ढीमरखेड़ा में आईटीआई भवन निर्माण की मांग तेज,पोड़ी खुर्द में भूमि आवंटित होने के बावजूद नहीं बना भवन, समाजसेवी विनोद परौहा ने खोला मोर्चा
ढीमरखेड़ा में आईटीआई भवन निर्माण की मांग तेज,पोड़ी खुर्द में भूमि आवंटित होने के बावजूद नहीं बना भवन, समाजसेवी विनोद परौहा ने खोला मोर्चा
ढीमरखेड़ा । ग्रामीण अंचलों में युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने और उन्हें तकनीकी शिक्षा से जोड़ने के उद्देश्य से स्वीकृत किए गए शासकीय औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान (ITI) का भविष्य फिलहाल कागजी दांव-पेच और प्रशासनिक असमंजस के भंवर में फंस गया है।ढीमरखेड़ा क्षेत्र में आईटीआई के स्थायी भवन के निर्माण को लेकर अब स्थिति बेहद संवेदनशील और पेचीदा हो गई है। एक तरफ जहां जिला व स्थानीय प्रशासन इस संस्थान को आनन-फानन में अस्थायी रूप से शासकीय महाविद्यालय ढीमरखेड़ा के भवन में शिफ्ट करने की तैयारी में जुटा है, वहीं दूसरी तरफ क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों, युवाओं और प्रबुद्ध नागरिकों ने इस कदम का मुखर विरोध करते हुए ढीमरखेड़ा मुख्यालय पर ही स्थायी भवन निर्माण की मांग को लेकर आंदोलन का रुख अख्तियार कर लिया है। इस पूरे मामले को प्रमुखता से उठाते हुए क्षेत्र के जाने-माने समाजसेवी, गनियारी अंतर्वेद निवासी विनोद परौहा ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा है कि अस्थायी व्यवस्थाओं के सहारे क्षेत्र के युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ बंद होना चाहिए और सरकार को तुरंत स्थायी बुनियादी ढांचा तैयार करने की दिशा में ठोस कदम उठाने चाहिए।
*अस्थायी शिफ्टिंग बनाम स्थायी निर्माण*
ढीमरखेड़ा में तकनीकी शिक्षा के इस इकलौते केंद्र को लेकर पिछले कुछ समय से प्रशासनिक स्तर पर बैठकों और निर्देशों का दौर जारी है।प्राप्त जानकारी के अनुसार, प्रशासन ने संसाधन और समय की कमी का हवाला देते हुए आईटीआई की कक्षाओं और कार्यशालाओं (वर्कशॉप) को अस्थायी रूप से स्थानीय शासकीय महाविद्यालय (कॉलेज) के भवन में स्थानांतरित करने के निर्देश जारी किए हैं। प्रशासनिक अधिकारियों का तर्क है कि जब तक आईटीआई का अपना खुद का भवन बनकर तैयार नहीं हो जाता, तब तक कॉलेज की खाली जगह या कमरों में संस्थान का संचालन शुरू कर दिया जाए ताकि सत्र प्रभावित न हो और छात्रों को प्रवेश मिल सके।
*जनप्रतिनिधियों और जनता की आपत्ति*
प्रशासन के इस फैसले का जमीन पर कड़ा विरोध हो रहा है। क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों का कहना है कि एक कॉलेज परिसर में तकनीकी संस्थान (आईटीआई) का संचालन व्यावहारिक नहीं है।आईटीआई में भारी मशीनरी, प्रैक्टिकल लैब और वर्कशॉप की आवश्यकता होती है, जिसके लिए कॉलेज का सामान्य भवन उपयुक्त नहीं है। अस्थायी रूप से कॉलेज में शिफ्ट करने के बाद, प्रशासन स्थायी भवन के निर्माण को ठंडे बस्ते में डाल सकता है, जैसा कि अक्सर देखा जाता है। इससे कॉलेज के मूल छात्रों की पढ़ाई और व्यवस्थाओं पर भी विपरीत असर पड़ेगा।
*भूमि आवंटन का पेंच पोड़ी खुर्द की २ एकड़ जमीन का सच*
