*चमत्कारों की जीवंत स्थली ढीमरखेड़ा बस स्टैंड स्थित बड़ी माता मंदिर, जहाँ आज भी गूँजती है आदिशक्ति के घुँघरुओं की झंकार* *शर्मा परिवार की पीढ़ियों से चली आ रही सेवा-पूजा, नवरात्रि में जवारे और महाआरती का विशेष आयोजन मंदिर से जुड़ी चमत्कारों की जनश्रुतियाँ आज भी क्षेत्र में चर्चित, जो नागपुर से हुए ईलाज के दौरान वापस डॉक्टरों ने कर दिया मना उसको भगवती ने किया ठीक*
*चमत्कारों की जीवंत स्थली ढीमरखेड़ा बस स्टैंड स्थित बड़ी माता मंदिर, जहाँ आज भी गूँजती है आदिशक्ति के घुँघरुओं की झंकार*
*शर्मा परिवार की पीढ़ियों से चली आ रही सेवा-पूजा, नवरात्रि में जवारे और महाआरती का विशेष आयोजन मंदिर से जुड़ी चमत्कारों की जनश्रुतियाँ आज भी क्षेत्र में चर्चित, जो नागपुर से हुए ईलाज के दौरान वापस डॉक्टरों ने कर दिया मना उसको भगवती ने किया ठीक*
ढीमरखेड़ा | आधुनिकता की चकाचौंध और वैज्ञानिक तर्कों से परे, भारत की पावन धरा पर आज भी कुछ ऐसे स्थान मौजूद हैं, जहाँ दैवीय शक्तियों का अहसास साक्षात महसूस किया जा सकता है। ऐसा ही एक परम पवित्र और अलौकिक आस्था का केंद्र है मध्य प्रदेश के कटनी जिले के ढीमरखेड़ा बस स्टैंड पर स्थित बड़ी माता मंदिर। सैकड़ों वर्ष पुराना यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि क्षेत्र के लाखों श्रद्धालुओं के अटूट विश्वास, अगाध श्रद्धा और सदियों से चली आ रही जीवंत परंपराओं का एक महासमुद्र है। मढ़िया से लेकर एक गगनचुंबी भव्य मंदिर बनने तक का इसका सफर और निर्माण कार्य के दौरान घटे अलौकिक चमत्कार, आज भी लोगों को दाँतों तले उँगली दबाने पर मजबूर कर देते हैं।
*एक छोटी-सी मढ़िया से भव्य देवालय तक का अलौकिक सफर*
स्थानीय इतिहास और बुजुर्गों की स्मृतियों के अनुसार, आज जहाँ यह भव्य और नयनाभिराम मंदिर खड़ा है, वहाँ सैकड़ों वर्ष पहले घने पेड़ों के झुरमुट के बीच एक छोटी-सी मढ़िया (मिट्टी और पत्थरों का छोटा सा ढांचा) हुआ करती थी। उस समय यह स्थान एकांत और वनाच्छादित था, जहाँ माता रानी एक छोटे से स्वरूप में विराजमान थीं। समय बदलता गया, पीढ़ियाँ गुजरती गईं, लेकिन माता के प्रति लोगों की निष्ठा रत्ती भर भी कम नहीं हुई। माता के दरबार से झोलियाँ भरकर लौटने वाले भक्तों की संख्या जैसे-जैसे बढ़ती गई, वैसे-वैसे जनसहयोग से इस स्थान का कायाकल्प होता चला गया। श्रद्धा की एक-एक ईंट और भक्तों के पसीने की एक-एक बूँद ने मिलकर उस छोटी सी मढ़िया को आज एक विशाल और भव्य मंदिर का रूप दे दिया है। आज ढीमरखेड़ा की पहचान इस मंदिर के बिना अधूरी मानी जाती है। सुबह की पहली किरण से लेकर रात की अंतिम आरती तक, यहाँ श्रद्धालुओं का ताँता लगा रहता है, जो अपनी झोली फैलाने और माता का आशीर्वाद लेने दूर-दूर से खिंचे चले आते हैं।
*रहस्यमयी जनश्रुतियाँ जब रात के सन्नाटे में गूँजती है घुँघरुओं की आवाज*
