मध्य प्रदेश की सियासत में बड़ा उबाल बुधनी के कोसमी गांव की कार्रवाई पर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और शिवराज सिंह चौहान आमने-सामने
मध्य प्रदेश की सियासत में बड़ा उबाल बुधनी के कोसमी गांव की कार्रवाई पर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और शिवराज सिंह चौहान आमने-सामने
भोपाल | मध्य प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर भारी उथल-पुथल मची हुई है। सूबे के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और पूर्व मुख्यमंत्री व वर्तमान केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान एक बेहद संवेदनशील प्रशासनिक और सामाजिक मुद्दे पर सीधे आमने-सामने आ गए हैं। सीहोर जिले के बुधनी विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले ग्राम कोसमी में आदिवासी परिवारों के खिलाफ हुई प्रशासनिक कार्रवाई ने इस विवाद को जन्म दिया है, जिसने अब एक बड़े राजनीतिक गतिरोध का रूप ले लिया है। विपक्ष इस पूरे घटनाक्रम को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के भीतर चल रहे कथित अंतर्कलह और सत्ता संघर्ष के तौर पर पेश कर रहा है, वहीं मुख्यमंत्री ने स्थिति को संभालते हुए निष्पक्ष जांच का भरोसा दिया है।
*विवाद का मुख्य केंद्र कोसमी गांव की बुलडोजर कार्रवाई*
इस पूरे राजनीतिक घमासान की शुरुआत सीहोर जिले के बुधनी विधानसभा क्षेत्र के ग्राम कोसमी से हुई। रविवार को यहां वन विकास निगम और स्थानीय प्रशासन के अमले ने कथित अतिक्रमण हटाने की एक बड़ी मुहिम चलाई। इस दौरान बरेला समुदाय के लगभग 12 आदिवासी परिवारों के मकानों को बुलडोजर से ढहा दिया गया। इतना ही नहीं, प्रभावित परिवारों का आरोप है कि वन विभाग के अमले ने उनके खेतों में खड़ी मक्का की तैयार फसल को भी ट्रैक्टर चलाकर नष्ट कर दिया और पीने के पानी के कुएं को मिट्टी से भर दिया। इस अचानक हुई कार्रवाई के कारण कड़कड़ाती ठंड और बदलते मौसम के बीच कई परिवार, जिनमें महिलाएं और छोटे बच्चे शामिल हैं, खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर हो गए। इस घटना की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद मानवीय और राजनीतिक स्तर पर तीखी प्रतिक्रियाएं आना शुरू हो गईं।
*शिवराज सिंह चौहान का आक्रोश अधिकारियों को कहा नर पिशाच*
बुधनी विधानसभा क्षेत्र शिवराज सिंह चौहान का पुराना गृह क्षेत्र रहा है, और वर्तमान में वे इसी क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले विदिशा संसदीय क्षेत्र से सांसद हैं। घटना की जानकारी मिलते ही पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सोमवार को अपने बेटे कार्तिकेय सिंह चौहान और स्थानीय विधायक रमाकांत भार्गव के साथ सीधे ग्राम कोसमी पहुंचे। प्रभावित आदिवासियों की आपबीती सुनने के बाद शिवराज सिंह चौहान का गुस्सा फूट पड़ा। वे अपनी ही पार्टी की सरकार के प्रशासनिक अधिकारियों के खिलाफ आदिवासियों के साथ जमीन पर धरने पर बैठ गए। मीडिया से बात करते हुए शिवराज सिंह चौहान ने बेहद कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया। उन्होंने इस कार्रवाई को "जुल्म की पराकाष्ठा" और "हृदयहीनता" करार दिया। उन्होंने गुस्से में कहा जिन्होंने इन गरीब आदिवासियों के आशियाने उजाड़े हैं, उनकी खड़ी फसलें बर्बाद की हैं, वे इंसान नहीं, बल्कि 'नर