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स्लीमनाबाद में लोकायुक्त का बड़ा ऐक्शन, निजी दफ्तर में 5 हजार की घूस लेते पटवारी रंगे हाथ गिरफ्तार, कार्रवाई के बाद भी प्रशासन की मेहरबानी पर उठे सवाल, अभी भी कर रहा हैं पटवारी नौकरी नहीं हुई निलंबन की कार्यवाही

 स्लीमनाबाद में लोकायुक्त का बड़ा ऐक्शन, निजी दफ्तर में 5 हजार की घूस लेते पटवारी रंगे हाथ गिरफ्तार, कार्रवाई के बाद भी प्रशासन की मेहरबानी पर उठे सवाल, अभी भी कर रहा हैं पटवारी नौकरी नहीं हुई निलंबन की कार्यवाही 



कटनी |  भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की बातें कागजों तक ही सीमित नजर आ रही हैं।ताजा मामला जबलपुर लोकायुक्त टीम की कार्रवाई से सामने आया है, जहां कटनी जिले के बहोरीबंद में पदस्थ एक पटवारी को लोकायुक्त की टीम ने रंगे हाथों रिश्वत लेते हुए दबोचा है। लेकिन इस कार्रवाई के बाद जो प्रशासनिक सुस्ती देखने को मिल रही है, उसने सरकार और स्थानीय प्रशासन की नियत पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। नियमों के मुताबिक, लोकायुक्त या किसी भी भ्रष्टाचार विरोधी एजेंसी द्वारा रंगे हाथों पकड़े जाने के बाद शासकीय सेवक को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया जाना चाहिए। लेकिन इस मामले में आरोपी पटवारी पर गाज गिरना तो दूर, प्रशासन उस पर मेहरबान नजर आ रहा है।

*सीमांकन के बदले मांगी थी 'उपहार' में घूस*

पूरा मामला कटनी जिले के स्लीमनाबाद तहसील का है।आवेदक शिवकुमार जायसवाल ने कुछ समय पहले अपनी पत्नी देववती के नाम पर 1 एकड़ 80 डिसमिल कृषि भूमि खरीदी थी।नियमानुसार, भूमि की खरीदी-बिक्री के बाद उसका सीमांकन (नापजोख) कराना अनिवार्य होता है, ताकि जमीन की वास्तविक स्थिति और सीमाओं का निर्धारण हो सके।शिवकुमार ने अपनी जमीन के सीमांकन के लिए पदस्थ पटवारी स्वयं प्रकाश मेहरा के पास आवेदन किया था। सरकारी नियम के तहत यह पटवारी का दायित्व था कि वह तय समय सीमा के भीतर सीमांकन का कार्य पूरा करे। लेकिन, पटवारी स्वयं प्रकाश मेहरा ने सीधे काम करने के बजाय आवेदक को चक्कर कटवाना शुरू कर दिया।बार-बार मिन्नतें करने के बाद, पटवारी ने सीमांकन करने के ऐवज में "उपहार" के रूप में 5,000 रुपये की रिश्वत की मांग की। आवेदक शिवकुमार जायसवाल रिश्वत नहीं देना चाहते थे, लेकिन पटवारी के अड़ियल रवैये और काम अटकाने की नीयत को देखते हुए उन्होंने इसकी शिकायत लोकायुक्त पुलिस अधीक्षक (जबलपुर) से करने का फैसला किया।

*निजी कार्यालय में बुलाया, लोकायुक्त ने बिछाया जाल*

लोकायुक्त कार्यालय में शिकायत दर्ज होने के बाद, विभाग ने मामले का सत्यापन कराया। शिकायत सही पाए जाने पर लोकायुक्त की टीम ने पटवारी को रंगे हाथों पकड़ने के लिए एक सुनियोजित जाल (ट्रेप) बुना। शिकायतकर्ता शिवकुमार जायसवाल ने जब पटवारी से संपर्क किया, तो आरोपी पटवारी स्वयं प्रकाश मेहरा ने शासकीय कार्यालय के बजाय चालाकी दिखाते हुए आवेदक को स्लीमनाबाद स्थित अपने निजी (प्राइवेट) कार्यालय में बुलाया। पटवारी को लगा कि निजी दफ्तर में वह सुरक्षित रहेगा और किसी को कानों-कान खबर नहीं होगी।

