आर्थिक आधार पर आरक्षण और धर्म परिवर्तन पर सख्त नीति की मांग कटनी में उग्र आंदोलन की चेतावनी
कटनी | देश में आरक्षण नीति की पुनर्समीक्षा और उसमें व्यापक बदलाव को लेकर एक बार फिर स्वर मुखर होने लगे हैं। मध्य प्रदेश के कटनी जिले से जुड़ी एक प्रमुख सामाजिक हलचल में, खम्हरिया के भूतपूर्व सरपंच एवं वरिष्ठ समाजसेवी रतन यादव तथा समाजसेवी आशीष (सोनू) गौतम ने आरक्षण व्यवस्था के मौजूदा ढांचे पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में मांग की है कि देश में आरक्षण का लाभ केवल और केवल आर्थिक आधार पर दिया जाना चाहिए, ताकि जाति या वर्ग के परे हटकर समाज के हर उस व्यक्ति तक सरकारी योजनाओं और अवसरों का लाभ पहुँच सके, जो वास्तव में गरीब और साधनहीन है।इसके साथ ही, दोनों समाजसेवियों ने एक अन्य संवेदनशील मुद्दे को उठाते हुए सरकार से यह मांग भी की है कि धर्म परिवर्तन करने वाले व्यक्तियों को आरक्षण का लाभ तुरंत प्रभाव से बंद किया जाना चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि शासन-प्रशासन ने इन मांगों पर शीघ्र ही कोई ठोस और सकारात्मक कदम नहीं उठाया, तो वे व्यापक जनसमर्थन के साथ एक उग्र आंदोलन शुरू करने के लिए बाध्य होंगे, जिसकी पूरी जिम्मेदारी शासन और स्थानीय प्रशासन की होगी।
*आर्थिक आधार पर हो आरक्षण पात्र को मिले अधिकार*
कटनी में आयोजित एक प्रेस वार्ता के दौरान समाजसेवियों ने वर्तमान आरक्षण व्यवस्था की कमियों और उससे उत्पन्न हो रही सामाजिक विसंगतियों पर विस्तार से प्रकाश डाला। समाजसेवी रतन यादव ने कहा कि स्वतंत्रता के सात दशकों के बाद भी यदि कोई गरीब परिवार केवल इसलिए मुख्यधारा से वंचित रह जाता है क्योंकि वह किसी विशिष्ट जाति में पैदा नहीं हुआ, तो यह सामाजिक न्याय की मूल भावना के विपरीत है। गरीबी की कोई जाति या धर्म नहीं होता। अभाव, भूख और बेरोजगारी हर वर्ग के गरीब को समान रूप से प्रताड़ित करती है। इसलिए, आरक्षण की व्यवस्था का आधार जाति न होकर आर्थिक स्थिति होना चाहिए।
— रतन यादव, भूतपूर्व सरपंच एवं समाजसेवी
उन्होंने कहा कि समाज के सभी वर्गों चाहे वे सामान्य वर्ग से हों, पिछड़ा वर्ग से हों, या अनुसूचित जाति जनजाति से के आर्थिक रूप से कमजोर और पात्र लोगों को समान अवसर मिलना चाहिए।वर्तमान में ऐसी स्थिति भी देखी जा रही है जहाँ एक ही वर्ग के संपन्न लोग बार-बार आरक्षण का लाभ उठा रहे हैं, जबकि उसी वर्ग का अत्यंत गरीब व्यक्ति आज भी मूलभूत सुविधाओं और अवसरों से वंचित है। आर्थिक आधार पर आरक्षण लागू होने से वास्तव में जरूरतमंद व्यक्ति को आगे बढ़ने का अवसर मिलेगा।
*धर्म परिवर्तन करने वालों के आरक्षण लाभ पर रोक की मांग*
इस दौरान समाजसेवी आशीष (सोनू) गौतम ने धर्म परिवर्तन के मुद्दे पर सरकार का ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि संविधान में आरक्षण का प्रावधान भारतीय समाज की ऐतिहासिक, सामाजिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को ध्यान में रखकर किया गया था। परंतु, जो लोग अपना मूल धर्म छोड़कर दूसरे धर्म को अपना लेते हैं, वे भी कई बार आरक्षण के लाभ का दावा करते रहते हैं या अवैध रूप से इसका लाभ लेते हैं।
आशीष सोनू गौतम ने कहा
