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ढीमरखेड़ा में नेता नहीं, नौकरशाहों के दलाल सक्रिय हैं ढीमरखेड़ा को नेता चाहिए, नौकरशाहों के दलाल नहीं

 ढीमरखेड़ा में नेता नहीं, नौकरशाहों के दलाल सक्रिय हैं

ढीमरखेड़ा को नेता चाहिए, नौकरशाहों के दलाल नहीं 



कटनी |  ढीमरखेड़ा क्षेत्र आज एक अजीब विडंबना का शिकार है। यहां जनता है, समस्याएं हैं, योजनाएं हैं, बजट है लेकिन अगर कुछ नहीं है तो वो है सच्चा नेतृत्व। और जब नेतृत्व गायब हो जाता है, तो भ्रष्टाचार अपने आप राजा बन जाता है।आज हालत यह है कि क्षेत्र में कोई भी ऐसा नेता नजर नहीं आता जो जनता की आवाज बन सके। जो नेता हैं, वे जनता के नहीं, बल्कि अधिकारियों के दरबार में हाजिरी लगाने वाले स्थायी मेहमान बन चुके हैं। सुबह से शाम तक जनता की समस्याएं सुनने की बजाय, ये जनप्रतिनिधि बाबुओं के चैंबर में जी सर, बिल्कुल सर का रियाज़ करते नजर आते हैं। सवाल यह उठता है कि आखिर यह कैसी समाजसेवा है? क्या समाजसेवा का मतलब सिर्फ अधिकारियों की चापलूसी करना रह गया है क्या जनता ने इन्हें इसलिए चुना था कि ये उनके हक की लड़ाई लड़ने के बजाय अपनी “फाइलें पास” कराने में व्यस्त रहें ढीमरखेड़ा में भ्रष्टाचार अब कोई मुद्दा नहीं, बल्कि “सिस्टम” बन चुका है। राशन से लेकर सड़क तक, हर योजना में गड़बड़ी की चर्चा आम है। लेकिन इन सब पर आवाज उठाने वाला कोई नहीं। क्योंकि जो आवाज उठाएगा, उसकी “सेटिंग” बिगड़ जाएगी। और यहां सेटिंग ही असली राजनीति बन चुकी है।

नेताओं का काम होना चाहिए जनता और प्रशासन के बीच पुल बनना। लेकिन यहां तो नेता खुद ही प्रशासन के पुलिया बन गए हैं जिस पर से भ्रष्टाचार की गाड़ियां आराम से गुजर रही हैं।विडंबना देखिए, चुनाव आते ही यही नेता बड़े-बड़े वादे करते हैं हम बदल देंगे व्यवस्था, हम खत्म कर देंगे भ्रष्टाचार । लेकिन चुनाव जीतते ही उनका पहला काम होता है किस अधिकारी से तालमेल बैठाया जाए ताकि अपना काम बिना रुकावट चलता रहे। ढीमरखेड़ा की जनता अब समझने लगी है कि असली समस्या भ्रष्ट अधिकारी नहीं, बल्कि कमजोर और स्वार्थी नेतृत्व है। क्योंकि जब नेता ही सवाल पूछना छोड़ दे, तो अधिकारी जवाब देना क्यों जरूरी समझे? अब वक्त आ गया है कि जनता खुद तय करे उन्हें जी हुजूरी करने वाले प्रतिनिधि” चाहिए या हक के लिए लड़ने वाले नेता । क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ी ताकत जनता ही होती है, और जब जनता जागती है तो बड़े-बड़े सिंहासन हिल जाते हैं।

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