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खरी-अखरी(सवाल उठाते हैं पालकी नहीं) पत्रकारिता दोधारी तलवार है जिस पर चलने के लिए नट जैसा संतुलन चाहिए ऐसा रेजिग्नेशन तो मुख्यमंत्री मोहन यादव का होना चाहिए

 खरी-अखरी(सवाल उठाते हैं पालकी नहीं) पत्रकारिता दोधारी तलवार है जिस पर चलने के लिए नट जैसा संतुलन चाहिए ऐसा रेजिग्नेशन तो मुख्यमंत्री मोहन यादव का होना चाहिए



एक डायरी-पेन, गले में आईडी और हाथ में माइक लेकर, अधिकारियों के आगे-पीछे घूमने, पुलिस कर्मियों के गले में हाथ डाल कर चलने से कोई पत्रकार नहीं बन जाता है। पत्रकारिता दोधारी तलवार पर चलने जैसा है जिसमें एक नट जैसा संतुलन जरूरी है। महत्वपूर्ण यह नहीं है कि सामने वाले से कौन सा सवाल पूछना है, महत्वपूर्ण यह है कि कौन सा सवाल नहीं पूछना है। वर्ना ऐसा ही होता है जैसा बालाघाट में हुआ। तथाकथित पत्रकारों ने सीजेपी फाउंडर अभिजीत दीपके के मुंह में माइक घुसेड़ सवाल पूछकर उसे मध्य प्रदेश का सीएम बना दिया और दीपके ने प्रदेश के राज्यपाल को सीएम पद से इस्तीफा भेज दिया।


To, The Hon'ble Governor of Madhya Pradesh, Raj Bhavan, Bhopal, Respected Sir, I hereby tender my resignation from the office of the Chief Minister of Madhya Pradesh. My conscience does not allow me to continue occupying this chair after the deaths of more than 30 Tribal children in Balaghat. As Chief Minister, I accept responsibility for failing to provide them with the timely Medical care and support they needed. Many of these lives could possibly have been saved, and I cannot escape responsibility for that failure. What is equally shameful is our insensitivity after their deaths. We initially announced compensation of merely ₹ 2 lakh per child, increasing it to ₹ 4 lakh only after the Tribal community protested. It forces me to ask an uncomfortable question : would we have considered ₹ 4 lakh adequate have these been the children of Ministers or MLAs? Our response reflects how little value we have placed on the lives of Tribal children. Despite the gravity of this tragedy, we have also failed to hold heath official accountable. The deaths of innocent children demand a accountability at the highest level. Our failures go beyond health care. While our Hon'ble Prime Minister, Shri Narendra Modi Ji, aka Vishwaguru, has declared the success of providing tap water to non be holds under the Har Ghar Nal Yojna. Tribal families in parts of Balaghat still depend on river water for drinking, putting their health at risk. The situation in education is equally disturbing. In several villages, schools are in conditions worse than animal shelters. In one Balaghat village, around 75 children, from Anganwadi to class 5, study in a single classroom. Despite repeated requests from the local Tribal community, we have failed to provide them with a proper school building. Today, I hang my head in shame that even after nearly 21 years of BJP governments in Madhya Pradesh since 2003, we have not been able to guarantee many Tribal families the basic dignity of safe drinking water, adequate health care and quality education. Some figures further expose the failures of my government towards Tribal communities : 55795 tribal households in Madhya Pradesh remain without electricity, according to our own government's data. 32% of India's crimes against Scheduled Tribes were recorded in Madhya Pradesh, according to NCRB data. More than 5.41 lakh children (8.60%) in the state were classified as underweight. Over 1.36 lakh children were registered as malnourished, according to date tabled by our government in the Vidhan Sabha, with tribal communities among those severely affected. I have failed the Tribals of not just Balaghat but entire state, and after the loss of so many innocent children, I do not believe I have the moral right to continue in this office. I therefore tender my resignation as the Chief Minister of Madhya Pradesh with immediate effect. Finally, I would like to express my gratitude to the Hon'ble Prime Minister, Shri Narendra Modi, aka Vishwaguru, for giving me the opportunity to serve the people of Madhya Pradesh. Your Sincerely, Abhijeet Dipke, Chief Minister, Madhya Pradesh.


