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जिस घर के लिए दिन-रात मेहनत, उसी घर में बैठने की फ़ुरसत नहीं, बैंक बैलेंस तो बढ़ा, पर क्या खाली हो रही है जिंदगी की तिजोरी, कल सुधारने की जल्दी में आज की खुशियां गंवाता इंसान, भागदौड़ की जिंदगी, बेगाने होते अपने, कमाया पैसा, गंवाया वक्त किसकी बलि चढ़ा रहे हैं हम, पैसा जरूरी है, मगर जिंदगी से ज्यादा नहीं

 जिस घर के लिए दिन-रात मेहनत, उसी घर में बैठने की फ़ुरसत नहीं, बैंक बैलेंस तो बढ़ा, पर क्या खाली हो रही है जिंदगी की तिजोरी, कल सुधारने की जल्दी में आज की खुशियां गंवाता इंसान, भागदौड़ की जिंदगी, बेगाने होते अपने, कमाया पैसा, गंवाया वक्त किसकी बलि चढ़ा रहे हैं हम, पैसा जरूरी है, मगर जिंदगी से ज्यादा नहीं



कटनी  |  आज का आधुनिक समाज एक अजीब से विरोधाभास के बीच सांस ले रहा है। एक तरफ जहां हमारी जीवनशैली, तकनीकी सुविधाएं, वित्तीय संसाधन और व्यक्तिगत आकांक्षाएं अपने सर्वकालिक उच्च स्तर पर हैं, वहीं दूसरी तरफ इंसान की मानसिक शांति, पारिवारिक जुड़ाव और जीवन का वास्तविक आनंद लगातार गर्त में जा रहा है। हर सुबह जब शहर जगता है, तो उसके साथ जगती है एक कभी न खत्म होने वाली अंधी दौड़ सफलता की दौड़, अधिक से अधिक पैसा कमाने की दौड़, और समाज द्वारा तय किए गए 'सफल जीवन' के मापदंडों को हासिल करने की दौड़। लेकिन इस आपाधापी में जो सबसे बड़ा सवाल पीछे छूट जाता है, वह यह है कि क्या हम वाकई जी रहे हैं, या सिर्फ सांसें गिन रहे हैं?

*पैसों का जाल साधन जब मकसद बन जाए*

जीवन को सुचारू रूप से चलाने के लिए पैसा एक अनिवार्य साधन है। भोजन, आवास, स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर को बनाए रखने के लिए वित्तीय मजबूती आवश्यक है। परंतु समस्या तब उत्पन्न होती है जब साधन ही जीवन का अंतिम साध्य या मंज़िल बन जाता है।मनोवैज्ञानिकों और समाजशास्त्रियों का मानना है कि पिछले कुछ दशकों में उपभोक्तावादी संस्कृति ने इंसान की मानसिक संरचना को गहराई से प्रभावित किया है। आवश्यकताओं और इच्छाओं के बीच की रेखा धुंधली हो चुकी है। आज इंसान केवल अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए नहीं, बल्कि दूसरों से आगे दिखने, भौतिक वस्तुओं का संग्रह करने और एक काल्पनिक सामाजिक प्रतिष्ठा को बनाए रखने के लिए कमा रहा है। कमाने का यह चक्र कभी पूरा नहीं होता।एक गाड़ी के बाद दूसरी बड़ी गाड़ी, एक मकान के बाद दूसरा फ्लैट आकांक्षाओं की यह सूची अनंत है। इस अनंत सूची को पूरा करने की होड़ में इंसान इतना आगे निकल आता है कि जब वह पीछे मुड़कर देखता है, तो उसके पास अपनों के साथ साझा की गई यादें नहीं, बल्कि केवल बैंक बैलेंस और कागजी दस्तावेज होते हैं।

*परिवार और रिश्तों की बलि जिस घर के लिए मेहनत, वहीं बैठने का वक्त नहीं*

एक दौर था जब परिवार शाम को एक साथ बैठता था।दिनभर की थकान के बाद घर का आंगन या बैठक वह जगह होती थी जहां सुकून और हंसी का माहौल होता था।आज स्थिति इसके ठीक उलट है। हम दिन-रात मेहनत किसके लिए करते हैं? उत्तर हमेशा यही होता है अपने परिवार के लिए, अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए।लेकिन विडंबना देखिए कि जिस परिवार के खुशहाल भविष्य के लिए आज दिन-रात एक किया जा रहा है, उसी परिवार को आज का थोड़ा सा समय देने की फुर्सत हमारे पास नहीं है।

*बच्चों का छूटता बचपन* माता-पिता अपने काम में इतने व्यस्त हैं कि वे बच्चों के साथ खेलने या उनकी बातें सुनने का समय नहीं निकाल पाते। महंगे खिलौने और बेहतरीन स्कूलों की फीस भरकर यह मान लिया जाता है कि जिम्मेदारी पूरी हो गई, जबकि बच्चे को वास्तव में माता-पिता की उपस्थिति और उनके स्पर्श की आवश्यकता होती है। जिस घर को बनाने में बुजुर्गों ने अपनी पूरी उम्र लगा दी, उसी घर में आज उनके पास बात करने वाला कोई नहीं है। युवा पीढ़ी अपने करियर और लक्ष्यांकों को पूरा करने में इतनी व्यस्त है कि घर में मौजूद बुजुर्गों का हाल-चाल पूछने का वक्त भी एक औपचारिकता बनकर रह गया है। पति-पत्नी के बीच संवाद कम हो रहा है, जिससे रिश्तों में दरार और बिखराव के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं।भविष्य संवारने की होड़ में हाथ से फिसलता 'आज'

