कर्तव्य की वेदी पर रिश्तों का त्याग ढीमरखेड़ा में रक्षाबंधन की खुशियों के बीच ड्यूटी की मजबूरी, बहनों का इंतजार रह गया अधूरा
कर्तव्य की वेदी पर रिश्तों का त्याग ढीमरखेड़ा में रक्षाबंधन की खुशियों के बीच ड्यूटी की मजबूरी, बहनों का इंतजार रह गया अधूरा
ढीमरखेड़ा | श्रावण मास की पूर्णिमा का पावन अवसर, चारों ओर छाई हरियाली, घरों में गूंजती किलकारियां और बाजारों में सजी रंग-बिरंगी राखियां यह दृश्य है भाई-बहन के अटूट स्नेह और पवित्र प्रेम के प्रतीक पर्व ‘रक्षाबंधन’ का । हर बहन अपनी रेशमी डोर से भाई की कलाई सजाने को आतुर रहती है, तो हर भाई अपनी बहन के चेहरे पर मुस्कान देखने और उसकी रक्षा का वचन दोहराने के लिए बेताब रहता है। लेकिन इसी रक्षाबंधन की चमक-दमक के बीच एक मौन दर्द और गहरा सन्नाटा भी तैरता है।ढीमरखेड़ा क्षेत्र में जहां एक ओर परिवारों में खुशियों के चिराग जल रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कर्तव्य की बलिवेदी पर तैनात कर्मचारियों के घरों में इस बार भी बहनों का इंतजार अधूरा रह गया। त्यौहार हर किसी के जीवन में उमंग लेकर आता है, लेकिन समाज, देश और कानून-व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने वाले तंत्र के लिए यह समय सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण और जिम्मेदारी भरा होता है। जब पूरा समाज अपनों के साथ खुशियां बांटने में व्यस्त होता है, तब वर्दीधारी और आवश्यक सेवाओं के कर्मचारी अपनी व्यक्तिगत भावनाओं को परे रखकर सड़क, थानों, अस्पतालों और प्रशासनिक मोर्चों पर डटे रहते हैं।
*कर्तव्य का कठोर पथ और भावना शून्य वर्दी*
ढीमरखेड़ा और आसपास के ग्रामीण अंचलों में रक्षाबंधन का पर्व पारंपरिक श्रद्धा और हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। बहने सुबह से ही पूजा की थाली सजाकर अपने भाइयों के आने की राह तक रही हैं। लेकिन पुलिस महकमे, राजस्व विभाग, स्वास्थ्य सेवाओं, और विद्युत विभाग में तैनात कर्मचारियों के लिए यह दिन एक अलग ही कसौटी लेकर आता है।खाकी वर्दी पहनते ही एक व्यक्ति सबसे पहले देश और समाज का प्रहरी बन जाता है। रक्षाबंधन के पावन अवसर पर जहां हर भाई अपनी बहन की सुरक्षा का संकल्प लेता है, वहीं पुलिस और सुरक्षा बल पूरे क्षेत्र की बहनों और नागरिकों की सुरक्षा का जिम्मा अपने कंधों पर उठाते हैं। ढीमरखेड़ा थाने और आसपास की चौकियों में तैनात पुलिसकर्मियों के चेहरे पर भले ही अनुशासन की कठोरता दिखाई दे, लेकिन उनके भीतर भी एक भाई का कोमल दिल धड़कता है।मोबाइल की स्क्रीन पर जब बहन का संदेश या वीडियो कॉल आता है, तो एक क्षण के लिए खाकी के पीछे छिपा भाई भावुक हो जाता है। "भैया, इस बार भी नहीं आओगे?" बहन का यह सीधा सा सवाल उस सिपाही के सीने में हजार सुइयां चुभो देता है, जो मुख्य चौराहे पर यातायात सुचारू करने या कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए धूप और बारिश में खड़ा रहता है।
*अधूरा इंतजार और सूनी कलाई का दर्द*