ये वो इस्तीफा है जो काॅकरोच जनता पार्टी के फाउंडर अभिजीत दीपके ने कुछ इस तर्ज पर लिखा है जैसे छोटे बच्चे नकली नोटों का खेल खेलते हैं। इसी तर्ज पर एक रात पहले ट्यूट किया Will be visiting the MP Governor's office tomorrow to tender my resignation as Chief Minister of the State. इसके बाद दूसरे दिन मध्य प्रदेश के राज्यपाल को सोशल मीडिया पर इस्तीफा भेजने का ट्यूट किया I hereby resign as the Chief Minister of M P with immediate effect. I thank Hon'ble PM @Narendra Modi Ji for giving me the opportunity to serve the people of MP, an opportunity in which I have clearly failed.


अपने रेजिग्नेशन लेटर में अभिजीत दीपके लिखता है कि बालाघाट जिले में 30 से अधिक आदिवासी बच्चों की मौत के बाद मेरी अंतरात्मा मुझे इस पद पर बने रहने की अनुमति नहीं देती है। मैं मुख्यमंत्री के रूप में उन्हें समय पर आवश्यक चिकित्सा सहायता प्रदान करने में विफल रहने की जिम्मेवारी स्वीकार करता हूं। अगर समय पर सहायता दी जाती तो कई बच्चों की जान बचाई जा सकती थी। बच्चों की मौत के बाद हमारी संवेदनहीनता भी अत्यंत ही शर्मनाक है। पहले हमने प्रति बच्चा दो लाख रुपये का मुआवजा देने की घोषणा की थी जिसे आदिवासी समुदाय के विरोध के बाद 4 लाख रुपये तक बढ़ा दिया गया। मेरी अंतरात्मा ही मुझसे सवाल करती है कि अगर ये मंत्रियों-विधायकों के बच्चे होते तो क्या हम 4 लाख मुआवजे को पर्याप्त मानते ? हमारी प्रतिक्रिया दर्शाती है कि हमने आदिवासी बच्चों के जीवन की कितनी कम कीमत समझी है। त्रासदी की गंभीरता के बावजूद भी हम स्वास्थ्य अधिकारियों को जवाबदेह ठहराने में विफल रहे। हमारी विफलताएं केवल स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित नहीं है। हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने तो हर घर नल योजना के तहत घरों में नल से जल पहुंचाने की सफलता की घोषणा की है। लेकिन बालाघाट के कुछ हिस्सों में अभी आदिवासियों को नदी का पानी पीना पड़ रहा है। जिससे उनके स्वास्थ्य पर खतरा मंडरा रहा है। शिक्षा की स्थिति भी उतनी ही चिंताजनक है। कई गांवों के स्कूल तो तबेलों से भी बदतर हालत में हैं। बालाघाट के गांवों में आंगनबाड़ी से लेकर पांचवी कक्षा तक एक ही क्लास में 75 बच्चे तक हैं। स्थानीय आदिवासी समुदाय के बार - बार अनुरोध के बाद भी हम उन्हें बेसिक सुविधा युक्त स्कूल भवन तक उपलब्ध नहीं करा पाए हैं। प्रदेश में पिछले 21 बरस (2003) से भाजपा की सरकार होने के बावजूद भी हम आदिवासी परिवारों को स्वच्छ पेयजल, पर्याप्त स्वास्थ्य सेवा और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की बुनियादी गारंटी देने में सक्षम नहीं हो पाए हैं। हमारी ही सरकार के आंकड़े बताते हैं कि 55 हजार से ज्यादा आदिवासी परिवारों के घरों में बिजली कनेक्शन नहीं है। देश के हिसाब से 32 फीसदी अपराध अनुसूचित जनजातियों के खिलाफ अकेले मध्य प्रदेश में दर्ज किए गए हैं। राज्य के लगभग साढ़े पांच लाख बच्चों का वजन न्यूनतम वजन से कम है। हमारी सरकार ने ही विधानसभा में बताया है कि एक लाख छत्तीस हजार से अधिक बच्चे कुपोषित पंजीकृत किए गए हैं, जिनमें आदिवासी समुदाय के बच्चे गंभीर रूप से प्रभावित हैं। मैंने बालाघाट सहित पूरे प्रदेश के आदिवासियों को निराश किया है और इतने बच्चों को खोने के बाद मुझे लगता है कि मैंने इस पद पर बने रहने का नैतिक अधिकार खो दिया है। इसलिए मैं तत्काल प्रभाव से मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री पद का त्याग करता हूं। अंत में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का आभार व्यक्त किया गया है यह कहते हुए कि उन्होंने मुझे मध्य प्रदेश की जनता की सेवा करने का अवसर दिया।


