1500 वर्ष पुराने इतिहास को समेटे है तिगवां का कंकाली देवी मंदिर, गुप्तकालीन वास्तुकला का अद्भुत केंद्र, बहोरीबंद की पावन धरा पर गुप्त साम्राज्य की अमूल्य धरोहर
1500 वर्ष पुराने इतिहास को समेटे है तिगवां का कंकाली देवी मंदिर, गुप्तकालीन वास्तुकला का अद्भुत केंद्र, बहोरीबंद की पावन धरा पर गुप्त साम्राज्य की अमूल्य धरोहर
कटनी | मध्य प्रदेश का महाकौशल क्षेत्र अपने भीतर न जाने कितने ऐतिहासिक रहस्य और सांस्कृतिक धरोहरें समेटे हुए है. इसी ऐतिहासिक श्रृंखला में कटनी जिले के बहोरीबंद तहसील से लगभग 4 से 5 किलोमीटर दूर स्थित तिगवां ग्राम का मां कंकाली देवी मंदिर आज भी सैलानियों और इतिहासकारों के लिए आकर्षण का मुख्य केंद्र बना हुआ है. 5वीं शताब्दी (गुप्त काल) का यह अत्यंत प्राचीन और ऐतिहासिक मंदिर भारत के सबसे शुरुआती पत्थरों से निर्मित मंदिरों में से एक माना जाता है. लगभग 1500 वर्षों की ऋतुओं और मौसम की मार झेलने के बाद भी इस मंदिर की संरचना आज भी शान से खड़ी है, जो तत्कालीन भारत के उत्कृष्ट शिल्पकला और वास्तुकला की कहानी बयां करती है.
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा इस स्थल को राष्ट्रीय महत्व का स्मारक घोषित कर संरक्षित किया गया है. इतिहासकार बताते हैं कि जब भारत में मंदिरों के निर्माण की कला अपने शुरुआती दौर में थी, तब इस अद्भुत मंदिर का निर्माण कराया गया था. आइए इस विस्तृत विशेष रिपोर्ट में जानते हैं कि इस मंदिर का इतिहास, इसकी बनावट और इसका धार्मिक-सांस्कृतिक महत्व क्या है।
*वास्तुकला की अनूठी मिसाल सपाट छत और वर्गाकार गर्भगृह*
तिगवां के इस कंकाली देवी मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसकी गुप्तकालीन वास्तुकला है. गुप्त काल को भारतीय इतिहास का 'स्वर्ण युग' कहा जाता है, और इस काल के शुरुआती मंदिरों की बनावट की अपनी कुछ खास विशेषताएं होती थीं, जो इस मंदिर में पूरी तरह झलकती हैं
सपाट छत आज के समय में हम जिन मंदिरों को देखते हैं, उन पर ऊंचे-ऊंचे शिखर बने होते हैं. लेकिन गुप्त काल के प्रारंभिक चरण में मंदिरों पर शिखर नहीं बनाए जाते थे. तिगवां का यह मंदिर पूरी तरह से सपाट छत वाला है. पत्थर के बड़े-बड़े चौकोर टुकड़ों को आपस में जोड़कर इसकी छत का निर्माण किया गया है.
वर्गाकार गर्भगृह: मंदिर का मुख्य हिस्सा, जहाँ मुख्य प्रतिमा स्थापित है, उसे गर्भगृह कहा जाता है. यह गर्भगृह पूरी तरह से वर्गाकार है. इसकी लंबाई और चौड़ाई लगभग 8 फीट है. गर्भगृह की दीवारें बाहर से बेहद सादी हैं, जिन पर कोई अत्यधिक नक्काशी नहीं की गई है, जो गुप्त काल की सादगी को दर्शाती है.चार स्तंभों का मुख-मंडप : गर्भगृह के ठीक आगे एक छोटा सा मंडप (प्रवेश कक्ष) बना हुआ है, जो चार बेहद खूबसूरत और नक्काशीदार स्तंभों पर टिका हुआ है. इन स्तंभों की बनावट देखने योग्य है; इनके निचले और ऊपरी हिस्से चौकोर हैं, जबकि बीच का हिस्सा अष्टकोणीय है. स्तंभों के शीर्ष पर सिंह (शेर) की आकृतियां बनी हुई हैं, जो गुप्त साम्राज्य के राजकीय वैभव और शक्ति का प्रतीक मानी जाती हैं.
