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पैंगोलिन तस्करी पर कटनी कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला 4 शिकारियों की अपील खारिज, 9 साल की जेल और भारी जुर्माना बरकरार, तस्करी का खेल खत्म 11 किलो के जीवित पैंगोलिन मामले में 4 शिकारियों को कठोर कारावास, कटनी सेशन कोर्ट ने दिया नजीर बनने वाला फैसला मध्य प्रदेश का पहला ऐसा ऐतिहासिक फैसला

 पैंगोलिन तस्करी पर कटनी कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला 4 शिकारियों की अपील खारिज, 9 साल की जेल और भारी जुर्माना बरकरार, तस्करी का खेल खत्म 11 किलो के जीवित पैंगोलिन मामले में 4 शिकारियों को कठोर कारावास, कटनी सेशन कोर्ट ने दिया नजीर बनने वाला फैसला मध्य प्रदेश का पहला ऐसा ऐतिहासिक फैसला



कटनी ।  वन्यजीव संरक्षण के इतिहास में मध्य प्रदेश के कटनी जिले से एक मील का पत्थर साबित होने वाला न्यायिक निर्णय सामने आया है। दुर्लभ और लुप्तप्राय श्रेणी में शामिल अति-संवेदनशील जीव पैंगोलिन के अवैध शिकार और तस्करी के संगीन मामले में जिला एवं सत्र न्यायालय कटनी ने चारों दोषियों की अपील को खारिज करते हुए निचली अदालत द्वारा सुनाई गई कठोर कारावास और आर्थिक दंड की सजा को पूर्णतः बरकरार रखा है। वन विभाग की त्वरित कार्रवाई, वैज्ञानिक दृष्टिकोण से की गई सटीक विवेचना और अदालती प्रक्रिया में अभियोजन पक्ष की मजबूत पैरवी के चलते मात्र 16 माह की अल्पावधि में आरोपियों को उनके अंजाम तक पहुंचाया गया। यह फैसला वन्यजीवों के अवैध व्यापार पर अंकुश लगाने तथा शिकारियों के मन में कानून का खौफ पैदा करने की दिशा में एक नजीर बन गया है।कटनी के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश जितेन्द्र शर्मा की अदालत ने मामले की गंभीरता और वन्यप्राणी (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के कड़े प्रावधानों पर विचार करते हुए निचली अदालत (न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, पूर्वी तिवारी) द्वारा 30 जनवरी 2026 को दिए गए मूल फैसले की पुष्टि की।अदालत ने स्पष्ट किया कि वन्यजीवों का अवैध शिकार पर्यावरण संतुलन के लिए गंभीर खतरा है, इसलिए ऐसे अपराधों में किसी प्रकार की नरमी नहीं बरती जा सकती।कन्छेदी (पिता प्रेमचंद बैगा)वन्यप्राणी (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की धारा 39, 48(अ), 49(ब)09 वर्ष सश्रम कारावास₹75,000

प्रेमचंद (पिता विश्राम बैगा)वन्यप्राणी (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की धारा 39, 48(अ), 49(ब)09 वर्ष सश्रम कारावास₹75,000

सूरज (पिता चंद्रभान गौड़)वन्यप्राणी (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की धारा 49(ब) सहपठित धारा 52 के अंतर्गत 03 वर्ष कारावास₹25,000

जगना (पिता जुगराज गौड़)वन्यप्राणी (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की धारा 49(ब) सहपठित धारा 52 03 वर्ष कारावास₹25,000 का जुर्माना।

 *मुखबिर की सूचना पर बिछाया गया था जाल*

इस पूरे मामले की शुरुआत 21 अगस्त 2024 को हुई थी।जबलपुर के कुंडम परियोजना मंडल के अंतर्गत आने वाले परियोजना परिक्षेत्र रामपुर के बीट अमराडोंड में वन विभाग की टीम मुस्तैद थी। बीट प्रभारी अभिषेक शुक्ला को गुप्त मुखबिर तंत्र से एक अत्यंत संवेदनशील सूचना प्राप्त हुई। मुखबिर ने बताया कि बड़वारा तहसील के ग्राम अमराडोंड के पास कुछ स्थानीय तस्कर व शिकारी एक दुर्लभ जीवित पैंगोलिन को बेचने और उसकी तस्करी करने की फिराक में हैं। सूचना की गंभीरता को देखते हुए तत्कालीन परिक्षेत्र अधिकारी देवेश खराड़ी को तत्काल अवगत कराया गया। उनके कुशल मार्गदर्शन में तुरंत एक विशेष दलबल का गठन किया गया। योजनाबद्ध तरीके से अमराडोंड क्षेत्र में घेराबंदी कर दबिश दी गई। वन विभाग की त्वरित कार्रवाई से मौके पर मौजूद आरोपियों को संभलने का मौका नहीं मिला और टीम ने चार संदिग्धों को रंगे हाथों धर दबोचा।

