जिंदगी किराए का मकान है, एक दिन चाबी लौटानी ही पड़ेगी, इसलिए मोह कम, इंसानियत ज्यादा रखिए
कटनी | मानव जीवन प्रकृति का सबसे अनमोल और अद्भुत उपहार है। परंतु इस जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई यह है कि यह अत्यंत क्षणभंगुर है। जो आज है, वह कल नहीं होगा, जो जन्म लेता है, उसका अंत भी निश्चित है।हम इस संसार में एक यात्री की तरह आते हैं, कुछ समय ठहरते हैं और फिर अपनी यात्रा पूरी करके चले जाते हैं।यदि गहराई से विचार किया जाए, तो यह संपूर्ण संसार एक सराय की तरह है और हमारा यह शरीर तथा जीवन एक किराए के मकान के समान है। जिस प्रकार किराए के मकान में रहने वाला व्यक्ति जानता है कि वह उस घर का स्थायी मालिक नहीं है और एक न एक दिन उसे वह मकान खाली करके उसकी चाबी मकान मालिक को लौटानी ही होगी, ठीक उसी प्रकार इस धरा पर हमारा प्रवास भी सीमित है। कालचक्र का बुलावा आते ही हमें यह सांसारिक शरीर और इसके तमाम साजो-सामान यहीं छोड़कर जाना पड़ता है।
*भौतिकता की अंधी दौड़ में भटकता मानव*
आज का आधुनिक समाज भौतिक सुख-सुविधाओं और धन-संपत्ति के संचय की अंधी दौड़ में इतनी तेज़ी से भाग रहा है कि वह जीवन के मूलभूत सत्य को भूल चुका है। दिन-रात केवल यह चिंता सताती है कि अधिक से अधिक धन कैसे कमाया जाए? बड़ा से बड़ा मकान और महँगी गाड़ियाँ कैसे खरीदी जाएँ? समाज में अपना पद और प्रतिष्ठा कैसे बढ़ाई जाए? इस आपाधापी में मनुष्य यह भूल जाता है कि न धन, न पद, न प्रतिष्ठा और न ही उसका अहंकार इनमें से कोई भी चीज़ उसके साथ अंत तक नहीं जाएगी। भौतिक साधन जीवन को सुगम बना सकते हैं, लेकिन वे आत्मा को शांति और जीवन को सार्थकता प्रदान नहीं कर सकते। आज स्थिति यह हो गई है कि चमक-धमक वाली इस दुनिया में रिश्तों की गर्माहट खोती जा रही है। लोग सुख-सुविधाओं के सामान तो बटोर रहे हैं, लेकिन शांति, करुणा और संवेदनाओं से दूर होते जा रहे हैं।
*मोह, लालच और अहंकार का जाल*
संसार में अधिकांश दुखों का कारण मोह, लालच और अहंकार है। मोह मनुष्य की बुद्धि पर ऐसा पर्दा डाल देता है कि वह सही और गलत का भेद भूल जाता है। आज हम देखते हैं कि ज़मीन के छोटे से टुकड़े या संपत्ति के थोड़े से हिस्से के लिए सगे-संबंधी आपस में लड़ रहे हैं। भाइयों में कटुता आ रही है, बच्चे माता-पिता से दूर हो रहे हैं और वर्षों पुराने मज़बूत रिश्ते क्षण भर में टूटकर बिखर रहे हैं। छोटी-छोटी बातों पर लोगों का अहम (Ego) टकराता है और दूरियाँ बढ़ती चली जाती हैं। स्वार्थ ने इंसान की संवेदनाओं को इतना कमज़ोर कर दिया है कि उसे दूसरों का दुःख-दर्द दिखाई ही नहीं देता। हम यह भूल जाते हैं कि जिस संपत्ति और अभिमान के लिए हम अपनों का दिल दुखा रहे हैं, वह सब यहीं धरा का धरा रह जाएगा।
*अंतिम यात्रा क्या साथ जाएगा और क्या यहीं छूट जाएगा*
जब जीवन की शाम ढलती है और अंतिम समय निकट आता है, तब जीवन का सारा गणित स्पष्ट हो जाता है। उस समय न बैंक बैलेंस काम आता है, न ही वे आलीशान महल और गाड़ियाँ साथ चलती हैं, न ही वे ऊँचे पद और उपाधियाँ किसी काम आती हैं। संसार की हर वस्तु यहीं छूट जाती है। यदि कुछ साथ जाता है, तो वे हैं हमारे कर्म हमने अपने जीवन में कितने अच्छे या बुरे काम किए। हमारा व्यवहार हमने लोगों के साथ कैसा आचरण किया। हमारा प्रेम हमने दूसरों के जीवन में कितनी खुशियाँ बाँटीं।

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