देश बनाने वाला मजदूर, फिर भी सबसे मजबूर जिसका पसीना सबसे कीमती, उसकी ज़िंदगी सबसे सस्ती श्रम का शोषण और व्यवस्था की बेफ़िक्री देश की रीढ़ ही बदहाली की ज़ंजीरों में जकड़ी है
देश बनाने वाला मजदूर, फिर भी सबसे मजबूर जिसका पसीना सबसे कीमती, उसकी ज़िंदगी सबसे सस्ती श्रम का शोषण और व्यवस्था की बेफ़िक्री देश की रीढ़ ही बदहाली की ज़ंजीरों में जकड़ी है
कटनी | जिस देश की गगनचुंबी इमारतें मजदूर की छाती पर बनी हों, जहाँ के हाईवे और एक्सप्रेसवे पसीने की एक-एक बूँद को सोखकर बने हों, उसी देश में मजदूर सबसे ज़्यादा उपेक्षित, लाचार और अधिकार-विहीन है। कटनी से लेकर देश के कोने-कोने तक की यही कड़वी और ख़ौफ़नाक हकीक़त है—जो हाथ देश की अर्थव्यवस्था का पहिया घुमाते हैं, वे अपने बच्चों की थाली में दो वक़्त की रोटी सजाने के लिए रोज़ तिल-तिल मरने को मजबूर हैं। यह केवल एक आर्थिक समस्या नहीं है; यह उस खोखली व्यवस्था, राजनीतिक ढोंग और प्रशासनिक असंवेदनशीलता पर सीधा हमला है जो हर चुनाव में मजदूरों को 'विकास का नायक' बताती है और चुनाव बीतते ही उन्हें 'गंदगी की तरह' बुहारकर किनारे कर देती है।
*पेट की आग और विरोध की बेबसी चुप रहने की मजबूरी*
कटनी की इस जमीनी सच्चाई को ध्यान से देखिए—मजदूर अपनी पीड़ा सुनाने किसी मंच, किसी रैली या किसी हुक्मरान की चौखट तक क्यों नहीं पहुँच पाता? क्योंकि लोकतंत्र के मंच अमीर और फुरसतिया लोगों के लिए सजे हैं। मजदूर के पास अपने हक में नारे लगाने की भी फुर्सत नहीं है। अगर वह अपनी आवाज़ बुलंद करने के लिए एक दिन मजदूरी छोड़ दे, तो उस दिन उसके घर का चूल्हा ठंडा रह जाएगा। शाम को रोते हुए बच्चे और खाली पतीला उसका इंतज़ार कर रहे होते हैं। व्यवस्था ने मजदूर को इस कदर आर्थिक तंगी के जाल में फँसाकर रखा है कि वह अपनी गुलामी और शोषण के खिलाफ आवाज़ उठाने की हिम्मत भी नहीं जुटा पाता। उसकी यही बेबसी शोषकों, ठेकेदारों और हुक्मरानों का सबसे बड़ा हथियार बन चुकी है। पेट की आग ने मजदूर के हाथों से विरोध का परचम छीन लिया है और उसे चुपचाप अत्याचार सहने पर मजबूर कर दिया है।
*खून-पसीने का मोल कौड़ियों में श्रम की बेरहम लूट*
आज देश का संगठित और असंगठित, दोनों ही क्षेत्रों का मजदूर अमानवीय स्थितियों में काम करने को अभिशप्त है। बारह-बारह घंटे की हाड़-तोड़ मेहनत के बाद उसे जो मजदूरी मिलती है, वह आसमान छूती महंगाई के सामने एक मज़ाक से ज़्यादा कुछ नहीं है। लागत और सुरक्षा शून्य: बिना किसी सुरक्षा उपकरण के गगनचुंबी इमारतों पर लटकते मजदूर हों या जानलेवा रसायनों के बीच काम करते कारखानों के श्रमिक उनकी जान की कीमत इस तंत्र के लिए कीड़े-मकोड़ों से ज़्यादा नहीं है। उचित मूल्य का अभाव मुनाफ़ा सेठों और ठेकेदारों की तिजोरियों में भरता है, और जिसके खून-पसीने से उत्पादन होता है, उसे मिलती है महज़ इतनी रकम जिससे वह ज़िंदा रहकर अगले दिन फिर गुलामी कर सके।
*अधिकार माँगने पर लाठियाँ*
जब ये मजदूर अपने बुनियादी हक, बेहतर सुविधाओं या न्यूनतम मजदूरी की माँग करते हैं, तो संवेदनशीलता से बात करने के बजाय उनके साथ अपराधियों जैसा सलूक किया जाता है। लाठियाँ, पुलिस का खौफ और नौकरियों से निकाला जाना ही उनका एकमात्र 'समाधान' बनता है।
*बेरोजगारी का भयानक मंज़र युवाओं के सपनों की मय्यत*
व्यवस्था की नाकामी का दूसरा सबसे ख़ौफ़नाक चेहरा है—देश की युवा आबादी का भविष्यहीन होना।
