गरीबों के हक पर डाका, रीठी तहसील में जनगणना और भौतिक सत्यापन के नाम पर बड़ा खेल, तपतपाती धूप में काम कर रहे कर्मचारियों पर उच्च अधिकारियों का दबाव शौचालय विहीन गरीबों को कागजों पर 'पात्र' दिखाकर बंद किया जा रहा लाभ का रास्ता प्रधानमंत्री के 'स्वच्छ भारत मिशन' को पलीता लगा रहे जिम्मेदार
गरीबों के हक पर डाका, रीठी तहसील में जनगणना और भौतिक सत्यापन के नाम पर बड़ा खेल, तपतपाती धूप में काम कर रहे कर्मचारियों पर उच्च अधिकारियों का दबाव
शौचालय विहीन गरीबों को कागजों पर 'पात्र' दिखाकर बंद किया जा रहा लाभ का रास्ता
प्रधानमंत्री के 'स्वच्छ भारत मिशन' को पलीता लगा रहे जिम्मेदार
कटनी । एक तरफ सरकार अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति तक शासन की योजनाओं का लाभ पहुंचाने का दावा करती है, वहीं दूसरी तरफ कटनी जिले की रीठी तहसील से एक ऐसा मामला सामने आया है जो प्रशासनिक संवेदनहीनता को उजागर करता है। यहाँ जनगणना और भौतिक सत्यापन के नाम पर गरीबों का हक छीनने का एक बड़ा प्रयास किया जा रहा है। मामला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के महत्वाकांक्षी 'स्वच्छ भारत मिशन' से जुड़ा है। ग्रामीणों से मिली जानकारी के अनुसार, क्षेत्र में इस समय जनगणना के बाद पुनः सत्यापन (भौतिक सत्यापन) का कार्य चल रहा है। इसके अंतर्गत ग्राउंड स्टाफ को घर-घर जाकर यह जांच करनी है कि किसके पास शौचालय है (पात्र) और किसके पास नहीं (अपात्र)। लेकिन रीठी तहसील के उच्च अधिकारियों द्वारा अपने ही अधीनस्थ कर्मचारियों पर एक बेहद गलत कार्य को अंजाम देने का दबाव बनाया जा रहा है।
*कागजों पर 'पात्र', हकीकत में 'वंचित'*
हैरानी की बात यह है कि रीठी तहसील के अंतर्गत आने वाले कई गांवों में आज भी ऐसे सैकड़ों गरीब परिवार हैं, जिनके पास न तो शौचालय है और न ही आज दिनांक तक उन्हें स्वच्छ भारत मिशन के तहत कोई आर्थिक सहायता या लाभ मिला है। नियमतः इन्हें 'अपात्र' (यानी जिन्हें अभी लाभ नहीं मिला और मिलना शेष है) की श्रेणी में रखा जाना चाहिए।
बड़ा आरोप: क्षेत्र के जनगणना और सत्यापन प्रभारियों पर आरोप है कि वे तपतपाती धूप में ग्राउंड पर काम कर रहे छोटे कर्मचारियों पर दबाव बना रहे हैं कि जो वास्तव में अपात्र (वंचित) हैं, उन्हें भी सर्वे सूची में 'पात्र' (शौचालय युक्त) दिखा दिया जाए।
*अपनी प्रतिष्ठा के लिए गरीबों के हितों से खिलवाड़*
सोचने वाली बात यह है कि यदि कागजों पर इन गरीब परिवारों को पहले से ही 'पात्र और लाभान्वित' घोषित कर दिया गया, तो भविष्य में इन्हें कभी भी शौचालय निर्माण के लिए सरकारी सहायता नहीं मिल पाएगी। अधिकारियों द्वारा अपनी पीठ थपथपाने और कागजों पर शत-प्रतिशत लक्ष्य दिखाने के चक्कर में उन गरीबों के हितों की बलि चढ़ाई जा रही है, जो आज भी खुले में शौच जाने को मजबूर हैं।
*निष्पक्ष जांच हो तो खुलेगी पोल*
स्थानीय ग्रामीणों और जागरूक नागरिकों का कहना है कि रीठी तहसील के अंतर्गत आने वाले गांवों की यदि उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच कराई जाए, तो दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। सर्वे में जिन परिवारों को 'शौचालय युक्त' बताकर पात्र दर्शाया जा रहा है, धरातल पर उनके पास कोई शौचालय मौजूद ही नहीं है।
अब सवाल यह उठता है कि अपनी प्रतिष्ठा की खातिर दूसरों के हितों से खेलने वाले ऐसे अधिकारियों पर वरिष्ठ प्रशासन कब और क्या कदम उठाएगा? आखिर कब तक इन अधिकारियों का यह तानाशाही रवैया जारी रहेगा और कब मिलेगा रीठी के इन गरीबों को उनका असली हक?

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