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धान खरीदी केंद्र सिहुड़ी अव्यवस्थाओं और मनमानी का गढ़, किसानों को मिल रहा ठेंगा , खरीदी प्रभारी नारायण पटेल के हौसले बुलंद, नहीं हैं हड़प्पा की सुविधा

 धान खरीदी केंद्र सिहुड़ी अव्यवस्थाओं और मनमानी का गढ़, किसानों को मिल रहा ठेंगा , खरीदी प्रभारी नारायण पटेल के हौसले बुलंद, नहीं हैं हड़प्पा की सुविधा 



कटनी  |  धान खरीदी केंद्रों की स्थापना इस उद्देश्य से की गई थी कि किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर पारदर्शी, निष्पक्ष और सुव्यवस्थित तरीके से धान बेचने की सुविधा मिले। सरकारें दावा करती हैं कि किसानों के हित ही उनकी प्राथमिकता हैं, परंतु जमीनी हकीकत अक्सर इन दावों को कटघरे में खड़ा कर देती है। सिहुड़ी धान खरीदी केंद्र की वास्तविक स्थिति इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहां अव्यवस्थाओं, मनमानी और नियमों की खुलेआम धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं। केंद्र प्रभारी नारायण पटेल के संचालन में चल रहे इस केंद्र की हालत ऐसी है कि यहाँ अन्नदाताओं को सुविधा नहीं, बल्कि परेशानी और अपमान ही हासिल हो रहा है।

*सुविधाओं के नाम पर जीरो व्यवस्था किसानों की मजबूरी का मज़ाक*

धान बेचने पहुंचे किसान बताते हैं कि केंद्र में बैठने की कोई उचित व्यवस्था नहीं है। सुबह से शाम तक लंबी कतारों में खड़े रहना उनकी मजबूरी बन गई है। खेतों से धान लाकर घंटों इंतजार करने के बाद भी उन्हें बुनियादी सुविधाएँ तक नहीं मिलतीं।

ना हड़प्पा का इंतज़ाम है, ना आराम करने के लिए शेड, धूप हो या सर्दी, किसान खुले आसमान के नीचे खड़े रहने को मजबूर हैं। इसके साथ ही शौचालय की कोई व्यवस्था नहीं है। सरकारी निर्देशों के अनुसार हर खरीदी केंद्र में शौचालय, पेयजल, बैठक और प्रकाश की व्यवस्था अनिवार्य है, लेकिन सिहुड़ी केंद्र में इनका नाम तक नहीं है ।  किसान बताते हैं कि केंद्र प्रभारी से शिकायत करने पर उल्टा उन्हें ही डांट-फटकार सुननी पड़ती है ।

*पेयजल संकट प्यास से बेहाल अन्नदाता*

किसानों को घंटों प्यासे खड़ा रहना पड़ता है। केंद्र में पीने के पानी की सुविधा पूरी तरह नदारद है। कई किसान बताते हैं कि पानी खरीदकर पीना पड़ता है, जो कि उनके लिए अतिरिक्त आर्थिक बोझ है। विडंबना यह है कि सरकार किसानों को ‘देश का अन्नदाता’ कहती है, पर उसी अन्नदाता के लिए पानी तक उपलब्ध नहीं कराया जाता ।

*41 किलो 200 ग्राम की तौल नियमों की खुली धज्जियाँ*

धान खरीदी प्रक्रियाओं में सबसे बड़ी पारदर्शिता का आधार है मानक तौल लेकिन सिहुड़ी केंद्र में तौल के नाम पर खुला खेल चल रहा है। किसानों के अनुसार यहाँ प्रति बोरी 41 किलो 200 ग्राम की तौल की जा रही है, जबकि नियम के अनुसार तौल 40 किलो से अधिक नहीं होनी चाहिए। इस अतिरिक्त वजन का सीधा नुकसान किसान को होता है। अधिक वजन डालने पर एक ही दिन में हजारों रुपए का नुकसान किसानों की जेब से निकल जाता है। यह चोरी किसके इशारे पर होती है, यह सब समझते हैं पर बोलने से डरते हैं कि कहीं खरीदी ही न रोक दी जाए।

*खरीदी केंद्र पर बोर्ड तक नहीं लगा पारदर्शिता से दूरी*

अवैधता और मनमानी का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि केंद्र में खरीदी का बोर्ड तक नहीं लगा है। कौन-कौन से नियम लागू हैं?

किस भाव पर खरीदी हो रही है?

कौन अधिकारी तैनात है?

कितनी मात्रा का लक्ष्य है? इन सभी का कोई भी विवरण कहीं प्रदर्शित नहीं है। यह सीधे-सीधे पारदर्शिता को खत्म करने और मनमानी के रास्ते खोलने जैसा है।

*अमानक धान की तौल नियमों का उल्लंघन*

किसानों का आरोप है कि केंद्र में अमानक धान की भी तौल कराई जा रही है, जबकि सरकार इसके लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश देती है कि अमानक धान की खरीद अलग प्रक्रिया के तहत ही होनी चाहिए। यहाँ बिना किसी जांच के, बिना सैंपल लिए, सिर्फ ‘मनमर्जी’ से अमानक धान की भी तौल हो रही है, जिससे भ्रष्टाचार की संभावना और बढ़ जाती है।

*नोडल अधिकारी और सर्वेयर नदारद जिम्मेदारी किस पर*

सबसे गंभीर मुद्दा यह है कि केंद्र में ना नोडल अधिकारी मौजूद हैं और ना ही सर्वेयर। इनकी अनुपस्थिति का अर्थ है कि गुणवत्ता जांच नहीं हो रही, तौल की निगरानी नहीं, किसान की शिकायत पर सुनवाई नहीं, भुगतान प्रक्रिया में भी गड़बड़ी की संभावना। सरकार द्वारा नियुक्त अधिकारी यदि मौके पर मौजूद ही नहीं हैं तो खरीदी की प्रक्रिया किसके भरोसे चल रही है? यह बड़ा सवाल है।

*केंद्र प्रभारी नारायण पटेल के हौसले बुलंद  किसानों को दिखाया जा रहा ठेंगा*

किसानों का कहना है कि केंद्र प्रभारी नारायण पटेल की मनमानी चरम पर है। नियमों को दरकिनार करते हुए वे जिस तरह से तौल, व्यवस्था और संचालन कर रहे हैं, उससे साफ है कि उन्हें न तो प्रशासन का डर है और न ही किसी शिकायत की परवाह। किसानों के अनुसार प्रभारी उन्हें प्रताड़ित करने जैसा व्यवहार करते हैं। उनकी बातें सुनते नहीं, उल्टा उलझ जाते हैं। कई किसान यह भी बताते हैं कि यदि कोई किसान अनियमितताओं की शिकायत करता है तो उसकी तौल रोक दी जाती है या अनावश्यक बहाने बनाकर उसे वापस लौटा दिया जाता है। यह व्यवहार सिर्फ गैर जिम्मेदाराना नहीं, बल्कि किसानों का सीधा अपमान भी है।

*किसानों की परेशानियाँ मगर सुनने वाला कोई नहीं*

किसानों की समस्या यह है कि वे मजबूर हैं। धान बेचना है, घर का खर्च चलाना है, कर्ज चुकाना है। इसलिए वे मन मारकर इस अव्यवस्था में भी खड़े रहने को विवश हैं। शिकायत करने पर कार्रवाई की जगह उल्टा परेशानी बढ़ने का डर है। कई किसानों ने बताया कि उन्होंने स्थानीय अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को भी जानकारी दी, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। इससे केंद्र प्रभारी और भी बेखौफ हो गए हैं।

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