बड़ी माता मंदिर के आसपास का वातावरण सिर्फ भक्तिमय ही नहीं, बल्कि कुछ ऐसे अलौकिक रहस्यों से भी घिरा है, जो यहाँ की हवाओं में श्रद्धा का रस घोलते हैं।लोक-मान्यताओं और सदियों से चली आ रही जनश्रुतियों के अनुसार, बड़ी माता इस पूरे क्षेत्र की रक्षक हैं। गाँव के बुजुर्ग आज भी पूरी गंभीरता और श्रद्धा के साथ बताते हैं कि आधी रात के सन्नाटे में, जब पूरी दुनिया सो रही होती है, तब माँ जगदम्बा स्वयं जागृत होती हैं। मान्यता है कि बड़ी माता रात के समय अपनी सखियों खेर माता और मरही माता से मिलने के लिए निकलती हैं। अतीत में कई बुजुर्गों और राहगीरों ने यह दावा किया है कि उन्होंने आधी रात को मंदिर परिसर और उसके आसपास मधुर घुँघरुओं की छम-छम सुनी है। इतना ही नहीं, कुछ पुरानी पीढ़ियों के लोगों ने अंधेरी रातों में हाथ में खप्पर (मिट्टी या धातु का पात्र) लिए एक ओजस्वी, ममतामयी और साक्षात देवी स्वरूपा महिला की धुंधली आकृति देखने की बात भी स्वीकार की है। इन दिव्य अनुभवों को स्थानीय लोग माता की सतत उपस्थिति और उनकी असीम महिमा का साक्षात प्रमाण मानते हैं।
*इतिहास के पन्नों में दर्ज वो दो साक्षात चमत्कार जब विज्ञान भी नतमस्तक हो गया*
इस मंदिर की महिमा केवल कहानियों तक सीमित नहीं है, बल्कि आज से करीब 20 से 25 वर्ष पूर्व मंदिर के जीर्णोद्धार और नवनिर्माण के दौरान दो ऐसी रोंगटे खड़े कर देने वाली घटनाएँ घटीं, जिन्हें आज भी ढीमरखेड़ा का बच्चा-बच्चा माता का साक्षात चमत्कार मानता है। इन हादसों में मौत सामने खड़ी थी, लेकिन माता के आँचल ने काल को भी पीछे धकेल दिया।
*चमत्कार पहला हाई वोल्टेज करंट का वो खौफनाक मंजर*
बात उस समय की है जब मंदिर की छत की ढलाई (लेंथ डालने) का काम युद्धस्तर पर चल रहा था। चारों तरफ लोहे के सरिए (रॉड) का जाल बिछा हुआ था। तभी अचानक काम कर रहे मजदूरों के हाथ से लोहे की एक लंबी रॉड अनियंत्रित होकर पास से गुजर रही हाई वोल्टेज बिजली की नंगी तारों से टकरा गई। पलक झपकते ही कड़कड़ाहट की आवाज के साथ पूरे मंदिर परिसर के लोहे के ढांचे में जानलेवा करंट दौड़ गया। वहाँ मौजूद हर शख्स का दिल बैठ गया, क्योंकि ऐसे हादसों में बचना नामुमकिन होता है। लेकिन, जैसे ही लोगों ने भय से माता का नाम पुकारा, एक अचंभित करने वाली घटना घटी। करंट का झटका इतना तगड़ा होने के बावजूद, वहाँ काम कर रहे तमाम मिस्त्री और मजदूर पूरी तरह सुरक्षित थे। किसी के शरीर पर एक खरोंच तक नहीं आई थी। बिजली का वो जानलेवा प्रकोप माता की चौखट पर आकर निष्प्रभावी हो गया।
*चमत्कार दूसरा मार्बल के नीचे दबा मजदूर और मौत से वापसी*
दूसरा चमत्कार तो और भी विस्मयकारी था। मंदिर के फर्श को भव्य रूप देने के लिए कटनी शहर से एक ट्रक में कीमती मार्बल (संगमरमर) की भारी-भरकम स्लैब्स मंगवाई गई थीं। जब ट्रक मंदिर के सामने खड़ा हुआ और मजदूर मार्बल उतारने लगे, तभी अचानक जमीन धंसने के कारण ट्रक का एक भारी पहिया गड्ढे में चला गया। संतुलन बिगड़ते ही ट्रक पर लदा टनों वजनी मार्बल सीधे नीचे काम कर रहे मजदूरों की तरफ गिर गया। एक मजदूर उस भारी मार्बल के मलबे के नीचे पूरी तरह दब गया। जब तक लोग उसे बाहर निकालते, तब तक अनर्थ हो चुका था। मजदूर के मुँह से खून की धार बहने लगी थी और वह पूरी तरह बेसुध (बेहोश) हो चुका था। उसकी सांसें थमने की कगार पर थीं। डॉक्टरों को बुलाने का समय नहीं था। ऐसे में, निराश होने के बजाय स्थानीय ग्रामीणों और साथी मजदूरों ने उस लहूलुहान मजदूर को उठाकर माता के ठीक दरबार के सामने लिटा दिया। पूरा परिसर माता के जयकारों और जीवनदान की प्रार्थनाओं से गूँज उठा और फिर जो हुआ, उसने सबको रोने पर मजबूर कर दिया। कुछ ही मिनटों की सामूहिक प्रार्थना के बाद, उस बेसुध मजदूर ने एक गहरी सांस ली, अपनी आँखें खोलीं और ऐसे उठकर बैठ गया जैसे वह सिर्फ सो रहा हो। आनन-फानन में उसे कटनी के बड़े डॉक्टरों के पास ले जाया गया, जहाँ गहन जाँच के बाद डॉक्टरों ने भी अपना सिर चकराते हुए कहा, "इसे कोई अंदरूनी चोट नहीं है, यह पूरी तरह स्वस्थ है।" टनों वजनी पत्थर जिसके सीने पर गिरे हों, उसका सही-सलामत बच जाना माता के आशीर्वाद के अलावा और कुछ नहीं था।
