तिजोरी धरी रह गई,हाथ का मैल बना पैसा और श्मशान में बेटे की दी 'अग्नि' बनी अंतिम सत्य
कटनी | कहते हैं इंसान अपनी पूरी जिंदगी जिस धन-दौलत को कमाने और संजोने में लगा देता है, वह मौत की चौखट पर आकर महज एक 'हाथ का मैल' साबित होती है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी और भौतिकवादी समाज में यह कड़वा सच एक बार फिर हर किसी को सोचने पर मजबूर कर रहा है। श्रीमद्भगवद्गीता और भारतीय दर्शन में निहित यह बात आज के समाज का सबसे बड़ा आईना बन चुकी है कि इंसान खाली हाथ आता है और खाली हाथ ही चला जाता है।
*पैसा जो किसी एक का होकर नहीं रहा*
आर्थिक विश्लेषकों और समाजशास्त्रियों का भी मानना है कि पैसा पानी की तरह है, जो आज एक हाथ में है तो कल दूसरे हाथ में। इंसान जीवन भर इस भ्रम में जीता है कि जो संपत्ति उसने जुटाई है, वह उसकी अपनी है। लेकिन वास्तविकता यह है कि तिजोरियों में बंद नोट और बैंकों के आंकड़े केवल एक व्यवस्था का हिस्सा हैं, जो किसी एक व्यक्ति के पास कभी स्थिर नहीं रहते।
पुत्र की दी 'अग्नि' ही जीवन का अंतिम पड़ाव सनातन परंपरा में मुखाग्नि (अंतिम संस्कार के समय अग्नि देना) का एक बहुत गहरा आध्यात्मिक महत्व है। जिस पुत्र की परवरिश, शिक्षा और उज्जवल भविष्य के लिए एक पिता अपनी दिन-रात की कमाई और खुशियां कुर्बान कर देता है, जीवन के आखिरी सफर में वही पुत्र पिता के नश्वर शरीर को पंचतत्व में विलीन करने के लिए अग्नि देता है। श्मशान घाट की वे सुलगती लकड़ियाँ और उठती लपटें हर अमीर और गरीब को एक समान स्तर पर लाकर खड़ा कर देती हैं।
*श्मशान वैराग्य समाज को एक कड़ा संदेश*
बदलते दौर में कई बार ऐसी भी खबरें सामने आती हैं जहां संपत्ति के विवाद में रिश्ते दम तोड़ देते हैं। लेकिन अंततः सत्य यही बचता है कि इंसान द्वारा कमाया गया सारा वैभव यहीं धरा का धरा रह जाता है।जीवन का यह चक्र हमें यह सीख देता है कि पैसे की अंधी दौड़ में अपनों को और संस्कारों को पीछे न छोड़ें, क्योंकि अंत समय में साथ केवल हमारे कर्म और हमारी संतान का कंधा ही आता है।

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