पिशाच' और 'राक्षस' हैं। भगवान उन्हें कभी माफ नहीं करेगा। क्या अधिकारियों के खुद के बाल-बच्चे और परिवार नहीं हैं? वे इन रोते हुए बच्चों की चीखें कैसे अनसुनी कर सकते हैं? शिवराज सिंह चौहान ने सीधे तौर पर मुख्यमंत्री मोहन यादव का नाम लेते हुए प्रशासन को याद दिलाया कि "ये पीड़ित आदिवासी भाजपा के पारंपरिक वोटर हैं और मोहन जी इन्हीं के वोटों की बदौलत मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे हैं। उन्होंने मांग की कि इस बर्बर कार्रवाई को अंजाम देने वाले वन विभाग और जिला प्रशासन के अधिकारियों पर तत्काल सख्त दंडात्मक कार्रवाई की जाए, आदिवासियों के घरों को सरकारी खर्च पर दोबारा बनवाया जाए और उनके लिए भोजन व अस्थाई आश्रय की व्यवस्था तुरंत की जाए।
*मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का पलटवार दूध का दूध, पानी का पानी होगा*
शिवराज सिंह चौहान के तीखे तेवरों और धरने की खबरों ने भोपाल स्थित मंत्रालय तक हलचल मचा दी। सोमवार शाम को मुख्यमंत्री निवास पर आयोजित एक प्रेस वार्ता के दौरान जब मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से इस संबंध में सवाल पूछा गया, तो उन्होंने बहुत ही नपे-तुले लेकिन स्पष्ट शब्दों में अपनी बात रखी।मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि सरकार जनता की समस्याओं को लेकर पूरी तरह संवेदनशील है। वरिष्ठ नेता शिवराज सिंह चौहान ने जिस मुद्दे को उठाया है, उसे संज्ञान में ले लिया गया है। मुख्यमंत्री ने कहा मुझे इस पूरे मामले की जानकारी मिली है। मैंने तुरंत मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव (CS) से इस घटना की विस्तृत रिपोर्ट तलब की है। प्रशासन ने किस आधार पर और किन परिस्थितियों में यह कदम उठाया, इसकी पूरी जांच की जाएगी। जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हो जाएगी और दूध का दूध, पानी का पानी हो जाएगा। हालांकि, भाजपा के ही कुछ अंदरूनी हलकों और पूर्व अधिकारियों की तरफ से इस मामले में दूसरा पहलू भी सामने रखा जा रहा है। 'सिस्टम परिवर्तन अभियान' के अध्यक्ष और पूर्व अधिकारी आजाद सिंह डबास ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर आरोप लगाया है कि कोसमी गांव में वन विकास निगम की करीब 36 हेक्टेयर संरक्षित भूमि पर आदिवासियों को अतिक्रमण के लिए कथित तौर पर राजनीतिक शह दी गई थी। उन्होंने नेताओं द्वारा किए जा रहे विरोध को "घड़ियाली आंसू" बताते हुए सरकारी काम में बाधा डालने वालों के खिलाफ जांच की मांग की है।
*यह पहली बार नहीं पहले भी तीन मौकों पर आ चुके हैं आमने-सामने*
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कोसमी गांव का यह विवाद कोई इकलौती घटना नहीं है। दिसंबर 2023 में शिवराज सिंह चौहान की जगह डॉ. मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद से ही दोनों नेताओं के बीच एक अदृश्य राजनीतिक खींचतान समय-समय पर उजागर होती रही है। पिछले तीन साल के भीतर यह तीसरा बड़ा मौका है जब शिवराज ने अपनी ही सरकार की नीतियों या फैसलों पर सार्वजनिक रूप से सवाल खड़े किए हैं खिवनी वन्यजीव अभयारण्य विवाद (जून 2025): सीहोर और देवास जिले की सीमा पर स्थित खिवनी वन्यजीव अभयारण्य क्षेत्र में वन विभाग ने आदिवासियों को बेदखल करने की कोशिश की थी। उस वक्त भी शिवराज सिंह चौहान आदिवासियों के पक्ष में खड़े हो गए थे, जिसके बाद मोहन यादव सरकार को बैकफुट पर आते हुए तत्कालीन संभागीय वन अधिकारी (DFO) का तबादला करना पड़ा था और मानसून के दौरान ऐसी कार्रवाइयों पर रोक लगानी पड़ी थी।
