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खरी - अखरी सवाल उठाते हैं पालकी नहीं चालीस दिन के युद्ध का हल चालीस घंटे में निकालने की कवायद यानी हथेली पर सरसों उगाना , पूरी वार्ता को तेल और गैस की व्यापारिक मंडी बनाने में जुटता दिखा अमेरिका

 खरी - अखरी सवाल उठाते हैं पालकी नहीं

चालीस दिन के युद्ध का हल चालीस घंटे में निकालने की कवायद यानी हथेली पर सरसों उगाना , पूरी वार्ता को तेल और गैस की व्यापारिक मंडी बनाने में जुटता दिखा अमेरिका 



Well good morning everybody 21 hours and we had a number of discussion that's the good news the bad news is that we have not reached agreement an I thinks that's bad news for much more than it's bad news for the United States of America. So we go back to the United States having not come to an agreement. We clear red line are thinks to akonot on things not to them and we clear as we possibility could and they have choose not to accept our terms. But the simple fact is we need to see if commitment the nuclear weapon and they will not see the tools would enable them to quickly achieve a nuclear weapon that is the core goal of the present United States and that's what we have tried to achieve through this negotiations again their nuclear program such as it is the enrichment facilities that they have that they had before they have been destroyed but the simple question is do we see a fundamental commitment of will for the nuclear weapon just now not just tours for the long term we have seen.

पाकिस्तान में 12 अप्रैल 2026 की ऐतिहासिक सुबह के तकरीबन 6.55 बजे उस मंच को सजाया गया जिस पर खड़े होकर अमेरिकी उप राष्ट्रपति जेडी वेंस ने पत्रकारों से रूबरू होते हुए कहा कि 21 घंटे की बातचीत बेनतीजा रही। कुछ भी हासिल नहीं हुआ। हथेली खाली लेकर हम अपने वतन के लिए कूच कर रहे हैं। ईरान की तरफ से कोई भी इस प्रेस कांफ्रेंस में इसलिए शामिल नहीं हुआ क्योंकि उन्हें पता था कि जेडी वेंस ही इसका जिक्र करेंगे कि ईरान क्यों नहीं झुका। सवाल है कि अमेरिकी राष्ट्रपति की गाइड लाइन के हिसाब से खासकर जिन दो महत्वपूर्ण  मुद्दों को लगातार उठाया रहा था क्या ईरान उन पर झुक सकता था ? हार्मुज रूट तो शुरू से ही अमेरिका के गले का फंदा बना हुआ है। यूरेनियम उत्सर्जन यानी यूरेनियम इनरचमेंट को लेकर अमेरिका लगातार अलापता रहा है कि हमने उसे पूरे तरीके से तबाह कर दिया है। अब वह यूरेनियम इनरचमेंट करने की स्थिति में नहीं है। इसके बाद भी इस्लामाबाद में अमेरिका ने ईरान के यूरेनियम इनरचमेंट की टांग फंसा कर दुनिया के सामने एक नया सवाल खड़ा कर दिया कि क्या ईरान परमाणु हथियारों की दिशा में बढ़ रहा है ? क्या वह परमाणु हथियारों की दिशा में बढ़ सकता है ? क्या वह परमाणु हथियार बना सकता है ?

अमेरिकी उप राष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा कि हम जिन दो महत्वपूर्ण मुद्दों को लेकर अपनी शर्तों के साथ ईरान से सहमति चाहते थे ईरान ने उन पर अपनी सहमति देने से इंकार कर दिया। वेंस ने इस बात को माना कि हमने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को तबाह तो कर दिया है लेकिन हम चाहते हैं कि ईरान इस पर सहमति दे कि वह भविष्य में परमाणु हथियार विकसित नहीं करेगा क्योंकि परमाणु हथियार विकसित ना करने के लिए मजबूत और बुनियादी राजनीतिक इच्छा शक्ति की जरूरत है लेकिन ईरान ऐसी कोई प्रतिबध्दता नहीं दिखा रहा है। जेडी वेंस का प्रतिबध्दता से सीधा मतलब है कि ईरान यूरेनियम संवर्धन की स्थिति में खड़ा है और वह परमाणु हथियारों को बना सकता है। इसलिए हमें ईरान से साफ और ठोस प्रतिबध्दता चाहिए कि वह ना तो परमाणु हथियार बनाने की कोशिश करेगा, ना ही ऐसे साधन जुटायेगा जिससे वह शीघ्र परमाणु हथियार बना सके।