"जो व्यक्ति अपनी स्वेच्छा से या किसी अन्य कारण से धर्म परिवर्तन कर चुका है, उसे उस सामाजिक और सांस्कृतिक व्यवस्था के आधार पर मिलने वाले आरक्षण का लाभ उठाने का कोई नैतिक या संवैधानिक अधिकार नहीं होना चाहिए। सरकार को इस विषय पर एक स्पष्ट, पारदर्शी और सख्त नीति बनानी चाहिए ताकि आरक्षण के मूल उद्देश्यों की रक्षा की जा सके। उन्होंने सरकार से अपील की कि ऐसे मामलों की पहचान के लिए एक विशेष जांच प्रक्रिया या सत्यापन प्रणाली लागू की जाए, जिससे धर्म परिवर्तन कर चुके लोग अनुचित लाभ न उठा सकें और यह लाभ केवल मूल पात्र व्यक्तियों तक ही सीमित रहे।
*व्यापक चर्चा और स्पष्ट नीति बनाने की अपील*
दोनों समाजसेवियों ने केंद्र और राज्य सरकार से आग्रह किया कि इस अत्यंत संवेदनशील और महत्वपूर्ण विषय पर संसद और विधानसभाओं में व्यापक चर्चा आयोजित की जाए।उन्होंने कहा कि देश के प्रबुद्ध नागरिकों, कानूनविदों, समाजशास्त्रियों और नीति-निर्माताओं को एक मंच पर लाकर आरक्षण नीति का पुनर्मूल्यांकन किया जाना चाहिए। प्रत्येक परिवार की वास्तविक आर्थिक स्थिति के आधार पर आरक्षण और सरकारी सहायताओं का दायरा तय किया जाए। क्रीमी लेयर का दायरा आरक्षण का लाभ एक ही परिवार में पीढ़ियों दर पीढ़ियों तक सीमित रहने के बजाय, निचले स्तर पर खड़े अंतिम व्यक्ति तक पहुँचाने के लिए नियम बनाए जाएँ। सख्त सत्यापन प्रणाली धर्म परिवर्तन के बाद आरक्षण का लाभ लेने वालों की पहचान कर उनका आरक्षण प्रमाण-पत्र निरस्त करने हेतु कड़े कानून बनाए जाएँ। समान अवसर आर्थिक रूप से पिछड़े हर नागरिक को शिक्षा और नौकरियों में उचित अवसर प्रदान किए जाएँ।
*प्रशासन को चेतावनी मांगें न मानी गईं तो होगा उग्र आंदोलन*
वार्ता के अंत में रतन यादव और आशीष (सोनू) गौतम ने कड़े शब्दों में चेतावनी देते हुए कहा कि यह केवल दो व्यक्तियों की आवाज नहीं है, बल्कि यह समाज के उस बड़े वर्ग की पीड़ा और जनभावना है जो वर्षों से इस विसंगति का शिकार हो रहा है। उन्होंने कहा कि यदि सरकार और प्रशासन ने उनकी मांगों को गंभीरता से नहीं लिया और इस दिशा में शीघ्र ही आवश्यक कदम नहीं उठाए, तो वे चुप नहीं बैठेंगे। वे कटनी जिले के साथ-साथ पूरे प्रदेश और देश स्तर पर जनसमर्थन जुटाकर एक बड़ा और उग्र आंदोलन खड़ा करेंगे। यदि शासन-प्रशासन ने समय रहते हमारी मांगों पर विचार कर कोई नीतिगत निर्णय नहीं लिया, तो आने वाले समय में होने वाले किसी भी जन-आंदोलन, प्रदर्शन या चक्काजाम की संपूर्ण जिम्मेदारी शासन और प्रशासन की होगी।
*जनता के बीच चर्चा का विषय*
कटनी में समाजसेवियों द्वारा उठाए गए इस मुद्दे के बाद स्थानीय स्तर पर और आसपास के क्षेत्रों में व्यापक चर्चा शुरू हो गई है। आम जनता, युवाओं और विभिन्न सामाजिक संगठनों के बीच इस बात को लेकर बहस छिड़ गई है कि क्या वास्तव में अब समय आ गया है जब देश की आरक्षण नीति में व्यापक सुधार किए जाएँ। जहाँ एक ओर युवा वर्ग इसे एक निष्पक्ष और पारदर्शी कदम के रूप में देख रहा है, वहीं दूसरी ओर सामाजिक विश्लेषकों का मानना है कि इस विषय पर सरकार को बिना किसी राजनीतिक दबाव के, समाजहित और देश हित में संतुलित और दूरदर्शी निर्णय लेना होगा।

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें