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चुनावी धांधली के आरोपों के बीच गूंजा नारा, इस्तीफा ही तो मांगा है तुम्हारी किडनी तो नहीं मांगी,13 करोड़ वोटों की 'लूट' पर छिड़ा सियासी संग्राम ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे पर अड़ा विपक्ष, सड़कों पर गूंजे तीखे व्यंग्य , हिसाब लूट का ही तो मांगा है तुम्हारी चमड़ी तो नहीं मांगी...

 चुनावी धांधली के आरोपों के बीच गूंजा नारा, इस्तीफा ही तो मांगा है तुम्हारी किडनी तो नहीं मांगी,13 करोड़ वोटों की 'लूट' पर छिड़ा सियासी संग्राम ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे पर अड़ा विपक्ष, सड़कों पर गूंजे तीखे व्यंग्य , हिसाब लूट का ही तो मांगा है तुम्हारी चमड़ी तो नहीं मांगी...



कटनी ।  भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर देश की राजनीति में एक अभूतपूर्व उबाल आ चुका है। चुनाव आयोग के भीतर मचे आंतरिक घमासान और 13 करोड़ मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाए जाने के गंभीर आरोपों के बाद विपक्षी दलों (INDIA ब्लॉक) और छात्र-युवा संगठनों ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। इस देशव्यापी आंदोलन के बीच सड़कों पर एक व्यंग्यात्मक नारा और पैरोडी गीत गूंज रहा है इस्तीफा ही तो मांगा है तुम्हारी किडनी तो नहीं मांगी, हिसाब लूट का ही तो मांगा है तुम्हारी चमड़ी तो नहीं मांगी। यह तीखा व्यंग्य सोशल मीडिया से लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर और राजघाट के विरोध प्रदर्शनों का मुख्य नारा बन चुका है। द हिंदू के अनुसार, विपक्ष इसे भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में 'वोट चोरी' का सबसे बड़ा घोटाला बता रहा है, जबकि सरकार और चुनाव आयोग इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर रहे हैं।

 *विवाद की जड़ क्या है 13 करोड़ वोटों का 'एसआईआर' विवाद*

इस पूरे विवाद की शुरुआत चुनाव आयोग द्वारा चलाए गए विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान से हुई। रॉयटर्स के आंकड़ों के मुताबिक, इस प्रक्रिया के तहत देश की मतदाता सूचियों से लगभग 130 मिलियन (13 करोड़) नाम हटा दिए गए।

आयोग का तर्क है कि यह कार्रवाई डुप्लिकेट, मृत और स्थानांतरित हो चुके मतदाताओं को सूची से बाहर करने के लिए की गई थी ताकि चुनावी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया जा सके।

दूसरी ओर, विपक्ष और सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि इस अभियान की आड़ में जानबूझकर एक बड़ी आबादी को लोकतांत्रिक प्रक्रिया से बेदखल कर दिया गया है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने इस मुद्दे पर एक विस्तृत प्रेजेंटेशन देते हुए आरोप लगाया कि फॉर्म-6 (जिसके जरिए नए नाम जोड़े जाते हैं) में गुपचुप तरीके से कानूनी बदलाव किए गए, जिसके कारण लाखों वैध नागरिकों के मताधिकार छीन लिए गए।विपक्ष का दावा है कि यह पूरी कवायद सत्ताधारी दल को चुनावी लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से की गई एक सोची-समझी 'चुनावी धांधली' है।

 *चुनाव आयोग में अंदरूनी बगावत और खुलासे*

विपक्ष के आरोपों को तब और मजबूती मिली जब द इंडियन एक्सप्रेस की एक खोजी रिपोर्ट सामने आई। इस रिपोर्ट में खुलासा किया गया कि तीन सदस्यीय चुनाव आयोग के अन्य दो चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार लिखित रूप से अपनी गंभीर आपत्तियां दर्ज कराई थीं। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने आरोप लगाया कि आयोग के बड़े फैसले पूरे चुनाव आयोग की सहमति के बिना, सिर्फ ज्ञानेश कुमार के स्तर पर लिए जा रहे थे। दोनों अन्य आयुक्तों ने इन फैसलों को 'अनाधिकृत और अवैध' बताया था। हालांकि, चुनाव आयोग ने स्पष्टीकरण जारी किया कि आयोग के भीतर मतभेद होना एक सामान्य संस्थागत प्रक्रिया है और अंतिम निर्णय हमेशा सर्वसम्मति से ही लिए जाते हैं। लेकिन इस खुलासे ने मुख्य चुनाव आयुक्त की निष्पक्षता पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है।

