ज़िंदा हैं वो लोग जो मौत से टकराते हैं और मुर्दों से बदतर हैं वो लोग जो मौत से घबराते हैं... कहते हैं सच बोलो तो प्राण गंवाने पड़ते हैं, मैं भी सच्चाई गा-गा कर शीश कटाने आया हूँ, घायल भारत माता की तस्वीर दिखाने आया हूँ
ज़िंदा हैं वो लोग जो मौत से टकराते हैं और मुर्दों से बदतर हैं वो लोग जो मौत से घबराते हैं... कहते हैं सच बोलो तो प्राण गंवाने पड़ते हैं, मैं भी सच्चाई गा-गा कर शीश कटाने आया हूँ, घायल भारत माता की तस्वीर दिखाने आया हूँ
कटनी | जो देश के सजग नागरिकों, निडर पत्रकारों और सीमा पर डटे वीरों के सीने में जलती है। आज का दौर जहाँ चाटुकारिता और झूठे दिलासों का बोलबाला बनता जा रहा है, वहीं कुछ ऐसे साहसी मन भी हैं जो सच का आइना दिखाने से पीछे नहीं हटते, चाहे इसके लिए उन्हें कोई भी कीमत क्यों न चुकानी पड़े।
*सत्य की राह और बलिदान की परंपरा*
भारतीय इतिहास इस बात का साक्षी रहा है कि जब-जब समाज में असत्य, अन्याय और चाटुकारिता का प्रभाव बढ़ा है, तब-तब किसी न किसी क्रांतिकारी ने अपने प्राणों की बाजी लगाकर सच्चाई का अलख जगाया है।भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु से लेकर पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र में निडरता से कलम चलाने वाले मनीषियों तक सभी ने इस बात को सिद्ध किया है कि जीवन केवल सांसें लेने का नाम नहीं है, बल्कि सिद्धांतों के साथ जीने का नाम है। जो लोग संकट और अन्याय के सामने घुटने टेक देते हैं, उनका अस्तित्व जीवित होते हुए भी किसी काम का नहीं रहता।कायरता का जीवन जीने से बेहतर है कि सच्चाई के पथ पर चलते हुए वीरगति को प्राप्त किया जाए। जब-जब कोई निष्पक्ष आवाज देश की असल चुनौतियों, आंतरिक घावों और व्यवस्था की कमियों को उजागर करती है, तब-तब उसे दबाने का प्रयास किया जाता है। लेकिन सच्चा राष्ट्रभक्त वही है जो निर्भीक होकर “घायल भारत माता की तस्वीर” पूरी दुनिया के सामने प्रस्तुत करने का साहस रखता है। आज का दौर और 'घायल भारत माता' का संदर्भ
आज जब हम 21वीं सदी के भारत की बात करते हैं, तो एक तरफ प्रगति की चमचमाती इमारतें दिखाई देती हैं, तो दूसरी तरफ कुछ ऐसी ज़मीनी हकीकतें भी हैं जिन्हें अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। आंतरिक और बाह्य चुनौतियाँ सीमा पर खड़े जवान शून्य से नीचे के तापमान में भी दुश्मनों की गोलियों का सामना करते हैं। वे मौत से टकराते हैं, क्योंकि उनके लिए राष्ट्र की सुरक्षा से बढ़कर कुछ नहीं। सामाजिक असमानता और भ्रष्टाचार समाज में फैली कुरीतियां, भ्रष्टाचार और आम आदमी का संघर्ष उस पीड़ा को दर्शाते हैं जिसे दूर करने के लिए कड़वे सच को स्वीकारना आवश्यक है। सच्चाई बोलने की चुनौती आज के समय में सच बोलना जोखिम भरा काम बन चुका है। जो लोग सत्ता या समाज की कमियों पर उंगली उठाते हैं, उन्हें अक्सर आलोचनाओं का सामना करना पड़ता है।लेकिन बिना सच बोले सुधार की गुंजाइश संभव नहीं है।
*मीडिया और पत्रकारिता का धर्म*
इस पूरी व्यवस्था में चौथे स्तंभ यानी मीडिया की भूमिका सबसे अहम हो जाती है। सच्ची पत्रकारिता का काम सिर्फ मीठी बातें करना या झूठी तस्वीरें बेचना नहीं है, बल्कि देश की वास्तविक स्थिति को सामने लाना है। "सच्चाई गा-गा कर शीश कटाने आया हूँ" यह पंक्ति उन सभी निडर कलमकारों पर सटीक बैठती है जो बिना किसी दबाव या लालच के जनता तक सच पहुँचाते हैं।जब तक समाज में सच बोलने वाले लोग जीवित हैं, तब तक लोकतंत्र की नींव मजबूत रहेगी। जो लोग केवल अपने स्वार्थ के लिए आँखें मूँद लेते हैं, वे सचमुच “मुर्दों से भी बदतर” स्थिति में हैं, क्योंकि वे जीवित होकर भी समाज के पतन के मूक दर्शक बने रहते हैं।
*मौत का डर और जीवन का सही अर्थ*
मौत एक शाश्वत सत्य है, लेकिन मौत के भय से अपने आदर्शों से समझौता कर लेना सबसे बड़ा अपराध है। जो व्यक्ति देश, धर्म और सत्य के लिए खड़ा होता है, वह शारीरिक रूप से भले ही मिट जाए, लेकिन उसका विचार और उसका नाम अमर हो जाता है। तुलसीदास जी ने भी कहा है कि पराधीनता या डर में जीने वाले का कोई अस्तित्व नहीं होता। जब कोई व्यक्ति यह ठान लेता है कि उसे भारत माता के हर जख्म को भरना है, तो उसे सबसे पहले उन जख्मों को पहचानना और दिखाना होता है। यही सच्चा राष्ट्रप्रेम है दिखावे की भक्ति से दूर, यथार्थ का सामना करना। यह समय केवल चुपचाप सब कुछ देखने का नहीं, बल्कि सत्य के साथ खड़े होने का है। यदि हम अपने देश को समृद्ध और महान बनाना चाहते हैं, तो हमें सच्चाई को स्वीकार करने का साहस जुटाना होगा। जो लोग असत्य से टकराते हैं, वही वास्तव में जीवित हैं और वही इस देश के वास्तविक कर्णधार हैं।

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