनाम सेवा का संकल्प
कटनी | आज के दौर में जब सत्ता और रसूख को ही सफलता का अंतिम पैमाना मान लिया गया है, तब नेतृत्व की मूल परिभाषा कहीं धुंधली पड़ती जा रही है। हमें यह याद दिलाने की सख्त जरूरत है कि नेतृत्व कोई पद नहीं, बल्कि कर्म है, यह शासन करने का विशेषाधिकार नहीं, बल्कि सेवा करने की ज़िम्मेदारी है। इतिहास गवाह है कि कुर्सियों पर बैठने वाले तो कई आए और गए, लेकिन इतिहास में दर्ज सिर्फ वही हुए जिन्होंने अपने पद को 'अधिकार' नहीं, बल्कि 'कर्तव्य' समझा।
*विशेषाधिकार का भ्रम और सेवा का मार्ग*
अक्सर देखा जाता है कि किसी ऊंचे पद पर बैठते ही व्यक्ति एक खास तरह के विशेषाधिकार बोध से घिर जाता है। उसे लगता है कि नियम दूसरों के लिए हैं और व्यवस्था उसकी सेवा के लिए। लेकिन वास्तविक नेतृत्व इसके ठीक उलट होता है। एक सच्चा नेता व्यवस्था की सेवा करता है, न कि व्यवस्था से अपनी सेवा करवाता है। असली नेतृत्व वह नहीं है जो दूसरों पर हुक्म चलाए, बल्कि वह है जो दूसरों को ऊपर उठाने के लिए खुद को झोंक दे। पद तो सिर्फ एक माध्यम है, असली परीक्षा तो उस पद पर रहकर किए गए 'कर्म' की होती है।
*पूर्वाग्रह का चश्मा बनाम विवेक का दर्पण*
आज हमारे सामाजिक और राजनैतिक परिदृश्य में एक और बड़ी चुनौती है वैचारिक संकीर्णता । लेख की यह पंक्ति आज के माहौल पर सटीक बैठती है पूर्वाग्रह वही देखता है जो वह देखना चाहता है, जबकि विवेक वही देखता है जो वास्तव में विद्यमान है। जब हम पहले से ही किसी के प्रति धारणा बना लेते हैं, तो हमारी आँखें सच को देखने से इनकार कर देती हैं। पूर्वाग्रह से ग्रसित नेतृत्व हमेशा समाज को 'हम' और 'वे' में बांटकर देखता है।यह केवल अपनी सहूलियत का सच चुनता है। विवेक हमें निष्पक्ष बनाता है। एक विवेकी नेता या नागरिक परिस्थितियों को बिना किसी चश्मे के, उनके वास्तविक स्वरूप में देखता है।वह समस्याओं की जड़ों को पहचानता है और बिना किसी भेदभाव के उनका समाधान ढूंढता है।
*समय की मांग वैचारिक बदलाव*
यदि हमें एक प्रगतिशील समाज और राष्ट्र का निर्माण करना है, तो हमें नेतृत्व के प्रति अपने दृष्टिकोण को बदलना होगा। हमें ऐसे नेतृत्व की आवश्यकता है जो पूर्वाग्रहों से मुक्त हो, जिसके पास दूरदर्शिता का विवेक हो और जो पद के अहंकार से दूर रहकर सेवा भाव को सर्वोपरि रखे। चाहे राजनीति हो, प्रशासन हो या कॉर्पोरेट जगत जब तक हम पद को 'विशेषाधिकार' मानते रहेंगे, तब तक शोषण और असंतोष पनपता रहेगा । जिस दिन हम इसे 'ज़िम्मेदारी' मान लेंगे, उसी दिन से बदलाव की एक नई सुबह की शुरुआत होगी ।

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