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भूख की कोई जाति नहीं होती, ढीमरखेड़ा में आरक्षण विरोध नहीं, आरक्षण सुधार आंदोलन की उठी आवाज सवर्ण समाज ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के नाम एसडीएम को सौंपा ज्ञापन, आर्थिक आधार पर आरक्षण लागू करने, आरक्षित वर्ग में क्रीमीलेयर और सवर्ण आयोग के गठन की मांग

 भूख की कोई जाति नहीं होती, ढीमरखेड़ा में आरक्षण विरोध नहीं, आरक्षण सुधार आंदोलन की उठी आवाज सवर्ण समाज ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के नाम एसडीएम को सौंपा ज्ञापन, आर्थिक आधार पर आरक्षण लागू करने, आरक्षित वर्ग में क्रीमीलेयर और सवर्ण आयोग के गठन की मांग



ढीमरखेड़ा ।  आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा और उसमें व्यापक सुधार की मांग को लेकर मंगलवार को ढीमरखेड़ा तहसील में सवर्ण समाज के लोगों ने शांतिपूर्ण तरीके से जनसभा आयोजित कर राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री के नाम अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) ढीमरखेड़ा को ज्ञापन सौंपा। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में समाज के लोग शामिल हुए। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता के रूप में भेड़ा वाले ब्रह्मनंद दास जी महाराज विशेष रूप से उपस्थित रहे। सभा के दौरान वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि यह आंदोलन किसी जाति अथवा समुदाय के विरोध में नहीं, बल्कि आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा और उसमें आवश्यक सुधार की मांग को लेकर है।वक्ताओं ने इसे ‘आरक्षण विरोध आंदोलन नहीं, बल्कि आरक्षण सुधार आंदोलन’ बताते हुए कहा कि उनका उद्देश्य समाज में किसी वर्ग के अधिकार छीनना नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से कमजोर और जरूरतमंद लोगों को समान अवसर उपलब्ध कराना है।कार्यक्रम में ढीमरखेड़ा क्षेत्र के सवर्ण समाज की ओर से नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर 21 अगस्त 2026 से चल रहे राष्ट्रव्यापी आरक्षण संबंधी आंदोलन के प्रति समर्थन व्यक्त किया गया। सभा में वक्ताओं ने केंद्र सरकार से आरक्षण नीति, शैक्षणिक नियमों तथा संबंधित कानूनों की समीक्षा करने की मांग उठाई।

*आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग*

ज्ञापन में वर्तमान जातिगत आरक्षण व्यवस्था की व्यापक और निष्पक्ष समीक्षा करने तथा आरक्षण का आधार आर्थिक स्थिति को बनाए जाने की मांग प्रमुख रूप से रखी गई। वक्ताओं ने कहा कि गरीबी किसी जाति की पहचान नहीं होती। समाज के प्रत्येक वर्ग में आर्थिक रूप से कमजोर परिवार मौजूद हैं, इसलिए सरकारी योजनाओं और अवसरों का लाभ वास्तविक रूप से जरूरतमंद लोगों तक पहुंचाने के लिए आर्थिक स्थिति को भी महत्वपूर्ण आधार बनाया जाना चाहिए। सभा में कहा गया कि आरक्षण व्यवस्था का उद्देश्य सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों को आगे लाना रहा है, लेकिन बदलते सामाजिक और आर्थिक परिवेश में इसकी समीक्षा आवश्यक है। वक्ताओं ने सरकार से आग्रह किया कि आरक्षण नीति को लेकर व्यापक चर्चा कर सभी वर्गों के हितों को ध्यान में रखते हुए पारदर्शी एवं न्यायपूर्ण व्यवस्था तैयार की जाए।