मूंग उपार्जन (खरीदी) संकट (जुलाई 2026): तीन महीने पहले प्रदेश में जब किसान अपनी मूंग की फसल की सरकारी खरीदी न होने को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे और भोपाल में मुख्यमंत्री आवास का घेराव करने की कोशिश कर रहे थे, तब केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मुख्यमंत्री मोहन यादव को एक सार्वजनिक पत्र लिखा था। उन्होंने राज्य सरकार के दावों को चुनौती देते हुए कहा था कि केंद्र ने पर्याप्त कोटा स्वीकृत कर रखा है, समस्या कोटे की नहीं बल्कि राज्य प्रशासन की सुस्त खरीदी प्रक्रिया की है।
लाड़ली बहना योजना पर बयानबाजी: शिवराज सिंह चौहान की महत्वाकांक्षी 'लाड़ली बहना योजना' को लेकर भी दोनों खेमों में असहजता रही है। शिवराज सिंह चौहान अक्सर अपने सार्वजनिक भाषणों में लाड़ली बहनों का जिक्र करते हैं, जबकि मोहन यादव सरकार ने सत्ता में आने के बाद कई प्रशासनिक फेरबदल किए और कुछ पुरानी योजनाओं की समीक्षा की, जिसे शिवराज समर्थकों ने उनके राजनीतिक प्रभाव को कम करने की कोशिश के रूप में देखा।
*विपक्ष को मिला मौका, उठाए "सत्ता संघर्ष" के सवाल*
इस हाई-प्रोफाइल विवाद ने मध्य प्रदेश की मुख्य विपक्षी पार्टी, कांग्रेस को सरकार पर हमला करने का एक बड़ा हथियार दे दिया है। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर पोस्ट करते हुए इस पूरी घटना को भाजपा के भीतर मचे अंतर्कलह का नतीजा बताया। मोहन यादव जी, जब आपकी ही पार्टी के पूर्व मुख्यमंत्री और देश के कृषि मंत्री आपकी सरकार की प्रशासनिक कार्रवाइयों पर सवाल उठा रहे हैं और अधिकारियों को 'नर पिशाच' कह रहे हैं, तो आपको जनता को जवाब देना चाहिए।भाजपा की इस आपसी सिरफुटव्वल और अंदरूनी सत्ता संघर्ष की कीमत प्रदेश के गरीब और बेकसूर आदिवासियों को क्यों चुकानी पड़ रही है? आखिर किसके आदेश पर आदिवासियों के घर तोड़े गए? इसी तरह प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने भी बयान जारी कर कहा कि भाजपा सरकार का यह कदम पूरी तरह से आदिवासी विरोधी मानसिकता को दर्शाता है और कांग्रेस प्रभावित परिवारों के अधिकारों के लिए सड़क से लेकर सदन तक लड़ाई लड़ेगी।
*क्या मोड़ लेगा यह विवाद*
कोसमी गांव की इस घटना ने मध्य प्रदेश की राजनीति को बेहद संवेदनशील मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है। एक तरफ मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के सामने शासन और कानून व्यवस्था के इकबाल को बनाए रखने की चुनौती है, तो दूसरी तरफ शिवराज सिंह चौहान के रूप में पार्टी के सबसे कद्दावर और लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे नेता के सार्वजनिक आक्रोश को शांत करने का दबाव है। फिलहाल सभी की नजरें मुख्य सचिव द्वारा मुख्यमंत्री को सौंपी जाने वाली जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं। इस रिपोर्ट के आने के बाद ही साफ हो पाएगा कि इस "बुलडोजर एक्शन" के पीछे जिम्मेदार अफसरों पर गाज गिरती है या फिर यह राजनीतिक गतिरोध दिल्ली दरबार के हस्तक्षेप के बाद ही शांत होगा।

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