कलम से दूर युवा, जर्जर स्कूल और चुनावी रैलियों का शोर अधर में लटका भावी पीढ़ी का भविष्य, झंडों के साए में सिसकता बचपन शिक्षा की बदहाली और राजनीतिक मोहरे बनते युवा, रैलियों पर करोड़ों और स्कूलों में लाचारी क्या यही है हमारे देश का उज्ज्वल कल, कलम से दूर युवा और गिरती शिक्षा, चुनावी रैलियों के शोर में गुम होता भावी पीढ़ी का भविष्य
कलम से दूर युवा, जर्जर स्कूल और चुनावी रैलियों का शोर अधर में लटका भावी पीढ़ी का भविष्य, झंडों के साए में सिसकता बचपन शिक्षा की बदहाली और राजनीतिक मोहरे बनते युवा, रैलियों पर करोड़ों और स्कूलों में लाचारी क्या यही है हमारे देश का उज्ज्वल कल, कलम से दूर युवा और गिरती शिक्षा, चुनावी रैलियों के शोर में गुम होता भावी पीढ़ी का भविष्य
भोपाल | आज के दौर में देश के लोकतांत्रिक ताने-बाने और सामाजिक संरचना पर गौर करें, तो एक चिंताजनक तस्वीर उभरकर सामने आती है। जहाँ युवाओं के हाथों में बेहतर भविष्य गढ़ने के लिए कलम और किताबें होनी चाहिए थीं, वहीं उन्हें राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए रैलियों और चुनावी अभियानों में झंडे थमाए जा रहे हैं। शिक्षा, भाईचारे और बुनियादी सुविधाओं के अभाव के बीच राजनीति का यह स्वरूप समाज और बच्चों के भविष्य पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा कर रहा है। "कलम की जगह हाथ में चुनावी झंडे थमाए जा रहे हैं..." के आलोक में यह विशेष रिपोर्ट शिक्षा व्यवस्था के गिरते स्तर, राजनीति के बाहुबल और समाज में फैलते ध्रुवीकरण पर एक विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करती है।
*शिक्षा बनाम राजनीति हाथों से छीनती कलम और थमाए जाते झंडे*
आज देश के विभिन्न हिस्सों में चुनावी मौसम हो या आम राजनीतिक गतिविधियाँ, युवाओं और यहाँ तक कि नाबालिग बच्चों की भागीदारी बड़े पैमाने पर देखने को मिलती है।
कमज़ोर आर्थिक पृष्ठभूमि का शोषण: गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चों को कुछ रुपये, मुफ्त भोजन या क्षणिक आकर्षण का लालच देकर राजनीतिक रैलियों की भीड़ बढ़ाने के काम में लाया जा रहा है।
कलम की जगह झंडा: जिस उम्र में बच्चों को कक्षाओं में बैठकर ज्ञान अर्जित करना चाहिए, वैज्ञानिक सोच विकसित करनी चाहिए और अपनी बौद्धिक क्षमताओं को निखारना चाहिए, उस उम्र में उन्हें राजनीतिक दलों के प्रचार-प्रसार और झंडे उठाने के काम में धकेला जा रहा है।
सोचने की क्षमता पर प्रहार: जब एक युवा पढ़ाई-लिखाई छोड़कर किसी विचारधारा का अंधभक्त या राजनीतिक भीड़ का हिस्सा बन जाता है, तो उसकी मौलिक और आलोचनात्मक सोचने की क्षमता समाप्त हो जाती है। वह समाज के विकास में योगदान देने की जगह केवल राजनीतिक दलों का मोहरा बनकर रह जाता है।
*सामाजिक ताना-बाना और नफ़रतों के चिराग*
कविता की अगली पंक्तियाँ सामाजिक ध्रुवीकरण की एक कड़वी सच्चाई को उजागर करती हैं— "जहाँ जलनी थी मोहब्बत की मशालें, नफ़रतों के चिराग जलाए जा रहे हैं।"
सामाजिक समरसता और भाईचारा किसी भी देश की प्रगति की रीढ़ होते हैं। परंतु वर्तमान परिदृश्य में राजनीतिक लाभ हासिल करने के लिए समाज को जाति, धर्म और संप्रदाय के नाम पर बांटने का खेल खेला जा रहा है।
सोशल मीडिया और भ्रामक प्रचार: युवाओं के दिलों-दिमाग में नफरत का जहर घोलने के लिए डिजिटल माध्यमों का व्यापक इस्तेमाल हो रहा है।