*पीढ़ियों से शर्मा परिवार की निश्छल सेवा*
किसी भी तीर्थ की पवित्रता वहाँ के पुजारियों की साधना से और बढ़ जाती है। बड़ी माता मंदिर की सेवा-पूजा का यह पावन दायित्व पिछले कई दशकों और कई पीढ़ियों से शर्मा परिवार निभाता आ रहा है। शर्मा परिवार के पूर्वजों ने निश्छल भाव से जिस मढ़िया की सेवा शुरू की थी, आज उसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए कृष्ण कुमार शर्मा मंदिर के मुख्य पुजारी के रूप में अपनी सेवाएँ दे रहे हैं। उनके सानिध्य में माता की त्रिकाल पूजा और नियमों का कड़ाई से पालन किया जाता है। पंडित जी बताते हैं कि यहाँ सच्चे मन से मांगी गई कोई भी मन्नत कभी खाली नहीं जाती। निसंतान को संतान, बीमार को स्वास्थ्य और भटके हुए को सही राह यहाँ माँ के चरणों में आकर मिल जाती है।
*चैत्र और शारदेय नवरात्रि जब ढीमरखेड़ा बन जाता है साक्षात मिनी शक्तिपीठ*
यूँ तो साल के बारह महीने यहाँ भक्तों का मेला लगा रहता है, लेकिन वर्ष में दो बार आने वाली चैत्र और शारदेय नवरात्रि के दौरान यहाँ का नजारा अलौकिक और देखते ही बनता है। इन नौ दिनों में पूरा ढीमरखेड़ा कस्बा माता की भक्ति के रंग में सराबोर हो जाता है। नवरात्रि के प्रथम दिन अत्यंत कड़े नियमों और शुद्धता के साथ मंदिर परिसर में जवारे बोए जाते हैं। यह जवारे भक्तों की अटूट आस्था और हरी-भरी खुशहाली का प्रतीक होते हैं, जिनकी नौ दिनों तक विशेष देखरेख की जाती है। नौ दिनों तक चलने वाली महाआरती इस उत्सव का मुख्य आकर्षण होती है। शंख, घड़ियाल, नगाड़ों की गूँज और कपूर की महक के बीच जब सैकड़ों दीयों की लौ एक साथ जगमगाती है, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो स्वयं देवता स्वर्ग से उतरकर माता की अगवानी कर रहे हों।नवरात्रि के समापन पर जब जवारों का विसर्जन होता है, तो हर आँख नम होती है और हर जुबां पर केवल एक ही प्रार्थना होती है हे बड़ी माता, अपनी कृपा इस अंचल पर हमेशा बनाए रखना।
*आस्था, संस्कृति और गौरव का अमर प्रतीक*
ढीमरखेड़ा बस स्टैंड का यह बड़ी माता मंदिर सिर्फ पत्थरों और सीमेंट से बना एक ढांचा मात्र नहीं है। यह इस पूरे क्षेत्र की धड़कन है, यहाँ की संस्कृति का मुकुट है और लोक-आस्था का अमर दस्तावेज है। पीढ़ियों से चली आ रही यह पूजा-पद्धति और समय-समय पर भक्तों को मिलने वाले चमत्कारी अनुभव इस बात का गवाह हैं कि माँ आज भी यहाँ साक्षात विराजमान हैं। यदि आप भी अपने जीवन में मानसिक शांति, दैवीय अनुभूति और माँ के चमत्कारों को महसूस करना चाहते हैं, तो एक बार ढीमरखेड़ा की इस पावन चौखट पर आकर "जय माता दी" कहना न भूलें। माता का यह जागृत दरबार हर कल्याणकारी आत्मा का स्वागत करने के लिए सदैव तत्पर रहता है।

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