चुनावी आहट के बीच बढ़ी नेतागिरी, बाहरी पंचायतों में नाम जुड़वाने के आरोपों से गर्माया क्षेत्र का सियासी माहौल, जनता की दिखने लगी अब सेवा इतने दिनों से पता नहीं नेता कहां गुमशुदा हो गए थे
चुनावी आहट के बीच बढ़ी नेतागिरी, बाहरी पंचायतों में नाम जुड़वाने के आरोपों से गर्माया क्षेत्र का सियासी माहौल, जनता की दिखने लगी अब सेवा इतने दिनों से पता नहीं नेता कहां गुमशुदा हो गए थे
कटनी | त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव की आहट सुनते ही मध्य प्रदेश के कटनी जिले के ढीमरखेड़ा तहसील क्षेत्र में राजनीतिक सरगर्मियां अचानक तेज हो गई हैं।जैसे-जैसे चुनावी बिगुल बजने का समय करीब आ रहा है, वैसे-वैसे ग्रामीण अंचलों में बाहरी नेताओं की आवाजाही और "नेतागिरी" का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देने लगा है। क्षेत्र के चाय-पान की दुकानों से लेकर चौपालों तक केवल एक ही चर्चा है जो नेता बीते वर्षों में कभी ग्रामीण क्षेत्रों की सुध लेने नहीं पहुंचे, उन्हें अचानक गांव के विकास और जनसमस्याओं की चिंता कैसे सताने लगी? इस पूरी राजनीतिक चहल-पहल के बीच सबसे बड़ा और गंभीर मुद्दा सामने आया है बाहरी ग्राम पंचायतों में नियम-विरुद्ध मतदाता सूची में नाम जुड़वाने की कोशिशों का। स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि कुछ रसूखदार और प्रभावशाली लोग अपने राजनीतिक स्वार्थ को साधने के लिए उन ग्राम पंचायतों की मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज कराने का प्रयास कर रहे हैं, जहां वे वास्तव में निवास ही नहीं करते। इस खेल के पीछे पंचायत चुनाव में अपनी राजनीतिक पैठ बनाने और विशेषकर सरपंच व जनपद सदस्य पद की दावेदारी मजबूत करने की योजना मानी जा रही है।
*फर्जीवाड़े और दबाव का खेल क्या है पूरा मामला*
ढीमरखेड़ा तहसील के विभिन्न गांवों में यह चर्चा आम हो चुकी है कि कई ऐसे लोग, जो शहरी या अन्य सीमावर्ती क्षेत्रों में स्थाई रूप से रह रहे हैं, वे प्रशासनिक मशीनरी और स्थानीय संपर्कों पर दबाव बनाकर अपना नाम संबंधित ग्राम पंचायत की मतदाता सूची में शामिल करा रहे हैं।नाम जुड़वाने की इस प्रक्रिया के तुरंत बाद, ऐसे नेताओं द्वारा संबंधित ग्राम पंचायतों में सामाजिक और राजनीतिक सक्रियता बढ़ा दी जाती है।गांव के चौपालों पर बैठकर विकास के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, जनसमस्याओं को लेकर ज्ञापन सौंपे जाते हैं और ग्रामीणों को यह अहसास कराने की कोशिश की जाती है कि वे क्षेत्र के सच्चे हमदर्द हैं। लेकिन जागरूक ग्रामीणों की नज़र में यह पूरी कवायद केवल आगामी पंचायत चुनाव में अपनी उम्मीदवारी तय करने का एक जरिया मात्र है।
*जनहित का ढोंग या चुनावी गणित ग्रामीणों ने उठाए तीखे सवाल*
नेताओं की इस अचानक बढ़ी सक्रियता पर ग्रामीणों ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं।स्थानीय निवासियों का कहना है कि यदि इन नेताओं का वास्तविक उद्देश्य केवल क्षेत्र का विकास करना और जनसमस्याओं का समाधान कराना है, तो वे अपने मूल निवास वाले क्षेत्र में यह आवाज क्यों नहीं उठाते चुनाव आते ही दूसरे की पंचायत में जाकर राजनीतिक जड़ें जमाने की यह कोशिश उनकी वास्तविक मंशा पर पानी फेरती है। ग्रामीणों का कहना है पंचायती राज व्यवस्था का मूल सिद्धांत स्थानीय स्वशासन है। जब कोई बाहरी व्यक्ति छल, दबाव या गलत जानकारी के आधार पर गांव का मतदाता बन जाता है, तो वह न केवल स्थानीय युवाओं और वास्तविक निवासियों के लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन करता है, बल्कि पंचायत के स्वाभाविक विकास को भी प्रभावित करता है।
*निष्पक्ष जांच और सख्त प्रशासनिक कार्रवाई की मांग*
पंचायती राज और राज्य निर्वाचन आयोग के नियमों के अनुसार, किसी भी व्यक्ति का नाम उसी ग्राम पंचायत की मतदाता सूची में दर्ज किया जा सकता है, जहां वह साधारणतया निवास करता हो । फर्जी दस्तावेज, गलत शपथ पत्र या प्रशासनिक सांठगांठ के आधार पर तैयार कराई गई मतदाता सूची न केवल प्रक्रियात्मक अनियमितता है, बल्कि कानूनी रूप से भी अपराध की श्रेणी में आती है।ढीमरखेड़ा क्षेत्र के प्रबुद्ध नागरिकों और ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि निवास संबंधी दस्तावेजों की भौतिक जांच जिन व्यक्तियों के नाम हाल ही में या चुनावी वर्ष के दौरान मतदाता सूची में जोड़े गए हैं या जोड़ने के आवेदन आए हैं, उनके निवास संबंधी दस्तावेजों और वास्तविक भौतिक उपस्थिति की निष्पक्ष जांच कराई जाए। बीएलओ और संबंधित पटवारी पंचायत सचिव के माध्यम से मौके पर जाकर पंचनामा तैयार कराया जाए, ताकि कोई भी गैर-निवासी फर्जी तरीके से मतदाता न बन सके। यदि दबाव बनाकर या गलत जानकारी प्रस्तुत कर नाम जुड़वाने की पुष्टि होती है, तो संबंधित आवेदक के साथ-साथ इसमें संलिप्त अधिकारियों कर्मचारियों पर भी दंडात्मक कार्रवाई की जाए।
*पारदर्शी चुनाव प्रक्रिया के लिए प्रशासन की सतर्कता जरूरी*
पंचायत चुनाव लोकतंत्र की सबसे बुनियादी और मजबूत इकाई हैं। यदि नींव में ही फर्जीवाड़े और दबाव का प्रभाव रहेगा, तो पारदर्शी एवं निष्पक्ष चुनाव की कल्पना अधूरी रह जाएगी। ढीमरखेड़ा क्षेत्र में उठ रहे ये सवाल केवल एक गांव या पंचायत तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह पूरी व्यवस्था की साख से जुड़े हैं।अब गेंद प्रशासन के पाले में है। कटनी जिला प्रशासन और ढीमरखेड़ा तहसील प्रशासन को प्राप्त हो रही शिकायतों पर तत्काल संज्ञान लेते हुए मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण पारदर्शी तरीके से कराना होगा, ताकि पात्र और वास्तविक स्थानीय निवासियों के मताधिकार की रक्षा हो सके और लोकतंत्र का यह पर्व अपनी पवित्रता बनाए रखे।

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