*प्रवेश द्वार की अद्भुत शिल्पकला गंगा और यमुना की जीवंत आकृतियां*
इस मंदिर का सबसे आकर्षक और कलात्मक हिस्सा इसका प्रवेश द्वार है. गुप्त काल में मंदिरों के प्रवेश द्वार की चौखट को सजाने की एक विशेष परंपरा थी. कंकाली देवी मंदिर के प्रवेश द्वार के दोनों ओर नदी देवियों—देवी गंगा और देवी यमुना की अत्यंत सुंदर और सजीव प्रतिमाएं उकेरी गई हैं:
मकरवाहिनी गंगा और कूर्मवाहिनी यमुना: द्वार के एक ओर गंगा जी अपने वाहन मकर (मगरमच्छ) पर विराजमान हैं, तो दूसरी ओर यमुना जी अपने वाहन कूर्म (कछुए) पर खड़ी दिखाई देती हैं. इन प्रतिमाओं के त्रिभंग मुद्रा (शरीर के तीन झुकाव) और उनके वस्त्रों की सिलवटें इतनी सूक्ष्मता से बनाई गई हैं कि वे जीवित प्रतीत होती हैं.
पौराणिक कथाओं का अंकन: इसके अलावा, चौखट के ऊपरी हिस्से पर सुंदर बेल-बूटे, मांगलिक चिह्न और छोटे-छोटे यक्ष-यक्षिणियों की आकृतियां खुदी हुई हैं. यह नक्काशी दर्शाती है कि 5वीं शताब्दी के मूर्तिकार पत्थरों को तराशने की कला में कितने निपुण थे.
*मां कंकाली देवी की पौराणिक मान्यता और धार्मिक महत्व*
मूल रूप से यह मंदिर किस देवता को समर्पित था, इसे लेकर इतिहासकारों में थोड़े मतभेद हैं, क्योंकि कुछ विद्वानों का मानना है कि यह प्रारंभिक काल में भगवान विष्णु या सूर्य देव का मंदिर रहा होगा. परंतु, वर्तमान में स्थानीय जनमानस और श्रद्धालुओं के बीच यह मां कंकाली देवी के मंदिर के रूप में प्रसिद्ध है.
प्रतिमा का स्वरूप: मंदिर के गर्भगृह के भीतर मां कंकाली की एक प्राचीन और रौद्र रूप वाली प्रतिमा स्थापित है. देवी माँ को कंकाल और चामुंडा रूप में दर्शाया गया है, जिनके कई हाथ हैं और वे असुरों का संहार कर रही हैं.
श्रद्धा का केंद्र: बहोरीबंद और आस-पास के जिलों (जैसे जबलपुर, कटनी, दमोह) से हजारों श्रद्धालु यहाँ मन्नतें मांगने आते हैं. विशेष रूप से चैत्र और शारदीय नवरात्रि के समय यहाँ विशाल मेले का आयोजन होता है, जहाँ लोग दूर-दूर से माता के दर्शन करने और इस ऐतिहासिक परिसर का आनंद लेने पहुंचते हैं. स्थानीय लोगों का विश्वास है कि माता के दरबार में आने वाले हर दुखी व्यक्ति की मनोकामना पूर्ण होती है.