त्योहार के इस अवसर पर ढीमरखेड़ा के कई घरों में माहौल बेहद भावुक है। किसी का बेटा, किसी का पति तो किसी का भाई अपनी ड्यूटी के कारण सैकड़ों किलोमीटर दूर तैनात है। जिन भाइयों की बहनें नहीं हैं, उनके लिए रक्षाबंधन का दिन अक्सर पुरानी यादों, बचपन की खाली जगहों और एक अजीब से अकेलेपन का एहसास लेकर आता है। वे दूसरों को कलाई पर राखी बांधते देखते हैं, तो उनके मन में एक टीस उठती है। जिन कर्मचारियों की बहनें अपने भाइयों के घर आने की आस लगाए बैठी रहती हैं, उनके लिए समय मानो ठहर जाता है। दरवाजे की हर आहट पर बहन की निगाहें उठती हैं कि शायद इस बार उसका भाई सरप्राइज देकर सामने खड़ा हो जाए। लेकिन जैसे-जैसे दिन ढलता है, मिठाई की थाली ठंडी पड़ जाती है और रेशमी धागा लिफाफे में बंद होकर डाक द्वारा भेजने की मजबूरी बन जाता है। एक पुलिस आरक्षक ने बताया कि हर साल सोचता हूं कि इस रक्षाबंधन पर छुट्टी लेकर घर जाऊंगा। बहन से वादा भी करता हूं, लेकिन जैसे ही त्यौहार नजदीक आता है, सुरक्षा व्यवस्था की संवेदनशीलता को देखते हुए छुट्टियां रद्द हो जाती हैं। बहन को फोन पर समझाना सबसे मुश्किल काम होता है। जब वह रोती है, तो वर्दी का वजन कई गुना बढ़ जाता है।
*दूसरों के त्यौहार को महकाती उनकी कुर्बानियां*
रक्षाबंधन केवल एक धार्मिक या पारिवारिक परंपरा नहीं है, यह रिश्तों की गहराई और त्याग की कसौटी भी है।ढीमरखेड़ा में रक्षाबंधन के दिन जब लोग शांति से अपने घरों में पकवान खा रहे होते हैं और खुशियां मना रहे होते हैं, तब ये कर्मचारी बिना थके, बिना किसी शिकायत के अपनी ड्यूटी पर मुस्तैद रहते हैं। मेलों, बाजारों और संवेदनशील चौराहों पर शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए 24 घंटे गश्त। अस्पतालों के आपातकालीन वार्ड में मुस्तैद डॉक्टर और नर्सिंग स्टाफ, जो मरीज की जान बचाने के लिए अपने त्यौहार का त्याग करते हैं। आंधी या बारिश के बीच किसी के घर की बत्ती न बुझे, इसके लिए खंभों पर चढ़कर बिजली सुधारते कर्मचारी।
इन कर्मचारियों का यह त्याग ही समाज को सुरक्षित और बेफिक्र रहने की गारंटी देता है। दूसरों के घर के चिराग रोशन रहें, इसके लिए ये अपने घर के उत्सव को पीछे छोड़ देते हैं।
*रिश्तों से बढ़कर फर्ज सलाम है इस जज्बे को*
ढीमरखेड़ा का यह रक्षाबंधन हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि असली 'रक्षा' का धर्म कौन निभा रहा है। एक ओर जहां भाई अपनी बहन की निजी सुरक्षा और खुशी का दायित्व निभाता है, वहीं ये सरकारी सेवा में तैनात जांबाज पूरे समाज की रक्षा का संकल्प पूरा करते हैं।
इनकी कलाई पर भले ही रक्षाबंधन के दिन रेशम का धागा न बंधे, लेकिन पूरा क्षेत्र इनके प्रति कृतज्ञता के धागे से बंधा होता है। इनकी सूनी कलाई समाज के प्रति इनके अटूट समर्पण की गवाही देती है। रक्षाबंधन का यह अवसर केवल राखी बांधने का पर्व नहीं है, बल्कि इन कर्मचारियों के निस्वार्थ भाव, समर्पण और त्याग को समझने का दिन भी है। ढीमरखेड़ा का हर नागरिक आज ऐसे सभी पुलिसकर्मियों, प्रशासनिक अधिकारियों, डॉक्टरों और आवश्यक सेवाओं में लगे कर्मचारियों के त्याग को नमन करता है। परिवार से दूर रहकर, आंसुओं को छिपाकर और चेहरे पर मुस्कान रखकर समाज की ढाल बनने वाले इन नायकों का कर्ज यह देश और समाज कभी नहीं चुका सकता। इस रक्षाबंधन पर हमारी संवेदनाएं और हमारी दुआएं उन सभी भाइयों और बहनों के साथ हैं, जो कर्तव्य की राह पर चलकर रिश्तों की सबसे खूबसूरत मिसाल पेश कर रहे हैं।

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