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सेवा संकल्प यात्रा' पर विपक्ष का तीखा वार कहा जनता की गाढ़ी कमाई पर हो रहा सियासी तमाशा चुनावी स्टंट या समाज सेवा सेवा संकल्प यात्रा' पर विपक्ष ने घेरा, कहा खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे' जैसी है सत्तापक्ष की हालत विपक्ष का बड़ा दावा, वाराणसी से वड़नगर तक 'सेवा' नहीं, आगामी चुनावों के लिए बिछाई जा रही है सियासी बिसात दिखावे की राजनीति' पर विपक्ष का कड़ा ऐतराज, बोले जमीनी मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए निकाला जा रहा 'संकल्प मार्च' मुद्दों से 'नौ दो ग्यारह' होने के लिए हो रही यात्राएं विपक्ष ने 'सेवा संकल्प' को बताया छलावा

 सेवा संकल्प यात्रा' पर विपक्ष का तीखा वार कहा जनता की गाढ़ी कमाई पर हो रहा सियासी तमाशा चुनावी स्टंट या समाज सेवा सेवा संकल्प यात्रा' पर विपक्ष ने घेरा, कहा खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे' जैसी है सत्तापक्ष की हालत विपक्ष का बड़ा दावा, वाराणसी से वड़नगर तक 'सेवा' नहीं, आगामी चुनावों के लिए बिछाई जा रही है सियासी बिसात दिखावे की राजनीति' पर विपक्ष का कड़ा ऐतराज, बोले जमीनी मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए निकाला जा रहा 'संकल्प मार्च' मुद्दों से 'नौ दो ग्यारह' होने के लिए हो रही यात्राएं विपक्ष ने 'सेवा संकल्प' को बताया छलावा



कटनी |  देश के राजनीतिक पटल पर चल रही 'सेवा संकल्प यात्रा' इस समय चर्चा का केंद्र बनी हुई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन के गौरवमयी 25 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में और उनके 76वें जन्मवर्ष के अवसर पर शुरू की गई इस यात्रा ने राजनीति की पारंपरिक परिभाषा को बदलकर रख दिया है। वड़नगर से वाराणसी और वाराणसी से वड़नगर तक युवाओं की यह टोली केवल दूरी नहीं नाप रही, बल्कि समाज में 'सेवा परमो धर्म:' के संदेश को भी गहराई से बो रही है। जहां सत्तापक्ष इसे जनसेवा की अनूठी मिसाल बता रहा है, वहीं राजनीतिक गलियारों में इसके निहितार्थों को लेकर तर्क-वितर्क का बाजार भी बेहद गर्म है।

 *तर्कों की कसौटी पर यात्रा, 'हाथ कंगन को आरसी क्या*

समर्थकों का साफ तर्क है कि यह यात्रा केवल सत्ता की चमक दिखाने के लिए नहीं है, बल्कि 'दीये से दीया जलाने' जैसी राष्ट्र-निर्माण की एक मुहिम है। युवाओं के दल गांवों में चौपाल लगा रहे हैं, 'एक पेड़ मां के नाम' के तहत पौधरोपण कर रहे हैं और स्वच्छता अभियानों से गांवों की सूरत बदल रहे हैं।समर्थकों का कहना है कि जब देश का युवा खुद जमीन पर उतरकर 'कमर कस चुका है', तो विकास को रफ्तार मिलना तय है। ग्रामीण और शहरी भारत के बीच की खाई को पाटने का यह प्रयास जमीन पर साफ दिखाई दे रहा है, और इसके लिए किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है यानी 'हाथ कंगन को आरसी क्या और पढ़े-लिखे को फारसी क्या।' 

 *विपक्ष के बदले सुर 'खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे'*

दूसरी तरफ, विपक्षी खेमे में इस यात्रा को लेकर खासी खलबली देखी जा रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस यात्रा ने विपक्ष के लिए 'सांप-छछूंदर की गति' बना दी है वे न तो इस सामाजिक सेवा का खुलकर विरोध कर पा रहे हैं और न ही इसे पचा पा रहे हैं। कुछ विपक्षी नेताओं द्वारा इसे 'चुनावी स्टंट' करार देने पर सत्तापक्ष के रणनीतिकारों का कहना है कि विपक्ष की हालत इस समय 'खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे' जैसी हो गई है। जब खुद जमीन पर उतरकर जनता के सुख-दुख में भागीदार बनने की बारी आती है, तो विपक्ष 'नौ दो ग्यारह' हो जाता है और जब सरकार जनता के द्वार पहुंचती है, तो वे 'आसमान सिर पर उठा लेते हैं'।

 *'मैं से हम' का सफर जमीनी हकीकत या सियासी बिसात*

यात्रा के दौरान स्वयं प्रधानमंत्री ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से सेवा यात्रियों से संवाद किया और इसे 'मैं से हम' तक का सफर बताया। पंडित दीनदयाल उपाध्याय के 'अंत्योदय' के सिद्धांतों को याद करते हुए उन्होंने साफ किया कि यह यात्रा राजनीति से परे देश-निर्माण का जरिया है।

परंतु, राजनीति के पंडित इसे महज एक सामाजिक यात्रा मानने को तैयार नहीं हैं। उनका तर्क है कि वड़नगर (पीएम की जन्मभूमि) और वाराणसी (उनकी कर्मभूमि) को जोड़कर भाजपा ने एक तीर से कई निशाने साधे हैं। यह यात्रा उस समय निकाली जा रही है जब देश की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में युवाओं को सीधे संगठन और राष्ट्र सेवा से जोड़ना, विरोधियों के हौसले पस्त करने के लिए 'नहले पर दहला' साबित हो रहा है। 

*'दूध का दूध और पानी का पानी'*

बहरहाल, 17 सितंबर से शुरू होकर 17 अक्टूबर तक चलने वाले इस 'सेवा संकल्प अभियान' ने देश की सियासत में हलचल जरूर पैदा कर दी है। क्या यह यात्रा केवल सेवा का माध्यम है या फिर आने वाले चुनावों के लिए मजबूत जमीन तैयार करने की रणनीति? इस बात का फैसला तो आने वाला वक्त ही करेगा, और जनता की अदालत में जल्द ही 'दूध का दूध और पानी का पानी' हो जाएगा। फिलहाल तो इतना साफ है कि सेवा यात्रियों के बढ़ते कदम और उनके चेहरों का उत्साह विरोधियों के माथे पर चिंता की लकीरें खींचने के लिए काफी है।

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