आजीविका मिशन के नाम पर 'सफ़ेद हाथी' बनीं ₹80 हज़ारी भैंसें, ढीमरखेड़ा में बीएम जया कोष्टी पर प्रताड़ना और वित्तीय अनियमितता के गंभीर आरोप ग्रामीण आत्मनिर्भरता पर भ्रष्टाचार का ग्रहण
आजीविका मिशन के नाम पर 'सफ़ेद हाथी' बनीं ₹80 हज़ारी भैंसें, ढीमरखेड़ा में बीएम जया कोष्टी पर प्रताड़ना और वित्तीय अनियमितता के गंभीर आरोप ग्रामीण आत्मनिर्भरता पर भ्रष्टाचार का ग्रहण
कटनी | मध्य प्रदेश सरकार और केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना 'राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन' का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों की अत्यंत गरीब महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना और उन्हें स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से आजीविका के नए साधन प्रदान करना है। लेकिन कटनी जिले के ढीमरखेड़ा ब्लॉक से आजीविका मिशन को शर्मसार करने वाला एक बेहद गंभीर मामला सामने आया है। यहाँ आजीविका मिशन की ब्लॉक मैनेजर (BM) जया कोष्टी पर समूह की गरीब महिलाओं ने वित्तीय शोषण, मानसिक प्रताड़ना और पद के दुरुपयोग के बेहद संगीन आरोप लगाए हैं।आरोप है कि बीएम जया कोष्टी के तानाशाही और दमनकारी रवैये के कारण क्षेत्र की महिलाएं इस कदर खौफजदा और प्रताड़ित हैं कि अब कोई भी महिला आजीविका मिशन के कार्यालय में कदम रखने तक को तैयार नहीं है। योजना, जो महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए थी, आज उनके लिए मानसिक और आर्थिक गले की फांस बन चुकी है।
*₹20 हज़ार की भैंस और ₹80 हज़ार का कर्ज*
पीड़ित महिलाओं द्वारा लगाए गए आरोपों के केंद्र में 'पशुपालन' के नाम पर हुआ एक बड़ा घालमेल है। समूह की महिलाओं का सीधा और स्पष्ट आरोप है कि उन्हें आजीविका मिशन के तहत डेयरी व्यवसाय शुरू करने के लिए जो भैंसें उपलब्ध कराई गईं, उनकी बाजार में वास्तविक कीमत (मार्केट रेट) मुश्किल से 15 से 20 हज़ार रुपये है। ये भैंसें न तो उन्नत नस्ल की हैं और न ही उतना दूध देती हैं जिससे कोई व्यावसायिक लाभ कमाया जा सके। परंतु, बीएम जया कोष्टी और उनके अधीनस्थों द्वारा कागजों पर इन घटिया और कम दूध देने वाली भैंसों की कीमत ₹80,000 प्रति भैंस आंकी गई है। महिलाओं का आरोप है कि इस भारी-भरकम और फर्जी मूल्यांकन के पीछे एक बड़ा कमीशन तंत्र काम कर रहा है, जिसमें सीधे तौर पर गरीब महिलाओं के नाम पर लोन (ऋण) पास कराकर सरकारी धन और समूहों के फंड का बंदरबांट किया गया है।
*एकमुश्त भुगतान का दमनकारी दबाव गरीब महिलाएं ₹80 हज़ार एक बार में कहाँ से लाएं*
मामला केवल महंगी कीमत पर मवेशी थमाने तक ही सीमित नहीं है। पीड़ित महिलाओं का कहना है कि अब बीएम जया कोष्टी द्वारा उन पर एकमुश्त ₹80,000 की पूरी राशि तुरंत लौटाने के लिए चौतरफा दबाव बनाया जा रहा है। ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाली ये महिलाएं बेहद गरीब हैं। उन्होंने आजीविका मिशन का दामन इसलिए थामा था ताकि वे रोज़ाना ₹100-200 कमाकर अपने बच्चों का पेट पाल सकें और धीरे-धीरे किश्तों में कर्ज चुका सकें। महिलाओं का रो-रोकर बुरा हाल है और उनका एक ही यक्ष प्रश्न है जिस भैंस से हमें एक रुपये की आमदनी नहीं हो रही, जो भैंस बाजार में ₹20,000 की भी नहीं बिक सकती, उसके लिए हम गरीब महिलाएं एक बार में ₹80,000 का नकद भुगतान कहाँ से और कैसे करें? महिलाओं ने आरोप लगाया कि बीएम द्वारा उन्हें न केवल मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है, बल्कि किश्तें न चुकाने या विरोध करने पर उन्हें आजीविका मिशन के समूहों से बाहर निकालने और कानूनी कार्रवाई भुगतने की धमकियां भी दी जा रही हैं।इसी प्रताड़ना का नतीजा है कि आज महिलाएं आजीविका मिशन के कार्यालय में जाने से भी डर रही हैं।