जिस तरह से सोशल मीडिया पर स्थितियां वायरल हो कर सामने आ रही हैं वो बड़ी हास्यास्पद दिखती हैं। जब अभिजीत दीपके बालाघाट पहुंचा तो सरकारी एहसानों तले दबे तथाकथित पत्रकारों ने दीपके को घेर कर सवालों की बौछार करनी शुरू कर दी। इन पत्रकारों ने शायद आज तक भाजपा सरकार और बीजेपी के पदाधिकारियों से सवाल का "स" तक नहीं पूछा होगा। बालाघाट जिले में आदिवासी बच्चों की मौत कोई एक दिन में नहीं हुई है। दो महीने में लगातार बच्चे मरते रहे तथा प्रदेश मुखिया मोहनी मूरत लिए गोप गोपिकाओं संग रास रचाते रहे और चाटुकार पत्रकार आदिवासी बच्चों की मौत पर भी सरकारी दावत का मजा लेते रहे। चंद दिन पहले जब सीएम बालाघाट आए तो किसी पत्रकार में मोहन से यह नहीं पूछा कि "बड़ी देर कर दी सरकार आते-आते" । क्या ब्रिक्स का घोषणा पत्र बना रहे थे आप ? शायद ही प्रदेश के किसी भी बड़े अखबारनवीस ने अपने अखबार में सवालिया लहजे में लिखकर हेडलाइन बनाई हो कि मध्य प्रदेश में हुई आदिवासी बच्चों की मौत पर प्रधानमंत्री ने संवेदना तक व्यक्त नहीं की आखिर क्यों ? आदिवासी समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाली राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू ने अपने ही समुदाय के दो दर्जन से अधिक बच्चों की मौत पर केन्द्र और राज्य सरकार से जवाबतल्बी नहीं की आखिर क्यों ? देश का स्ट्रीम मीडिया कभी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से सवाल नहीं करता कि चाइना भारत की जमीन पर कब्जा करता चला जा रहा है और आप क्या कर रहे हैं ? रुपया लगातार कमजोर होकर गोते लगाता है तो सरकार क्या कर रही है ? बालाघाट में दूषित पानी पीने से मरने वाली कोई पहली घटना नहीं है मोहन यादव के कार्यकाल की। इससे पहले भी प्रदेश में जहरीली (नकली) शराब पीने से कई लोग कालकलवित हो चुके हैं। दिल्ली, भोपाल और इंदौर में भाजपा की ट्रिपल इंजन सरकार होने के बावजूद सरकार द्वारा घरों में नलों से सप्लाई किए जाने वाले पानी को पीकर सैकड़ा भर से ज्यादा बच्चे बूढ़े जवान भगवान को प्यारे हो गए और सरकार अपनी ऐंठन में बनी रही। कहा जा सकता है कि ऐसा नकारा निकम्मा मुख्यमंत्री शायद ही प्रदेश में कोई दूसरा हुआ हो ! स्ट्रीम मीडिया के तो कहने ही क्या हैं सरकार की ड्योढ़ी में माथा टेक कर। 


चारों तरफ मरघट सा सन्नाटा है और उस सन्नाटे के साये तले धर्म और जाति की राजनीति फलफूल रही है। लेकिन जिस तरह से जं जी, जं अल्फा धर्म और जाति को दरकिनार कर सामने आकर खड़ा हो गया है उससे बीजेपी सहित तमाम राजनीतिक दलों के भीतर जं जी, जं अल्फा का खौफ साफ देखा जा सकता है। पत्रकार जिस तरह से सत्ता और सत्ता पार्टी के प्रवक्ता बन कर सामने आते हैं उससे पत्रकारिता पर ग्रहण ही लगा रहे हैं । अभिजीत दीपके ने जिस तरह से रेजिग्नेशन लेटर लिखा है उसे एक व्यंगात्मक पत्र के रूप में देखा जा सकता है यानी उसने बच्चों की माफिक खेल खेलकर व्यंग के माध्यम से मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव, उनकी सरकार, बीजेपी यहां तक कि प्रधानमंत्री तक को नग्नावस्था में लाकर खड़ा करने के साथ - साथ पत्रकारों के मुंह पर तमाचा जड़ दिया है। दीपके ने जो व्यंग का जूता मारा है इसे समझने के लिए दिमाग भी चाहिए !


अश्वनी बडगैया अधिवक्ता

स्वतंत्र पत्रकार

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