 *पैरोडी गीत की लोकप्रियता और राजनीतिक संदेश*

सड़कों पर गूंज रहे बोल केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि जनता और राजनीतिक कार्यकर्ताओं का एक तीखा विरोध प्रदर्शन हैं। इस पैरोडी गीत के माध्यम से प्रदर्शनकारी कई गहरे संदेश दे रहे हैं "इस्तीफा ही तो मांगा है तुम्हारी किडनी तो नहीं मांगी..."इस पंक्ति के माध्यम से प्रदर्शनकारी यह कह रहे हैं कि लोकतंत्र में किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति से जवाबदेही मांगना और गड़बड़ी पाए जाने पर उनका इस्तीफा मांगना एक बेहद सामान्य और वैध लोकतांत्रिक प्रक्रिया है। मुख्य चुनाव आयुक्त का पद कोई स्थायी जागीर नहीं है। यदि संस्था की साख खतरे में है, तो पद छोड़ना कोई व्यक्तिगत नुकसान या 'किडनी मांगने' जैसा बड़ा बलिदान नहीं है। "हिसाब लूट का ही तो मांगा है तुम्हारी चमड़ी तो नहीं मांगी..." यह पंक्ति करोड़ों मतदाताओं के नाम हटाए जाने को 'जनादेश की लूट' के रूप में परिभाषित करती है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि वे किसी के साथ कोई व्यक्तिगत हिंसा या शारीरिक नुकसान ('चमड़ी मांगना') नहीं करना चाहते, बल्कि वे केवल देश के नागरिकों के बुनियादी अधिकारों की रक्षा और पारदर्शी चुनावी प्रणाली का पारदर्शी 'हिसाब' मांग रहे हैं।

 *केरल से आया नया मोड़ 20 साल पुराने भ्रष्टाचार मामले की री-ओपनिंग*

विवादों से घिरे मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की मुश्किलें उस समय और बढ़ गईं जब केरल की राज्य सरकार ने उनके खिलाफ एक पुराना मोर्चा खोल दिया। द न्यूज मिनट की रिपोर्ट के अनुसार, केरल सरकार ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ वर्ष 2006 के एक पुराने भ्रष्टाचार मामले में विजिलेंस और एंटी-करप्शन ब्यूरो (VACB) को प्राथमिक जांच के आदेश दे दिए हैं। यह मामला उस समय का है जब ज्ञानेश कुमार केरल कैडर के आईएएस अधिकारी थे और लोक निर्माण विभाग (PWD) के सचिव के रूप में कार्यरत थे। उन पर एक विश्व बैंक सहायता प्राप्त सड़क परियोजना (KSTP) में अनियमितताओं और एक ठेकेदार की आत्महत्या के नोट में नाम होने के गंभीर आरोप हैं। गृह मंत्री रमेश चेन्निथला ने कहा कि सार्वजनिक जवाबदेही समय के साथ खत्म नहीं होती। हालांकि, इस कार्रवाई के समय को लेकर राजनीतिक विश्लेषक इसे राष्ट्रीय स्तर पर चल रहे इस्तीफे के दबाव से जोड़कर देख रहे हैं।

 *सड़कों पर संग्राम, युवा पहुंचा रोड में*

दिल्ली में स्थिति बेहद तनावपूर्ण बनी हुई है। संसद भवन से लेकर चुनाव आयोग मुख्यालय तक विपक्षी सांसदों के मार्च को रोकने के लिए दिल्ली पुलिस ने कड़े सुरक्षा इंतजाम किए हैं। द वायर की रिपोर्ट के अनुसार, कांग्रेस नेता राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा सहित सैकड़ों कार्यकर्ताओं को पुलिस ने हिरासत में लिया था।

इस बीच, युवाओं और छात्रों के संगठन "कॉकरोच जनता पार्टी" (CJP) ने आंदोलन को और तेज कर दिया है। एएफपी और रॉयटर्स की रिपोर्ट्स के मुताबिक, सीजेपी ने मुख्य चुनाव आयुक्त को पद छोड़ने के लिए 48 घंटे का अल्टीमेटम दिया था। इस आंदोलन के चलते दिल्ली में सुरक्षा व्यवस्था चाक-चौबंद कर दी गई है, कई मेट्रो स्टेशन बंद हैं और भारी संख्या में पुलिस बल तैनात किया गया है। दूसरी तरफ, विपक्ष के बढ़ते दबाव के बीच ज्ञानेश कुमार ने अपने कई राज्यों के आधिकारिक दौरे भी रद्द कर दिए हैं, जिससे उनके इस्तीफे की अटकलें तेज हो गई हैं।

*सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा मामला और आगे की राह*

यह मामला अब देश की सर्वोच्च अदालत की दहलीज पर भी पहुंच चुका है। सुप्रीम कोर्ट ने उस याचिका पर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग से जवाब मांगा है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि ज्ञानेश कुमार ने बिना अन्य दो आयुक्तों की कानूनी सहमति के मनमाने तरीके से महत्वपूर्ण निर्णय लिए।

विपक्ष के पास अब ज्ञानेश कुमार की तीन प्रमुख माँगें हैं मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का तत्काल इस्तीफा।

विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया को तुरंत रद्द करना और हटाए गए नामों को बहाल करना। आगामी चुनावों में बैलट पेपर व्यवस्था पर वापस लौटने पर विचार करना। "इस्तीफा ही तो मांगा है..." का यह नारा आज भारतीय राजनीति में जनता की बढ़ती नाराजगी और लोकतांत्रिक संस्थाओं की साख पर उठते सवालों का प्रतीक बन चुका है। चुनाव आयोग जैसी स्वायत्त संस्था, जो भारतीय लोकतंत्र की रीढ़ मानी जाती है, उसके मुखिया पर इस तरह के गंभीर आरोप लगना और सड़कों पर ऐसे नारों का गूंजना यह दर्शाता है कि चुनावी पारदर्शिता को लेकर जनता के भीतर अविश्वास की खाई कितनी गहरी हो चुकी है। अब देखना यह होगा कि सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप और चौतरफा राजनीतिक दबाव के बीच मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार क्या कदम उठाते हैं, और क्या भारतीय चुनाव आयोग अपनी खोई हुई साख को वापस पाने में सफल हो पाता है।

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