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब पूर्व में आवंटित की गई भूमि का मामला दोबारा गरमा गया।विश्वसनीय सूत्रों और प्राप्त जानकारी के मुताबिक, पूर्व में शासन द्वारा आईटीआई भवन के निर्माण के लिए ग्राम पोड़ी खुर्द में लगभग दो एकड़ शासकीय भूमि विधिवत रूप से आवंटित की जा चुकी थी।अब सवाल यह उठ रहा है कि जब जमीन पहले से ही चिह्नित और आवंटित है, तो उस पर निर्माण कार्य शुरू कराने में देरी क्यों की जा रही है? जनप्रतिनिधियों ने पुरजोर तरीके से मांग उठाई है कि यदि ग्राम पोड़ी खुर्द में आवंटित की गई दो एकड़ भूमि पर तकनीकी या भौगोलिक रूप से भवन निर्माण संभव है, तो बिना किसी देरी के निविदा (टेंडर) प्रक्रिया शुरू कर निर्माण कार्य तत्काल प्रारंभ कराया जाए।यदि किसी अपरिहार्य कारण या तकनीकी खामी की वजह से पोड़ी खुर्द की जमीन पर निर्माण संभव नहीं है, तो प्रशासन ढीमरखेड़ा मुख्यालय के आसपास ही किसी अन्य उपयुक्त शासकीय भूमि को तत्काल चिह्नित करे और नया स्थायी भवन बनाने की प्रक्रिया को गति दे।
*समाजसेवी विनोद परौहा ने उठाई बुलंद आवाज प्रशासन को दी चेतावनी युवाओं को अस्थायी तसल्ली नहीं, स्थायी अधिकार चाहिए*
एक तकनीकी संस्थान बिना आधुनिक संसाधनों, उचित वर्कशॉप और बड़े परिसर के सिर्फ कागजों पर नहीं चल सकता । इस पूरे मामले में गनियारी अंतर्वेद निवासी और क्षेत्र के सक्रिय समाजसेवी विनोद परौहा ने कड़ा रुख अपनाते हुए प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।उन्होंने क्षेत्र के युवाओं और छात्रों के हक में आवाज बुलंद करते हुए कहा कि ढीमरखेड़ा क्षेत्र हमेशा से विकास के मामलों में उपेक्षा का शिकार रहा है, और अब जब एक महत्वपूर्ण तकनीकी संस्थान यहां आया है, तो उसे भी अस्थायी व्यवस्थाओं की भेंट चढ़ाया जा रहा है। विनोद परौहा ने संबंधित उच्च अधिकारियों, अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) और विभाग के मंत्रियों से मांग की है कि आईटीआई जैसे संस्थान किसी भी क्षेत्र की रीढ़ होते हैं। यहां से पढ़कर निकलने वाले बच्चे फैक्ट्रियों, उद्योगों और स्वरोजगार की दिशा में जाते हैं। यदि उन्हें शुरुआत से ही एक सर्वसुविधायुक्त, आधुनिक संसाधनों से लैस स्थायी भवन नहीं मिलेगा, तो उनकी व्यावहारिक शिक्षा (प्रैक्टिकल नॉलेज) अधूरी रह जाएगी।उन्होंने प्रशासन को आगाह किया कि यदि जल्द ही स्थायी भवन निर्माण को लेकर कोई ठोस और लिखित आश्वासन नहीं मिला, तो क्षेत्र की जनता, छात्र और युवा सड़कों पर उतरकर शांतिपूर्ण आंदोलन करने के लिए बाध्य होंगे।
*छात्रों के भविष्य और गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षण पर संकट*
ढीमरखेड़ा और आसपास के दर्जनों गांवों के छात्रों के लिए यह आईटीआई किसी वरदान से कम नहीं है। इस ग्रामीण क्षेत्र के गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चे बड़े शहरों (जैसे जबलपुर या कटनी मुख्यालय) में जाकर महंगी फीस और रहने का खर्च उठाने में असमर्थ हैं। ऐसे में स्थानीय स्तर पर आईटीआई का खुलना उनके लिए उम्मीद की किरण था।स्थानीय नागरिकों का कहना है कि आईटीआई में फिटर, इलेक्ट्रीशियन, वेल्डर और कंप्यूटर ऑपरेटर जैसे विभिन्न ट्रेड होते हैं। इन ट्रेडों के लिए भारी-भरकम मशीनों, बिजली के बड़े पैनलों और कंप्यूटर लैब्स की जरूरत होती है।

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