इस्लामाबाद की बैठक में ईरान ने अपनी तरफ से यूरेनियम इनरचमेंट के मुद्दे को शामिल ही नहीं किया। क्योंकि उसका साफ तौर पर कहना है कि परमाणु मुद्दा अमेरिका के लिए हो सकता है लेकिन हम जिन परिस्थितियों में बीते 50 बरसों से अटके हुए हैं आपको हमें उससे निकालने के लिए रास्ता बनाना है। जंग से हमें जो नुकसान हुआ है और हो रहा है उसके मुआवजे की व्यवस्था आपको करनी है। आपने हम पर जो प्रतिबंध लगाए हुए हैं उनको हटाइए। इस क्षेत्र में कोई युद्ध नहीं होगा आपको इसकी गारंटी लेनी है। हार्मुज रूट जो हमारी संप्रभुता के भीतर आता है उस पर हमारा ही नियंत्रण बरकरार रहेगा आपको इसका वचन देना है। जहां तक परमाणु मद्दे की बात है तो हम शुरू से कहते आ रहे हैं कि हम परमाणु हथियार नहीं बनायेंगे। यूरेनियम का उपयोग हम दुनिया के दूसरे हर देशों की तरह सिविलियन आस्पेक्ट में करेंगे।। हम खुद भी यूनाइटेड नेशंस के मेम्बरान हैं और उसके नियम कायदों के तहत चलते हैं। 

ईरान का कहना था कि जिस भावना के साथ सीजफायर के बीच हम आपके साथ बातचीत की टेबल पर बैठे हैं उसमें हमारे अस्तित्व, भविष्य का सवाल है। हम आपसे जिन मुद्दों पर सहमति चाहते हैं उसमें आने वाले वक्त में किसी भी तरीके का कोई भी युद्ध और उस युद्ध से जुड़ी हुई परिस्थितियां, उन परिस्थितियों से जुड़ी हुई हमारी अर्थव्यवस्था और उस अर्थव्यवस्था के दायरे में हार्मुज रूट और उसकी ताकत, संप्रभुता, स्वतंत्रता हमारे लिए बहुत मायने रखती है। लेकिन ईरान के मुद्दों पर सहमति देने में अमेरिका के सामने सबसे बड़ी मुस्किल इजराइल है। क्योंकि इजराइल के सामने ईरान खड़ा है। ईरान के इन मुद्दों पर अगर अमेरिका सहमति दे देता है तो इजराइल कहीं का नहीं रहेगा और एक झटके में ईरान क्षेत्रीय ताकत के तौर पर खड़ा हो जायेगा।

पाकिस्तान की मध्यस्थता में अमेरिका और ईरान के प्रतिनिधियों की मैराथन बैठक 12 अप्रैल की सुबह 4.35 बजे तक चली और 4.50 पर निर्णय लिया गया कि समझौता संभव नहीं है। 21 घंटे की मशक्कत बेनतीजा रही। दोनों की हथेलियां खाली रहीं। अमेरिकी राष्ट्रपति की ओर से जिन दो बड़े मुद्दों पर सहमति बनाने का निर्देश अपने प्रतिनिधि मंडल को दिया गया था उन मुद्दों पर सहमति देने से ईरान ने इंकार कर दिया। बातचीत के दौरान ईरान ने भी अपनी ओर से जिन महत्वपूर्ण पांच मुद्दों को उठाकर अमेरिका से भरोसा मांगा वह भरोसा अमेरिका ने दिया नहीं। बैठक खत्म होने के बाद कोई साझा बयान भी जारी नहीं किया गया यहां तक कि ऐसी कोई भी तस्वीर सामने नहीं आई जिसमें एक ओर अमेरिकी प्रतिनिधि मंडल और दूसरी ओर ईराकी प्रतिनिधि मंडल अपने-अपने नेताओं के नेतृत्व में आमने सामने बैठा हुआ हो। अमेरिका और ईरान दोनों के प्रतिनिधि मंडल में शामिल सभी सदस्य अपने-अपने देश के शीर्ष नेतृत्व की डोर से न केवल बंधे नजर आये बल्कि पल दर पल उनसे निर्देश लेते रहे यानी कोई भी किसी भी मुद्दे पर सहमति देने के लिए स्वतंत्र नहीं था। 