डिग्रियों के पुलिंदे बगल में दबाए शिक्षित युवा रोज़गार की भीख माँगने पर मजबूर हैं। सरकारी नौकरियों के विज्ञापन चुनावी हथकंडे बन चुके हैं; परीक्षा के पर्चे लीक होते हैं, भतियाँ सालों-साल अदालतों में लटकी रहती हैं और युवा अपनी उम्र सीमा पार कर जाते हैं।
*इतिहास के आईने में गुलामी से लेकर आज तक श्रम का शोषण*
इतिहास गवाह है कि सत्ता और पूंजी ने हमेशा श्रम के बूते अपने महल खड़े किए हैं, लेकिन श्रमिकों को हमेशा हाशिये पर ही रखा। अंग्रेजों के शासनकाल में भारतीय मजदूरों को चाय के बागानों, रेल की पटरियों और विदेशों (जैसे फिजी, मॉरीशस) में 'गिरमिटिया मजदूर' बनाकर भेजा जाता था। उनका एकमात्र काम था ब्रिटिश साम्राज्य के खजाने को भरना। बेगार और बंधुआ प्रथा आजादी से पहले जमींदारी और सामंती व्यवस्था में 'बेगार' (बिना मजदूरी के काम) कराया जाता था। मजदूर अपनी आने वाली पीढ़ियों के साथ कर्ज के जाल में फंसा रहता था।
उद्योग क्रांति का कड़वा सच 19वीं और 20th में जब देश में मिलें (जैसे मुंबई की कपड़ा मिलें) लगीं, तब भी 14-16 घंटे काम और सुरक्षा के नाम पर शून्य सुविधाएं ही मजदूरों की नियति थीं। आजादी के आंदोलन में महात्मा गांधी ने 'ट्रस्टीशिप' (संरक्षकता) का सिद्धांत दिया था, जिसमें उद्योगपतियों को संपत्ति का मालिक नहीं बल्कि समाज का ट्रस्टी माना गया था। लेकिन आजादी के 7 दशक बाद भी मजदूर ट्रस्टी तो दूर, अपने अधिकार का नागरिक भी नहीं बन सका।
*वर्तमान परिदृश्य नीतियों और व्यवस्था की बेफ़िक्री*
आज जब हम 21वीं सदी के भारत, 5 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था और 'विकसित भारत' के सपने देख रहे हैं, तब ज़मीनी धरातल पर कड़वे विरोधाभास तैर रहे हैं ई-श्रम और वास्तविकता: देश में लगभग 85% से 90% श्रमबल असंगठित क्षेत्र में है। भले ही सरकार ने 'ई-श्रम पोर्टल' जैसे डिजिटल कदम उठाए हों, लेकिन कटनी से लेकर देश के दूर-दराज़ इलाकों तक सामाजिक सुरक्षा (पेंशन, स्वास्थ्य बीमा, दुर्घटना मुआवजा) आज भी एक कागज़ी छलावा ही बनी हुई है।
*लेबर कोड की चिंताएँ*
चार नए लेबर कोड्स को लागू करने की दिशा में जो बदलाव हो रहे हैं, श्रमिक संगठनों का आरोप है कि वे ट्रेड यूनियनों की ताकत को कमजोर करते हैं और 'हायर एंड फायर' (आसानी से नौकरी से निकालना) की छूट देकर ठेकेदारों और कॉर्पोरेट को अधिक मजबूती देते हैं।
ख. गिग इकोनॉमीऔर 'नया शोषण'
शहर के हाईवे और डिलीवरी नेटवर्क पर दौड़ते गिग वर्कर (Zomato, Swiggy, Amazon के डिलीवरी बॉय/गर्ल्स) आधुनिक समय के असंगठित मजदूर हैं।
न तो उनकी कोई निश्चित ड्यूटी टाइमिंग है, न ही दुर्घटना बीमा या न्यूनतम वेतन की गारंटी। टारगेट पूरा करने की होड़ में वे जान जोखिम में डालते हैं—यह 'डिजिटल गुलामी' का नया दौर है।
*पेपर लीक और रोजगार का चुनावी नाटक*
जैसा कि आपने युवाओं के बारे में उल्लेख किया हाल के वर्षों में (उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, मध्य प्रदेश से लेकर केंद्र तक) पेपर लीक (Paper Leaks) और भर्ती परीक्षाओं में अनिश्चितता ने देश के करोड़ों युवाओं को अवसाद में धकेला है।
*'डिग्री-धारक बेरोजगार*
आज स्थिति यह है कि चपरासी और ग्रुप-डी के पदों के लिए बी.टेक, एम.बी.ए. और पीएच.डी. धारक आवेदन कर रहे हैं। परीक्षाओं का फॉर्म भरने के नाम पर बेरोजगारी से करोड़ों रुपये तो वसूल लिए जाते हैं, लेकिन परिणाम सालों-साल अदालतों में लटके रहते हैं।

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