ग्राम पंचायत घुघरी में कथित वित्तीय अनियमितताएँ, जनविश्वास, पारदर्शिता और सुशासन की परीक्षा, लोकतंत्र का आधार स्तंभ ग्राम पंचायतें
ग्राम पंचायत घुघरी में कथित वित्तीय अनियमितताएँ, जनविश्वास, पारदर्शिता और सुशासन की परीक्षा, लोकतंत्र का आधार स्तंभ ग्राम पंचायतें
कटनी | भारत जैसे विशाल और वैविध्यतापूर्ण देश में लोकतंत्र केवल संसद या राज्य विधानसभाओं के भव्य भवनों तक सीमित नहीं है।इसकी वास्तविक जड़ें, इसकी आत्मा, हमारे गाँवों में बसती है। त्रि-स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था के अंतर्गत ग्राम पंचायतें लोकतंत्र की सबसे निचली, किंतु व्यावहारिक दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण इकाई हैं। ग्रामीण भारत के सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन का दायित्व इन्हीं संस्थाओं पर निर्भर है। पेजल की व्यवस्था हो, स्वच्छता अभियान, प्रधानमंत्री आवास योजना, सुदूर ग्रामीण सड़कों का निर्माण, मनरेगा के तहत रोजगार का सृजन या समाज के अंतिम व्यक्ति तक जनकल्याणकारी योजनाओं की पहुँच इन सभी मूलभूत कार्यों का निष्पादन और प्रबंधन ग्राम पंचायतों के माध्यम से ही होता है। यही कारण है कि जब एक आम ग्रामीण सरकार की उपस्थिति महसूस करता है, तो वह किसी केंद्रीय या राज्यस्तरीय अधिकारी के रूप में नहीं, बल्कि अपनी ग्राम पंचायत के सरपंच, सचिव और रोजगार सहायक के रूप में देखता है।
लेकिन, जब इसी व्यवस्था के भीतर से फर्जी बिलों के निर्माण, सरकारी राशि के गबन, घटिया निर्माण कार्य, पेयजल योजनाओं में हेराफेरी या पंचायत सचिवों की लंबे समय तक गैर-मौजूदगी जैसे गंभीर आरोप सामने आते हैं, तो यह मामला किसी एक भौगोलिक सीमा या एक पंचायत विशेष तक सीमित नहीं रह जाता। यह पूरे ग्रामीण प्रशासनिक ढाँचे की साख, उसकी पारदर्शिता और सबसे बढ़कर जनता के विश्वास पर एक करारा आघात करता है।
*घुघरी ग्राम पंचायत एक चेतावनी भरा उदाहरण*
ग्राम पंचायत घुघरी में सरपंच और सचिव पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं जैसे फर्जी बिलों के माध्यम से सरकारी धन की निकासी, नल-जल योजना के लिए जारी की गई राशि का संदिग्ध उपयोग, और विभिन्न विकास कार्यों में बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितताएँ।ग्रामीणों का आरोप है कि धरातल पर काम कम और कागजों में खर्च अधिक दिखाया गया है। इस परिस्थिति में ग्रामीणों का आक्रोश और उनके द्वारा वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों को ज्ञापन सौंपकर निष्पक्ष और समयबद्ध जांच की मांग करना पूरी तरह स्वाभाविक है। ग्रामीण प्रशासन से यह अपेक्षा करते हैं कि उनके पसीने की कमाई (टैक्स) से प्राप्त सरकारी राशि का एक-एक रुपया उनके गाँव की भलाई में लगे, न कि किसी के व्यक्तिगत लाभ की भेंट चढ़ जाए। हालाँकि, इस पूरे परिदृश्य में विचार का एक दूसरा और बेहद महत्त्वपूर्ण पक्ष भी है। संविधान और कानून का मूल दर्शन 'प्राकृतिक न्याय' के सिद्धांत पर आधारित है।
*वित्तीय अभिलेखों का गहन ऑडिट*
पंचायत के बैंक खातों, जारी चेक, स्वीकृत वाउचरों और बिल जारी करने वाली एजेंसियों (वेंडर्स) का सूक्ष्मता से मिलान किया जाए। फर्जी फर्मों के नाम पर राशि हस्तांतरित करने के मामलों की फॉरेंसिक वित्तीय जांच हो। केवल कागजों में नल-जल योजना की पाइपलाइन या सड़क का निर्माण देख लेने से काम नहीं चलेगा। प्रशासनिक और तकनीकी विशेषज्ञों की टीम को स्वयं मौके पर जाकर यह देखना होगा कि पाइपलाइन बिछी है या नहीं, पानी आ रहा है या नहीं, और सड़क की गुणवत्ता निर्धारित मानकों के अनुरूप है या नहीं। यदि जांच में वित्तीय हेराफेरी प्रमाणित होती है, तो केवल स्थानांतरण या निलंबन जैसी रस्म अदायगी नहीं होनी चाहिए।गबन की गई राशि की वसूली संबंधित व्यक्तियों की संपत्ति से की जानी चाहिए, और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत आपराधिक मामले (FIR) दर्ज किए जाने चाहिए। ग्रामीण विकास योजनाओं का मूल उद्देश्य गाँव के अंतिम व्यक्ति का जीवन आसान बनाना, गरीबी मिटाना और बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध कराना है न कि यह क्षेत्र विवादों, मुकदमों और अविश्वास की रणभूमि बने। इस समस्या का स्थायी समाधान केवल जांच और दंड में नहीं, बल्कि व्यवस्थागत सुधारों में निहित है। इसके लिए सामाजिक अंकेक्षण को महज एक औपचारिकता न बनाकर एक शक्तिशाली और व्यावहारिक हथियार बनाना होगा। ग्राम सभा की बैठकों में केवल कुछ प्रभावशाली लोगों की उपस्थिति के बजाय आम ग्रामीणों, महिलाओं और वंचित वर्गों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए। सूचना का सार्वजनिक प्रकटीकरण पंचायत भवन की दीवारों पर स्पष्ट अक्षरों में लिखा होना चाहिए कि किस योजना में कितना बजट आया, किस कार्य पर कितना खर्च हुआ, और सामग्री किस दर पर खरीदी गई। जब आंकड़े जनता की आँखों के सामने होंगे, तो फर्जी बिल बनाने का दुस्साहस कोई नहीं कर पाएगा।
*डिजिटल पारदर्शिता का प्रभावी उपयोग ई-ग्राम स्वराज पोर्टल* e-GramSwaraj जैसे डिजिटल मंचों का उपयोग कर हर नागरिक को मोबाइल पर ही पंचायत के खर्चों की जानकारी उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
*जनता का धन, जनता के विकास के लिए*
लोकतंत्र में जनता केवल पाँच साल में एक बार वोट देने वाली प्रजा नहीं है, वह शासन व्यवस्था की वास्तविक स्वामी है। जनता का धन, केवल और केवल जनता के विकास के लिए है। घुघरी ग्राम पंचायत का मामला सिर्फ एक गांव की घटना नहीं, बल्कि संपूर्ण पंचायती राज व्यवस्था के लिए एक सबक है। यदि हमें ग्रामीण भारत का सर्वांगीण विकास करना है और लोकतांत्रिक संस्थाओं में आम आदमी का भरोसा कायम रखना है, तो हर शिकायत की निष्पक्ष जांच, दोषियों को बिना किसी राजनीतिक दबाव के सजा, और खर्च किए गए एक-एक रुपये का सार्वजनिक व स्पष्ट हिसाब अनिवार्य करना ही होगा। यही सुशासन का असली मर्म और हमारे लोकतंत्र की प्राथमिक आवश्यकता है।

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