निर्धारित तिथि 9 जून को आवेदक जैसे ही केमिकल युक्त नोटों के साथ पटवारी के निजी कार्यालय पहुंचा, वहां पहले से ही लोकायुक्त की टीम सादे कपड़ों में मुस्तैद थी। शिवकुमार ने जैसे ही 5,000 रुपये की घूस की रकम पटवारी स्वयं प्रकाश मेहरा के हाथों में थमाई, वैसे ही लोकायुक्त की टीम ने धावा बोल दिया। लोकायुक्त की टीम ने आरोपी पटवारी को रंगे हाथों दबोच लिया। जब पटवारी के हाथ केमिकल युक्त पानी से धुलवाए गए, तो पानी का रंग गुलाबी हो गया, जो इस बात का अकाट्य प्रमाण था कि उसने रिश्वत की रकम को अपने हाथों से छुआ और स्वीकार किया था।

*भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज, लेकिन नहीं हुई निलंबन की कार्यवाही अभी भी पटवारी कर रहा हैं नौकरी*

कार्रवाई के बाद लोकायुक्त की टीम आरोपी पटवारी को स्थानीय विश्राम गृह लेकर पहुंची, जहां कागजी औपचारिकताएं पूरी की गईं। लोकायुक्त पुलिस द्वारा आरोपी पटवारी स्वयं प्रकाश मेहरा के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 (संशोधन 2018) की धारा-7, 13(1)B और 13(2) के अंतर्गत मामला दर्ज कर वैधानिक कार्रवाई की जा रही है। इस सफल ट्रेप कार्रवाई को अंजाम देने वाले लोकायुक्त दल में मुख्य रूप से

निरीक्षक राहुल गजभिए (नेतृत्वकर्ता)

निरीक्षक शशि कला मस्कुले

एवं लोकायुक्त कार्यालय जबलपुर के अन्य जांबाज स्टाफ सदस्य।

*नियमों के तहत होना चाहिए तत्काल निलंबन, लेकिन प्रशासन मेहरबान*

इस पूरी कार्रवाई का सबसे हैरान करने वाला पहलू लोकायुक्त के ऐक्शन के बाद शुरू होता है। सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) के स्पष्ट दिशा-निर्देश हैं कि यदि कोई भी शासकीय कर्मचारी या अधिकारी रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों (On the spot) पकड़ा जाता है या उसे 48 घंटे से अधिक समय तक पुलिस/न्यायिक हिरासत में रखा जाता है, तो उसे तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया जाना चाहिए।

*क्या कहता है नियम, प्रावधान*

लोक सेवकों के लिए बने सिविल सेवा आचरण नियमों के तहत, भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों में घिरे और लोकायुक्त द्वारा ट्रैप किए गए कर्मचारी को पद पर बनाए रखना जांच को प्रभावित कर सकता है। इसलिए उसे तुरंत सस्पेंड कर मुख्यालय अटैच किया जाता है।

परंतु, बहोरीबंद के इस मामले में ऐसा कुछ भी होता नजर नहीं आ रहा है। लोकायुक्त की कार्रवाई को बीते दिन हो चुके हैं, लेकिन जिला प्रशासन और राजस्व विभाग के आला अधिकारी आरोपी पटवारी पर मेहरबान बने हुए हैं। पटवारी के खिलाफ निलंबन की फाइल प्रशासनिक टेबल पर धूल खा रही है।

*जनता में आक्रोश, उठ रहे हैं कई गंभीर सवाल*

प्रशासन की इस ढीली कार्यप्रणाली और "मेहरबानी" को देखकर स्थानीय नागरिकों और किसानों में भारी आक्रोश है। स्लीमनाबाद क्षेत्र के किसानों का कहना है कि पटवारी स्वयं प्रकाश मेहरा ने लंबे समय से क्षेत्र में आतंक मचा रखा था। बिना पैसों के कोई भी काम नहीं होता था, चाहे वह नामांतरण हो, बंटवारा हो या सीमांकन। अब जब लोकायुक्त ने उसे रंगे हाथों पकड़ भी लिया, तब भी प्रशासन उसे बचाने का प्रयास कर रहा है। क्षेत्र के प्रबुद्ध नागरिकों ने कुछ तीखे सवाल खड़े किए हैं देरी क्यों? जब लोकायुक्त ने रंगे हाथों पकड़ने के बाद एफआईआर (FIR) दर्ज कर ली है, तो निलंबन आदेश जारी करने में जिला प्रशासन को किस बात का इंतजार है? क्या राजनैतिक संरक्षण प्राप्त है? क्या आरोपी पटवारी को किसी रसूखदार नेता या वरिष्ठ अधिकारी का वरदहस्त प्राप्त है, जिसके कारण उस पर गाज गिरने से रोकी जा रही है?

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