मुरवारी में शासकीय भूमि और तालाब पर अतिक्रमण का गहराता विवाद, समाजसेवी अशोक पाण्डेय की आंदोलन की चेतावनी और ग्रामीण विकास के समक्ष चुनौतियाँ
मुरवारी में शासकीय भूमि और तालाब पर अतिक्रमण का गहराता विवाद, समाजसेवी अशोक पाण्डेय की आंदोलन की चेतावनी और ग्रामीण विकास के समक्ष चुनौतियाँ
कटनी | मध्यप्रदेश के कटनी जिले के ढीमरखेड़ा विकासखंड के अंतर्गत आने वाले ग्राम मुरवारी से एक गंभीर मामला प्रकाश में आया है। स्थानीय समाजसेवी अशोक पाण्डेय ने ग्राम पंचायत मुरवारी में सरकारी तालाब, मुक्तिधाम परिसर और पंचायत की बेशकीमती भूमि पर रसूखदारों द्वारा किए गए कथित अवैध कब्जे को लेकर प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने मुख्यमंत्री, क्षेत्रीय सांसद, स्थानीय विधायक, एसडीएम, तहसीलदार और पुलिस प्रशासन सहित पंचायत के जनप्रतिनिधियों को इस संबंध में लिखित शिकायत भेजकर तत्काल कार्रवाई की मांग की है। अशोक पाण्डेय का स्पष्ट कहना है कि यदि प्रशासन ने समय रहते इस अतिक्रमण को नहीं हटाया और दोषियों के खिलाफ सख्त कदम नहीं उठाए, तो वे ग्रामीणों के साथ मिलकर एक बड़ा जन-आंदोलन शुरू करने को विवश होंगे। यह मामला न केवल एक गांव के पर्यावरण और बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुँचाने का है, बल्कि यह प्रशासनिक शिथिलता और सरकारी आदेशों की अवहेलना का भी एक ज्वलंत उदाहरण बन चुका है।
*तालाब को सुखाकर खेती करने का संगीन आरोप*
शिकायतकर्ता अशोक पाण्डेय के अनुसार, यह विवाद वर्ष 2010 से जुड़ा हुआ है। उस समय ग्राम पंचायत मुरवारी में ग्रामीणों के निस्तार और जल संरक्षण की सुविधा के लिए लगभग 10 लाख रुपये की भारी-भरकम लागत से एक सरकारी तालाब का निर्माण कराया गया था। यह तालाब स्थानीय मुक्तिधाम के समीप स्थित है और इसका मुख्य उद्देश्य क्षेत्र में वाटर टेबल (भूजल स्तर) को बनाए रखना तथा मवेशियों व ग्रामीणों के लिए पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करना था। समाजसेवी का आरोप है कि कुछ भू-माफियाओं और स्वार्थी तत्वों ने निजी स्वार्थ के लिए इस सार्वजनिक संपत्ति को निशाना बनाया। उन्होंने कथित तौर पर तालाब के पानी को कृत्रिम रूप से बहा दिया, ताकि वह भूमि सूखी और कृषि योग्य नजर आने लगे। पानी बहाने के बाद, इस बेशकीमती सरकारी भूमि पर अवैध रूप से कब्जा कर लिया गया और वहां धड़ल्ले से खेती की जाने लगी। यह कृत्य न केवल जल संरक्षण के नियमों का उल्लंघन है, बल्कि सीधे तौर पर सार्वजनिक संपत्ति की चोरी और पर्यावरण के साथ खिलवाड़ है। एक ओर सरकार जल संकट से निपटने के लिए 'कैच द रैन' और 'अमृत सरोवर' जैसी करोड़ों रुपये की योजनाएं चला रही है, वहीं दूसरी ओर निर्मित तालाबों को सुखाकर उन पर खेती करना प्रशासनिक तंत्र की नाक के नीचे चल रहे अवैध खेल को उजागर करता है।
*पर्यावरण को भी पहुंचाई क्षति काटे गए आस्था और छाया के प्रतीक वृक्ष*
अशोक पाण्डेय ने अपनी शिकायत में केवल भूमि हड़पने का ही मुद्दा नहीं उठाया, बल्कि पर्यावरण को पहुंचाए गए गंभीर नुकसान की ओर भी ध्यान आकर्षित किया है। उन्होंने बताया कि मुक्तिधाम परिसर को सुंदर, हरा-भरा और शांतिपूर्ण बनाने के उद्देश्य से उन्होंने स्वयं आम जनता के सहयोग और जन-भागीदारी से बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण किया था। इस परिसर में पीपल, नीम, बेल, आम और जामुन जैसे औषधीय और छायादार पौधे लगाए गए थे। इस वृक्षारोपण अभियान के तहत लगाए गए लगभग 50 पौधों में से 11 बड़े हो चुके पेड़ों को कथित तौर पर नुकसान पहुँचाया गया और उन्हें काट दिया गया।
*वृक्षों को नुकसान पहुँचाने का प्रभाव,आस्था को ठेस*
हिंदू संस्कृति में पीपल, नीम और बेल के वृक्षों को बेहद पवित्र माना जाता है।मुक्तिधाम जैसी संवेदनशील जगह पर इन्हें काटना ग्रामीणों की धार्मिक और सामाजिक भावनाओं को आहत करता है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह पेड़ न केवल छाया प्रदान करते हैं, बल्कि स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को भी संतुलित रखते हैं।