"कल सब ठीक हो जाएगा," "एक बार यह प्रोजेक्ट पूरा हो जाए फिर आराम करेंगे," "रिटायरमेंट के बाद जिंदगी जिएंगे" ये कुछ ऐसे जुमले हैं जो हर दूसरा कामकाजी इंसान रोज दोहराता है। बेहतर कल की उम्मीद में हम अपने 'आज' की बलि चढ़ा रहे हैं। समय का सबसे बड़ा नियम यह है कि वह निरंतर प्रवाहमान है। जो पल आज गुजर गया, वह दोबारा कभी लौटकर नहीं आएगा। हम जिस खूबसूरत कल की तैयारी में अपने वर्तमान की खुशियां, सेहत और मानसिक शांति गंवा रहे हैं, उसकी कोई गारंटी नहीं है कि वह कल वैसा ही होगा जैसा हमने सोचा है। भविष्य को सुरक्षित करना बुद्धिमानी है, लेकिन वर्तमान को पूरी तरह नजरअंदाज कर देना मूर्खता है। यदि आज का दिन बिना किसी मुस्कान, बिना किसी आत्मीय बातचीत और बिना किसी आत्म-संतोष के गुजर गया, तो समझ लीजिए कि जीवन का एक अमूल्य हिस्सा हमेशा के लिए खो गया।

*स्वास्थ्य का संकट जब शरीर मांगता है हिसाब*

पैसों की अंधी दौड़ का सबसे बड़ा नुकसान इंसान के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को भुगतना पड़ रहा है। अत्यधिक काम का दबाव, अनिश्चितता और लगातार आगे रहने की चिंता इंसान को मानसिक रूप से खोखला कर रही है। आज डिप्रेशन, एंग्जायटी और बर्नआउट के मामले कामकाजी युवाओं में सबसे ज्यादा देखे जा रहे हैं। समय पर न खाना, पर्याप्त नींद न लेना और शारीरिक गतिविधियों का शून्य होना कम उम्र में ही दिल के दौरे, डायबिटीज और हाइपरटेंशन जैसी बीमारियों को न्योता दे रहा है। जिस सुकून की तलाश में इंसान दिन-रात भागता है, उसी सुकून की नींद की गोलियां खाने पर आज लोग मजबूर हैं। यह विचार करने योग्य बात है कि यदि हम अपनी सेहत और मानसिक शांति की बलि देकर धन जमा कर भी लें, तो अंत में उस धन का बड़ा हिस्सा उसी गंवाई हुई सेहत को वापस पाने के प्रयास में डॉक्टरों और अस्पतालों में ही खर्च हो जाएगा।

 *कैसे बदलें अपनी जीवनशैली*

इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि इंसान कमाना छोड़ दे या सपने देखना बंद कर दे। प्रगति, महत्वाकांक्षा और वित्तीय समृद्धि जीवन के महत्वपूर्ण अंग हैं। आवश्यकता इस बात की है कि धन और जीवन के बीच एक स्वस्थ संतुलन स्थापित किया जाए। काम और व्यक्तिगत जीवन के बीच स्पष्ट रेखा खींचना आवश्यक है। दफ्तर के काम को घर के दरवाजे से बाहर रखने का प्रयास करें। अपने परिवार और दोस्तों के साथ बिताए जाने वाले समय को प्राथमिकता दें। इस दौरान मोबाइल, लैपटॉप और काम की चर्चाओं को पूरी तरह अलग रखें। प्रतिस्पर्धा की कोई सीमा नहीं है। अपनी आवश्यकताओं को सीमित करें और जो आपके पास है, उसके लिए आभार व्यक्त करना सीखें। दिनभर में कम से कम आधा घंटा अपनी पसंद के कार्य, योग, ध्यान या प्रकृति के बीच बिताने के लिए रखें।

*जीवन की वास्तविक सीख*

कमाए हुए पैसों से आप अलमारी भर सकते हैं, महंगे कपड़े खरीद सकते हैं और आलीशान मकान बना सकते हैं। लेकिन उन मकानों को 'घर' बनाने वाली खुशियां, बच्चों की बेपरवाह हंसी, और अपनों का भरोसा केवल समय और आत्मीयता निवेश करने से ही मिलता है। पैसा निश्चित रूप से दोबारा कमाया जा सकता है अगर आज नुकसान हुआ है, तो कल फिर से मुनाफा हो सकता है। परंतु जो समय एक बार हाथ से निकल गया और जो रिश्ते अनदेखी के कारण बिखर गए, उन्हें दुनिया की कोई भी संपत्ति वापस नहीं खरीद सकती। इसलिए, कमाइए, आगे बढ़िए, अपने ऊंचे से ऊंचे सपनों को साकार कीजिए… मगर इस बात का सदैव ध्यान रखिए कि आपकी यह यात्रा आपको अपनों से दूर न कर दे। पैसा हासिल करना आपकी सफलता हो सकती है, लेकिन इंसानियत, रिश्तों का स्नेह और मानसिक सुकून बनाए रखना आपकी असली विजय होगी।

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