सहिष्णुता का ह्रास: जहाँ शिक्षण संस्थानों और सामाजिक मंचों से प्रेम, करुणा और सौहार्द की मशालें जलनी चाहिए थीं, वहाँ वैमनस्य, नफरत और विभाजनकारी नारों को बढ़ावा दिया जा रहा है।
दूरगामी दुष्परिणाम: जब समाज का युवा नफरत की आग में जलता है, तो अपराध दर में बढ़ोतरी होती है और देश की आतंरिक शांति व सुरक्षा को गहरा खतरा पैदा हो जाता है।
*जर्जर बुनियादी ढांचा और चुनावी फिजूलखर्ची*
तीसरी प्रमुख चिंता का विषय सरकारी प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा की दयनीय स्थिति है— "स्कूलों की छतों से टपकती है लाचारी, रैलियों में करोड़ों उड़ाए जा रहे हैं।"
यह विरोधाभास देश की नीतिगत प्राथमिकताओं पर एक बड़ा सवाल उठाता है:
(क) सरकारी स्कूलों की दुर्दशा
जर्जर भवन और सुविधाओं का अभाव: देश के कई ग्रामीण और दूर-दराज के इलाकों में आज भी सरकारी स्कूल बिना छत, बिना शौचालयों, बिना पीने के पानी और बिना बिजली के चल रहे हैं। बारिश के दिनों में छतों से पानी टपकना और बच्चों का असुरक्षित माहौल में बैठना आम बात हो गई है।
शिक्षकों की कमी: हज़ारों पद खाली पड़े हैं, लेकिन नियुक्तियों के नाम पर केवल आश्वासन दिए जाते हैं।
(ख) रैलियों और विज्ञापनों पर अत्यधिक खर्च
इसके विपरीत, राजनीतिक दलों और चुनाव अभियानों में पानी की तरह पैसा बहाया जा रहा है। विशाल मंच, उड़नखटोले (हेलिकॉप्टर), चमचमाते फ्लेक्स-होर्डिंग्स और जनसभाओं के आयोजन में अरबों-करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं। यदि इन रैलियों में उड़ाए जाने वाले धन का एक छोटा हिस्सा भी देश के जर्जर स्कूलों के जीर्णोद्धार और शिक्षा बजट को बढ़ाने में लगाया जाए, तो लाखों बच्चों का जीवन सवर सकता है।
*भविष्य के तालों में बंद होता बच्चों का कल*
कविता की अंतिम पंक्तियाँ एक भयावह भविष्य की ओर इशारा करती हैं कल का झूठा ख्वाब दिखाकर, बच्चों के भविष्य पर ताले लगाए जा रहे हैं। नेता और राजनीतिक दल अपनी जनसभाओं में "उज्ज्वल भविष्य", "विश्वगुरु बनाने", "रोजगार" और "विकास" के लंबे-चौड़े वादे करते हैं। झूठे ख्वाबों का यह मायाजाल जनता को सच्चाई से दूर रखता है। डिग्री हाथ में होने के बावजूद युवाओं को योग्यता के अनुसार नौकरियां नहीं मिल रही हैं। जब प्राथमिक स्तर पर ही शिक्षा की नींव कमज़ोर रख दी जाती है और बच्चों को राजनीतिक हथकंडों का शिकार बनाया जाता है, तो उनका पूरा भविष्य अंधकारमय हो जाता है। यह स्थिति बच्चों के सपनों और उनके उज्ज्वल कल के दरवाजों पर ताले लगाने जैसी है।
*स्कूलों को बंद नहीं जगह - जगह खोलो स्कूल*
यह पंक्तियाँ केवल एक कविता नहीं, बल्कि हमारे वर्तमान समाज और राजनीति के चेहरे पर एक करारा तमाचा हैं। यदि हमें अपने देश को वास्तव में सशक्त और समृद्ध बनाना है, तो हमें अपनी प्राथमिकताओं को बदलना होगा सरकार को रैलियों और अनावश्यक दिखावों के स्थान पर शिक्षा और बुनियादी ढांचे में निवेश बढ़ाना होगा। चुनावी गतिविधियों और रैलियों में बच्चों के इस्तेमाल पर सख्त कानूनी रोक लगानी होगी। युवाओं को झूठे दावों और राजनीतिक बहकावे से बचाकर कौशल विकास और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से जोड़ना होगा। नफरत के बाजार को बंद कर समाज में आपसी प्रेम, भाईचारे और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देना होगा। जब तक देश के हर बच्चे के हाथ में मजबूत कलम और हर स्कूल की छत पक्की नहीं होगी, तब तक सच्चे लोकतंत्र और विकास का सपना अधूरा ही रहेगा।

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