*आरक्षित वर्ग में क्रीमीलेयर लागू करने की उठी मांग*

सवर्ण समाज ने आरक्षित वर्गों के भीतर आर्थिक रूप से संपन्न परिवारों के लिए क्रीमीलेयर व्यवस्था लागू करने की मांग भी किया।वक्ताओं का तर्क था कि आरक्षण का लाभ समाज के सबसे जरूरतमंद और वंचित लोगों तक पहुंचना चाहिए।यदि किसी परिवार को पीढ़ियों से शिक्षा, रोजगार और आर्थिक अवसर मिल चुके हैं, तो आरक्षण का लाभ उन परिवारों तक भी पहुंचाने की व्यवस्था होनी चाहिए जो वास्तव में सामाजिक एवं आर्थिक रूप से पीछे हैं।वक्ताओं ने कहा कि इस विषय पर सरकार को सभी पक्षों से चर्चा कर व्यावहारिक नीति बनानी चाहिए, जिससे आरक्षण का लाभ वास्तविक जरूरतमंदों तक पहुंचे और समाज में असंतोष कम हो।

*यूजीसी नियमों में बदलाव और रोलबैक की मांग*

कार्यक्रम के दौरान विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी से संबंधित नियमों में किए गए बदलावों को लेकर भी विरोध दर्ज कराया गया। समाज की ओर से नए नियमों को वापस लेने अथवा ‘रोलबैक’ करने की मांग ज्ञापन में शामिल की गई। वक्ताओं ने कहा कि उच्च शिक्षा में अवसरों की समानता और पारदर्शिता सुनिश्चित करना आवश्यक है। उनका कहना था कि शिक्षा व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसमें विद्यार्थियों की प्रतिभा, मेहनत और आर्थिक स्थिति को भी उचित महत्व मिले तथा किसी भी वर्ग के विद्यार्थी को अनावश्यक रूप से अवसरों से वंचित न होना पड़े।

*एससी-एसटी एक्ट को लेकर भी उठी मांग*

ज्ञापन में एससी-एसटी एक्ट को लेकर वर्ष 2018 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए दिशा-निर्देशों को पुनर्स्थापित एवं लागू करने की मांग भी रखी गई। वक्ताओं ने कहा कि अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लोगों को कानूनी संरक्षण मिलना आवश्यक है, लेकिन कानून के दुरुपयोग की शिकायतों पर भी सरकार को गंभीरता से विचार करना चाहिए। सभा में कहा गया कि किसी भी कानून का उद्देश्य पीड़ित को न्याय दिलाना होना चाहिए और साथ ही निर्दोष व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा भी सुनिश्चित की जानी चाहिए।वक्ताओं ने इस विषय पर संतुलित कानूनी व्यवस्था की आवश्यकता बताई।

*सवर्ण आयोग के गठन की मांग*

सवर्ण समाज ने गरीब और मेधावी युवाओं की समस्याओं को सामने लाने तथा उनके हितों की रक्षा के लिए ‘सवर्ण आयोग’ के गठन की मांग भी की। वक्ताओं ने कहा कि आर्थिक रूप से कमजोर सवर्ण परिवारों के विद्यार्थियों और युवाओं को शिक्षा, रोजगार तथा अन्य क्षेत्रों में आने वाली समस्याओं के समाधान के लिए एक संस्थागत व्यवस्था की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, छात्रवृत्ति, रोजगारपरक प्रशिक्षण और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराने पर सरकार को विचार करना चाहिए।

*‘भूख और आंसू की कोई जाति नहीं होती’*

सभा में वक्ताओं ने भावनात्मक अंदाज में कहा कि “भूख की कोई जाति नहीं होती और आंसुओं का कोई धर्म नहीं होता।” उन्होंने कहा कि आर्थिक कठिनाइयों से जूझ रहे परिवारों की समस्याएं जाति देखकर सामने नहीं आतीं। गरीबी किसी व्यक्ति का उपनाम देखकर उसके घर में प्रवेश नहीं करती। वक्ताओं ने कहा कि देश तेजी से विकास कर रहा है और भारत अंतरिक्ष विज्ञान सहित अनेक क्षेत्रों में दुनिया के सामने अपनी क्षमता साबित कर रहा है। ऐसे समय में युवाओं के लिए ऐसी व्यवस्था तैयार की जानी चाहिए, जिसमें प्रतिभा और आर्थिक जरूरत दोनों को उचित महत्व मिले। उन्होंने कहा कि उनका उद्देश्य किसी समुदाय को कमजोर करना नहीं, बल्कि देश के गरीब और जरूरतमंद युवाओं के लिए समान अवसर की मांग करना है।