*निरीक्षण से कतरातीं बीएम जवाबदेही से भागने का आरोप*
स्वयं सहायता समूह की जागरूक महिलाओं ने इस वित्तीय गड़बड़ी का विरोध करते हुए कई बार ब्लॉक मैनेजर जया कोष्टी से मौखिक गुहार लगाई। महिलाओं का कहना है कि उन्होंने बार-बार बीएम से आग्रह किया कि वे स्वयं फील्ड (मौके पर) आएं, मवेशियों की शारीरिक स्थिति, उनकी नस्ल और उनकी वास्तविक दुग्ध उत्पादन क्षमता का भौतिक सत्यापन करें लेकिन, महिलाओं का आरोप है कि बीएम जया कोष्टी जानबूझकर मौके पर आकर निरीक्षण करने के लिए तैयार नहीं हैं। वे लगातार कार्यालय में बैठकर ही तुगलकी फरमान जारी कर रही हैं। बीएम का ग्राउंड पर आने से कतराना इस बात का साफ संकेत देता है कि उन्हें भी मालूम है कि धरातल पर जो भैंसें बांटी गई हैं, वे ₹80,000 के मूल्य के आसपास भी नहीं ठहरतीं।निरीक्षण न करने का यह अड़ियल रवैया महिलाओं के असंतोष और आक्रोश की आग में घी डालने का काम कर रहा है।
*सरकारी योजनाओं के मूल उद्देश्यों की हत्या*
यदि ढीमरखेड़ा की महिलाओं द्वारा लगाए गए ये आरोप रत्ती भर भी सच हैं, तो यह सीधे तौर पर मध्य प्रदेश राज्य आजीविका मिशन के मूल उद्देश्यों की सरेआम हत्या है। योजना का खाका इस प्रकार खींचा गया था गरीबी उन्मूलन अत्यंत निर्धन परिवारों को आजीविका ट्रैकिंग के माध्यम से मुख्यधारा में लाना। सस्ता और सुलभ ऋण महिलाओं को साहूकारों के चंगुल से बचाकर आसान शर्तों पर लोन देना। पारदर्शिता मवेशी या संसाधन खरीदते समय 'क्रय समिति' में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करना।परंतु ढीमरखेड़ा के इस कथित घटनाक्रम में पारदर्शिता और सहभागिता को ताक पर रख दिया गया। महिलाओं को अंधेरे में रखकर वेंडर (आपूर्तिकर्ताओं) और अधिकारियों की मिलीभगत से घटिया मवेशी महंगे दामों पर मढ़ दिए गए।परिणामस्वरूप, जो महिलाएं आत्मनिर्भर बनने का सपना देख रही थीं, वे आज ₹80,000 के भारी कर्ज के नीचे दबकर डिफाल्टर होने की कगार पर खड़ी हैं। मामले का प्रशासनिक और सामाजिक पहलू
इस पूरे विवाद ने ढीमरखेड़ा ब्लॉक में एक बड़ा सामाजिक और प्रशासनिक संकट खड़ा कर दिया है। जब सरकारी अमला ही शोषक की भूमिका में आ जाएगा, तो ग्रामीण महिलाओं का सरकारी योजनाओं और स्वयं सहायता समूहों से विश्वास पूरी तरह उठ जाएगा। भविष्य में कोई भी महिला आजीविका मिशन से जुड़ने की हिम्मत नहीं करेगी। ग्रामीण परिवारों की अर्थव्यवस्था पहले से ही नाजुक होती है। ₹80,000 का यह कथित 'कृत्रिम कर्ज' कई परिवारों को आत्महत्या या मजदूरी के लिए पलायन करने पर मजबूर कर सकता है।
*निष्पक्ष जांच और त्वरित कार्रवाई की मांग*
ढीमरखेड़ा की पीड़ित समूह की महिलाओं ने अब इस मामले को लेकर आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है।उन्होंने जिले के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों, मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO) जिला पंचायत कटनी, और आजीविका मिशन के प्रदेश स्तरीय आला अफसरों से इस पूरे रैकेट की निष्पक्ष और उच्च स्तरीय जांच कराने की मांग की है।

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