*अपराध को बढ़ावा, आमजनता को होना चाहिए जागरूक*
सार्वजनिक स्थान पर लगे पेड़ों को काटना भारतीय वन अधिनियम और पर्यावरण संरक्षण कानूनों के तहत एक दंडनीय अपराध है, जिसे भू-माफियाओं ने अंजाम दिया।
*प्रशासनिक फाइलों में सिमटी कार्यवाही बेदखली के आदेश के बाद भी कब्जा बरकरार*
इस मामले का सबसे चिंताजनक और हैरान करने वाला पहलू प्रशासनिक उदासीनता है। समाजसेवी अशोक पाण्डेय ने बताया कि वे इस विषय को लेकर लंबे समय से कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। उन्होंने पूर्व में ढीमरखेड़ा के तहसीलदार को इस अवैध कब्जे और पेड़ों की कटाई के खिलाफ साक्ष्यों के साथ लिखित शिकायत दी थी। शिकायत के बाद राजस्व विभाग हरकत में आया और जांच प्रक्रिया शुरू की गई। जांच में शिकायत को सही पाया गया लेकिन कार्यवाही नहीं हुई। अशोक पाण्डेय का आरोप है कि कागजों पर बेदखली का आदेश पारित होने के बावजूद, धरातल पर स्थिति जस की तस बनी हुई है। अतिक्रमणकारियों के हौसले इतने बुलंद हैं कि वे इस सरकारी आदेश को ठेंगा दिखाकर आज भी उस भूमि पर काबिज हैं। प्रशासन की इस ढील ने यह साबित कर दिया है कि केवल आदेश पारित कर देना ही काफी नहीं है, जब तक कि उसका कड़ाई से पालन न कराया जाए।
*बढ़ता संक्रमण एक पर कार्रवाई न होने से दूसरों के बढ़े हौसले*
समाजसेवी का दावा है कि प्रशासन की इस लचर कार्यप्रणाली और शिथिलता का सबसे बुरा असर पूरे गांव के माहौल पर पड़ रहा है। जब अन्य असामाजिक तत्वों और भू-माफियाओं ने देखा कि तालाब और मुक्तिधाम की जमीन पर कब्जा करने वालों के खिलाफ प्रशासनिक आदेश जारी होने के बाद भी कोई वास्तविक या दंडात्मक कार्रवाई (जैसे बुलडोजर कार्रवाई या जेल) नहीं हुई, तो उनके हौसले भी बढ़ गए।
परिणामस्वरूप, अब ग्राम पंचायत मुरवारी की अन्य सरकारी और चरनोई (गौचर) भूमियों पर भी अन्य लोगों द्वारा अवैध कब्जे करने का सिलसिला तेजी से शुरू हो गया है। यदि इस "चैन रिएक्शन" को तुरंत नहीं रोका गया, तो आने वाले समय में ग्राम पंचायत के पास विकास कार्यों (जैसे स्कूल, अस्पताल, खेल का मैदान या आंगनवाड़ी) के लिए एक इंच भी सरकारी जमीन शेष नहीं बचेगी।
*आंदोलन की चेतावनी आर-पार की लड़ाई के मूड में दिग्गज नेता अशोक पाण्डेय*
अशोक पाण्डेय ने स्पष्ट शब्दों में शासन और प्रशासन को चेतावनी दी है कि ग्रामीणों के सब्र का बांध अब टूट रहा है।उन्होंने मुख्यमंत्री से लेकर स्थानीय थाना प्रभारी तक सभी को अल्टीमेटम देते हुए कहा है कि यदि प्रशासन ने शीघ्र ही ढीमरखेड़ा तहसील की राजस्व टीम और पुलिस बल को मौके पर भेजकर इस अवैध अतिक्रमण को नहीं हटाया, तालाब को मुक्त नहीं कराया और पेड़ काटने वालों पर आपराधिक मामला दर्ज नहीं किया, तो वे उग्र जन-आंदोलन शुरू करने के लिए विवश होंगे। इस संभावित आंदोलन में ग्राम पंचायत मुरवारी के सैकड़ों ग्रामीण, पर्यावरण प्रेमी और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल होंगे, जिसकी पूरी जिम्मेदारी स्थानीय प्रशासन और ढीमरखेड़ा अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) की होगी।
*त्वरित प्रशासनिक हस्तक्षेप की आवश्यकता*
मुरवारी गांव का यह मामला केवल एक भूमि विवाद नहीं है, बल्कि यह इस बात का लिटमस टेस्ट है कि ग्रामीण क्षेत्रों में कानून का राज कितना प्रभावी है। ₹10 लाख की लागत से बना तालाब अगर भू-माफियाओं की भेंट चढ़ जाता है, तो यह सीधे तौर पर जनता के टैक्स के पैसे की बर्बादी है। प्रशासन को चाहिए कि वह केवल फाइलों में बेदखली का आदेश दबाकर न बैठे, बल्कि मौका मुआयना, तत्काल पुलिस बल के साथ राजस्व अमला मौके पर पहुंचे। अतिक्रमण मुक्ति तालाब और पंचायत की भूमि से अवैध फसलों और कब्जों को बलपूर्वक हटाए। पुनरुद्धार तालाब को उसके मूल स्वरूप में वापस लाया जाए ताकि आगामी वर्षा ऋतु में जल भराव हो सके। कठोर कार्रवाई, बेदखली आदेश की अवहेलना करने वालों पर शासकीय कार्य में बाधा डालने और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने (PDPP Act) के तहत एफआईआर (FIR) दर्ज की जाए।

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