*डॉ. आंबेडकर के विचारों का दिया संदर्भ*

सभा में वक्ताओं ने संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचारों का संदर्भ देते हुए कहा कि आरक्षण का उद्देश्य सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों को आगे लाना था। वक्ताओं ने आरोप लगाया कि समय के साथ आरक्षण व्यवस्था कई बार राजनीतिक बहस का विषय बन गई है। उन्होंने कहा कि आरक्षण को लेकर किसी भी बदलाव पर निर्णय संविधान, न्यायपालिका और संबंधित विशेषज्ञों की राय तथा सभी वर्गों के हितों को ध्यान में रखते हुए होना चाहिए। वक्ताओं ने यह भी कहा कि आरक्षण के वास्तविक लाभार्थियों तक लाभ पहुंचाने के लिए व्यवस्था की निरंतर समीक्षा जरूरी है।

*प्रतिभा और अवसर को लेकर चिंता*

सभा में प्रतिभा के सम्मान का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया। वक्ताओं ने कहा कि प्रतियोगी परीक्षाओं और उच्च शिक्षा में युवाओं की मेहनत और प्रतिभा को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। उनका तर्क था कि यदि योग्य और मेहनती विद्यार्थियों को अवसरों की कमी महसूस होगी तो इससे युवाओं में निराशा पैदा हो सकती है।

वक्ताओं ने प्रतिभा पलायन का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत के अनेक प्रतिभाशाली युवा बेहतर अवसरों के लिए विदेशों का रुख करते हैं। उन्होंने सरकार से ऐसी शिक्षा और रोजगार नीति बनाने की मांग की, जिससे देश की प्रतिभा को देश में ही बेहतर अवसर मिल सकें।

*सरहद पर समानता का दिया उदाहरण*

वक्ताओं ने भारतीय सैनिकों का उदाहरण देते हुए कहा कि देश की सीमाओं की रक्षा करते समय जवान के सामने जाति, धर्म या वर्ग का सवाल नहीं होता। सैनिक देश की रक्षा के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान देता है। उन्होंने कहा कि देश के विकास में भी ऐसी भावना मजबूत होनी चाहिए जिसमें सभी नागरिकों को आगे बढ़ने का अवसर मिले।

सभा में पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के जीवन का उदाहरण देते हुए वक्ताओं ने कहा कि सामान्य परिवार से निकलकर उन्होंने अपनी प्रतिभा और मेहनत के दम पर देश के सर्वोच्च पदों तक पहुंच बनाई। वक्ताओं ने कहा कि भारत को आगे बढ़ाने के लिए देश के हर प्रतिभाशाली और जरूरतमंद युवा को अवसर देना होगा।

*शांतिपूर्ण तरीके से सौंपा ज्ञापन*

कार्यक्रम के अंत में सवर्ण समाज के प्रतिनिधियों ने अपनी विभिन्न मांगों को लेकर राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री के नाम ज्ञापन अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) ढीमरखेड़ा को सौंपा। ज्ञापन के माध्यम से आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा, आर्थिक आधार पर आरक्षण, आरक्षित वर्ग में क्रीमीलेयर, यूजीसी नियमों में बदलाव पर पुनर्विचार, एससी-एसटी एक्ट से संबंधित सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों पर विचार तथा सवर्ण आयोग के गठन की मांग रखी गई। कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने कहा कि लोकतंत्र में अपनी मांगों को शांतिपूर्ण और संवैधानिक तरीके से सरकार तक पहुंचाना प्रत्येक नागरिक का अधिकार है। उन्होंने केंद्र सरकार से मांगों पर गंभीरता से विचार कर सभी वर्गों के हित में व्यापक नीति तैयार करने की अपील की।

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