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बदलते जमाने के ओट में छुपती इंसानी नीयत, जमाना बदल रहा है कहकर लोग बदल रहे हैं, गौर किया तो देखा, कुछ भी नहीं बदला, बस सब अपने मतलब के हिसाब से चल रहे हैं

 बदलते जमाने के ओट में छुपती इंसानी नीयत, जमाना बदल रहा है कहकर लोग बदल रहे हैं,

गौर किया तो देखा, कुछ भी नहीं बदला, बस सब अपने मतलब के हिसाब से चल रहे हैं



ढीमरखेड़ा  |  हंसमुख स्वभाव और गहरी सामाजिक समझ के धनी योगेन्द्र सिंह दादा ठाकुर की ये पंक्तियां आधुनिक समाज की उस कड़वी और नग्न सच्चाई को उजागर करती हैं, जिसे हम अक्सर 'आधुनिकता' के खूबसूरत पर्दों के पीछे छुपाने की कोशिश करते हैं। इन सीधे मगर बेहद गहरे शब्दों में लेखक राहुल पाण्डेय ने समय के चक्र और इंसान की नीयत के बीच के उस अंतर्विरोध पर चोट की है, जो आज के सामाजिक ताने-बाने को खोखला कर रहा है।

*बहानेबाजी का पर्दाफाश 'जमाने' को दोष क्यों*

आज के दौर में जब भी रिश्तों में खटास आती है, रूखापन बढ़ता है या अपनों के बीच दूरियां बढ़ती हैं, तो एक घिसा-पिटा जुमला बहुत आसानी से उछाल दिया जाता है क्या करें, अब जमाना बदल गया है लेकिन दादा ठाकुर की पंक्तियां इस जुमले की कलाई खोलकर रख देती हैं। सच तो यह है कि समय के बदलने से इंसानी फितरत नहीं बदलती।सदियों पहले भी समाज में स्वार्थ और परमार्थ की जंग थी, और आज भी वही है। वक्त को दोष देना दरअसल अपने व्यवहार, अपनी बेरुखी और अपनी कमियों को सही ठहराने का एक सुविधाजनक बहाना मात्र है।

*गौर करने पर खुला स्वार्थ का खेल*

जब कोई व्यक्ति सतही चकाचौंध से ऊपर उठकर गहराई से समाज का अवलोकन करता है, तो उसे अहसास होता है कि 'जमाने का बदलना' सिर्फ एक छलावा है। असलियत यह है कि आज के दौर में रिश्तों का मूल्यांकन भावना से नहीं, बल्कि 'उपयोगिता' से होने लगा है। लोग केवल उन्हीं गलियारों में कदम बढ़ाते हैं और उन्हीं कंधों पर हाथ रखते हैं, जहाँ उनका कोई 'मतलब' या व्यक्तिगत हित सध रहा हो।जिसे हम आज 'नेटवर्किंग' या 'प्रैक्टिकल होना' कहते हैं, वह असल में शुद्ध मतलबपरस्ती का ही एक नया, परिष्कृत रूप है।

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