*बहोरीबंद का ऐतिहासिक त्रिकोण जैन तीर्थ और अशोक का शिलालेख*
तिगवां का कंकाली देवी मंदिर केवल अकेला ऐतिहासिक स्थल नहीं है, बल्कि यह पूरा बहोरीबंद क्षेत्र इतिहास के अनमोल खजानों से भरा पड़ा है. यदि कोई पर्यटक या इतिहास प्रेमी यहाँ आता है, तो वह एक साथ तीन अलग-अलग कालखंडों के इतिहास को देख सकता है
ऐतिहासिक स्थल कालखंड वंश मुख्य विशेषता रूपनाथ का शिलालेख मौर्य काल (ईसा पूर्व 3वीं शताब्दी) सम्राट अशोक का लघु शिलालेख, जो पहाड़ी पर स्थित है। बहोरीबंद जैन तीर्थ कलचुरी काल (10वीं-11वीं शताब्दी) भगवान शांतिनाथ की 12 फीट ऊंची विशालकाय जैन प्रतिमा। कंकाली देवी मंदिर (तिगवां) गुप्त काल (5वीं शताब्दी) भारत के सबसे प्राचीन पत्थर के सपाट छत वाले मंदिरों में से एक। यह त्रिकोण दर्शाता है कि प्राचीन काल में यह क्षेत्र बौद्ध, जैन और सनातन (हिन्दू) धर्मों के सद्भाव और व्यापारिक मार्गों का एक बहुत बड़ा केंद्र रहा होगा।
*पर्यटन और संरक्षण की चुनौतियाँ बुनियादी सुविधाओं की आवश्यकता*
यद्यपि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण इस मंदिर की देखरेख करता है और इसके चारों ओर एक सुंदर हरा-भरा बगीचा (लॉन) विकसित किया गया है, लेकिन स्थानीय निवासियों और पर्यटकों का कहना है कि इस क्षेत्र को वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर लाने के लिए अभी और प्रयासों की आवश्यकता है बहोरीबंद से तिगवां तक पहुंचने वाली सड़क को और बेहतर बनाने की आवश्यकता है, ताकि पर्यटक बिना किसी परेशानी के यहाँ पहुंच सकें पर्यटक सुविधाएं परिसर के आस-पास सूचना पट्ट गाइड की व्यवस्था, स्वच्छ पेयजल और विश्राम गृह जैसी बुनियादी सुविधाओं का विस्तार किया जाना चाहिए, जिससे देश-विदेश के शोधकर्ता और सैलानी यहाँ अधिक समय बिता सकें. प्रचार-प्रसार की कमी मध्य प्रदेश पर्यटन विभाग को खजुराहो या सांची की तर्ज पर महाकौशल के इस गुप्तकालीन सर्किट (तिगवां, रूपनाथ, और बहोरीबंद) का व्यापक प्रचार करना चाहिए, जिससे स्थानीय रोजगार को भी बढ़ावा मिल सके।
*भावी पीढ़ियों के लिए हमारी विरासत का संरक्षण*
तिगवां का मां कंकाली देवी मंदिर सिर्फ पत्थरों का एक ढांचा नहीं है, बल्कि यह भारत के गौरवशाली अतीत, कलात्मक कौशल और हमारी धार्मिक सहिष्णुता का जीवंत दस्तावेज है. 1500 सालों से अडिग खड़ा यह मंदिर हमें याद दिलाता है कि हमारी जड़ें कितनी गहरी और समृद्ध हैं.
इस ऐतिहासिक धरोहर को देखना अपने आप में समय के चक्र में पीछे जाकर इतिहास को साक्षात महसूस करने जैसा है. आज की युवा पीढ़ी और कला-प्रेमियों के लिए तिगवां का यह सफर न केवल ज्ञानवर्धक है, बल्कि अपनी प्राचीन धरोहरों के प्रति सम्मान और गर्व की भावना को भी जगाता है. सरकार और समाज दोनों का यह साझा कर्तव्य है कि हम इस अनमोल विरासत को सुरक्षित रखें ताकि आने वाली पीढ़ियां भी भारत के इस 'स्वर्ण युग' के वैभव को देख सकें।

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