*11 किलोग्राम वजनी जीवित नर पैंगोलिन बरामद*

दबोचे गए आरोपियों की जब तलाशी ली गई, तो उनके कब्जे से 11 किलोग्राम वजनी जीवित नर पैंगोलिन बरामद किया गया। आरोपियों का उद्देश्य इस बेजुबान जीव का शिकार कर इसके शल्कों और मांस का अवैध व्यापार करना था। वन विभाग की टीम ने पैंगोलिन को सुरक्षित अपनी कस्टडी में लिया और वन्यप्राणी (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के कड़े प्रावधानों के तहत वन अपराध प्रकरण क्रमांक 183/2072 पंजीबद्ध कर वैधानिक कार्रवाई शुरू की।

*विचारण एवं न्यायिक प्रक्रिया 16 माह में मिली सजा*

मामले की गंभीरता को देखते हुए वन विभाग की टीम ने वैज्ञानिक साक्ष्यों, गवाहों के बयानों और जब्ती पत्रकों को पूरी पारदर्शिता के साथ तैयार किया। प्रकरण को निचली अदालत, न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी पूर्वी तिवारी के समक्ष प्रस्तुत किया गया।अदालत में शासन की ओर से विशेष लोक अभियोजक मंजुला श्रीवास्तव ने अभियोजन पक्ष का प्रभावी ढंग से प्रतिनिधित्व किया। उन्होंने दलील दी कि पैंगोलिन वन्यप्राणी (संरक्षण) अधिनियम की अनुसूची-I का प्राणी है, जिसे बाघ और शेर के समान ही उच्चतम स्तर का कानूनी संरक्षण प्राप्त है। इस प्रकार के जीवों की तस्करी अंतरराज्यीय और अंतरराष्ट्रीय अपराध गिरोहों से जुड़ी होती है, इसलिए आरोपियों को कड़ी से कड़ी सजा दी जानी चाहिए। अभियोजन पक्ष की अकाट्य दलीलों और वन विभाग द्वारा प्रस्तुत ठोस साक्ष्यों के आधार पर अदालत ने लगभग 16 महीने तक चले विचारण के बाद 30 जनवरी 2026 को चारों आरोपियों को दोषी ठहराते हुए कारावास व जुर्माने से दंडित किया।

*जिला एवं सत्र न्यायालय में अपील भी हुई खारिज*

न्यायिक मजिस्ट्रेट के फैसले के खिलाफ चारों सजायाफ्ता आरोपियों ने जिला एवं सत्र न्यायालय कटनी में अपील दायर की थी। अपील पर सुनवाई के दौरान भी शासन का पक्ष विशेष लोक अभियोजक मंजुला श्रीवास्तव ने रखा। उन्होंने अदालत के समक्ष निचली अदालत के निर्णय को न्यायसंगत बताते हुए आरोपियों की अपील निरस्त करने का अनुरोध किया। लगभग 6 महीने तक चले गहन पुनरीक्षण और सुनवाई के उपरांत 10 अगस्त 2026 को प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश जितेन्द्र शर्मा ने निचली अदालत के आदेश को न्यायसंगत माना।न्यायालय ने अपील को पूरी तरह खारिज करते हुए निचली अदालत द्वारा दी गई 9-9 वर्ष और 3-3 वर्ष की सजा तथा आर्थिक दंड को यथावत बनाए रखने का ऐतिहासिक फैसला सुनाया।

*मध्यप्रदेश का पहला मामला टीम वर्क और सटीक जांच की मिसाल*

यह प्रकरण मध्य प्रदेश के वन विभाग और न्यायिक इतिहास में विशेष महत्व रखता है। यह पूरे प्रदेश का संभवतः ऐसा पहला मामला है, जहां अनुसूची-I के जीव पैंगोलिन के शिकार व तस्करी में इतनी त्वरित (मात्र 16 माह में) और इतनी कठोर सजा उच्च अदालत से भी कायम रखी गई है। बीट प्रभारी का स्थानीय मुखबिरों पर मजबूत नियंत्रण। साक्ष्यों का संकलन इस तरह किया गया कि आरोपियों को कानूनी खामियों का लाभ न मिल सके। इस पूरी कार्रवाई, साक्ष्य संकलन और न्यायालयीन पैरवी में वनरक्षक अभिषेक शुक्ला और क्षेत्ररक्षक राहुल सेन की भूमिका अत्यंत सराहनीय और अनुकरणीय रही। वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, इस त्वरित फैसले से वन्यजीव तस्करों और शिकारियों के बीच कड़ा संदेश जाएगा कि बेजुबान जीवों को नुकसान पहुंचाने वाले कानूनी शिकंजे से बच नहीं सकते।

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