शराब की दुकानें खोल दी जाएं तो सबसे पहले वही लोग दिखेंगे जिनके पास खाने के पैसे तक नहीं हैं कटनी | समाज का यह विडंबनापूर्ण दृश्य किसी फ़िल्मी कहानी का हिस्सा नहीं, बल्कि हमारे आसपास रोज़ दिखाई देने वाली कड़वी हकीकत है। सरकार जब भी शराब की दुकानें खोलने का निर्णय लेती है, तो सुबह - सुबह दुकानों के बाहर जो भीड़ सबसे पहले नज़र आती है, उसमें बड़ी संख्या उन्हीं लोगों की होती है जो रोज़ के खाने के लिए भी संघर्ष करते हैं। गरीब मजदूर, दिहाड़ी पर काम करने वाले, आर्थिक तंगी से जूझ रहे परिवारों के सदस्य ये सभी सबसे पहले लाइन में दिखाई देते हैं। *गरीबी का दंश और नशे का आकर्षण* कुछ लोग इसे केवल ‘व्यक्तिगत कमजोरी’ कहकर टाल देते हैं, पर वास्तविकता कहीं अधिक जटिल होती है। गरीबी केवल पैसे की कमी नहीं है; यह सामाजिक तनाव, मानसिक दबाव, भविष्य को लेकर अनिश्चितता और हर दिन की जद्दोजहद से उपजने वाली हताशा का नाम भी है। ऐसे में कई लोग शराब में ‘क्षणिक राहत’ ढूँढते हैं। उन्हें लगता है कि कुछ देर के नशे में रहने से दुख कम हो जाएँगे, समस्याएँ हल्की पड़ जाएँगी। यही सोच धीरे-धीरे उन्हें इस दुष्चक...