जिस वक्त रात के साये में इस्लामाबाद के भीतर अमेरिकी प्रतिनिधि मंडल ईराकी प्रतिनिधि मंडल से बात कर रहा था तब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अमेरिकी पत्रकारों के सवालों का जवाब देते हुए कह रहे थे कि समझौता हो या ना हो इससे हमें कोई फर्क नहीं पड़ता है। यानी अमेरिकी राष्ट्रपति को इस बात का आभास हो गया था कि बातचीत आखिरी मुहाने पर पहुंच कर भी बेनतीजा रहने वाली है। पाकिस्तान के मनुहार पर जेडी वेंस ने प्रेस कांफ्रेंस करने की सहमति दी और आनन फानन में प्रेस कांफ्रेंस का आयोजन किया गया। 5-7 मिनट के भीतर प्रेस कांफ्रेंस को निपटाकर इसे दुहराते हुए कि हम किसी समझौते पर नहीं पहुंचे लेकिन यह अमेरिका से ज्यादा ईरान के लिए खराब खबर है, बुरी खबर है। हम बिना किसी समझौते के वापस जा रहे हैं, उन्होंने हमारी शर्तों को स्वीकार नहीं किया। यह खबर हमसे ज्यादा ईरान के लिए बुरी है। इस मैसेज या कहें धमकी और चुनौती के साथ उप राष्ट्रपति जेडी वेंस ने अपने साथियों के साथ एयरफोर्स वन में बैठकर वाशिंग्टन के लिए उड़ान भरी तो दूसरी तरफ संयम और सादगी के साथ अपनी भावनाओं को समेटे हुए ईरान के प्रतिनिधि भी तेहरान की दिशा में बढ़ गए। 

इसके बाद तेहरान से लेकर वाशिंग्टन और इस्लामाबाद से लेकर बीजिंग तक यह सवाल बड़ा हो गया कि जो पहल हुई उस पहल के बाद अब क्या होगा ? क्योंकि जिस तरह से चीन ईरान की मदद कर रहा है और राष्ट्रपति ट्रंप चीन को भी धमकी देने में कोई कोताही नहीं बरत रहे हैं कि चीन को इसके बुरे नतीजे भुगतने होंगे। यह तब महत्वपूर्ण हो जाता है जब मई के पहले हफ्ते में ही शिखर सम्मेलन में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चाइनीज़ राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात होनी है। युद्ध की संभावना और आशंका के बीच अमेरिका और ईरान की बेनतीजा बातचीत ने एक नया इंडीकेशन भी दे दिया है कि अगर लेबनान और इजराइल के बीच बातचीत नहीं होती है तो इजराइल की भूमिका क्या होगी ? क्योंकि बेंजामिन नेतन्याहू ने खुले तौर पर संदेश दिया है कि युद्ध बीच में छोड़ा नहीं जाता है और रास्ता ना निकले तो रास्ता निकलने तक युद्ध लड़ा जाता है। यह मैसेज अपने आप काफी कुछ कहता है लेकिन सवाल तो तेहरान की ओर जाता हुआ दिख रहा है। हार्मुज रूट पर नियंत्रण इस वक्त रिवोल्यूशनरी गार्ड्स का है और उन्होंने अपने नियंत्रण को और बढ़ा लिया है। जिस बात का जिक्र अमेरिका कर रहा था कि वहां पर जो विस्फोट जमीन के नीचे यानी समुद्री तल पर हैं उसको हम हटा देंगे उस दिशा में वह (अमेरिका) कदम बढ़ा नहीं पाया है। 

दुनिया का सुपर पावर 40 दिनों तक युद्ध करने के बाद भी जब वह यह तय नहीं कर पाया कि अपनी पैदल सेना को ईरान के भीतर भेजे या ना भेजे तो उसने सीजफायर का ऐलान करते हुए बातचीत करने की पहल कर दी। सवाल यह है कि क्या 40 घंटे में कोई हल निकल सकता है ? अमेरिकी उप राष्ट्रपति जेडी वेंस और ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद गलिफाफ इस्लामाबाद की सेरेना होटल में आकर आमने सामने बैठे। उनके साथ स्टीव विटफ और अब्बास अगराची भी मौजूद थे और इन सबके बीच पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख असीम मुनीर की भी मौजूदगी रही। जैसे ही वार्ता शुरू हुई तो दो मैसेज निकलकर सामने आये। पहला अमेरिका को नैरेटिव चाहिए जिसके आसरे वह दुनिया को बता सके कि वह युद्ध जीत चुका है और बातचीत की मेज भी उसने पूरी दुनिया के अनुकूल कर ली है। दूसरा ईरान में केवल उसकी सेना ही नहीं लड़ रही है बल्कि अब पूरा देश ही सेना में तब्दील हो चुका है। सवाल उस आखिरी लड़ाई का है जिसमें जीत मिले या न मिले लेकिन हमला करने वाले को यह कहते हुए वापस जाना ही होगा कि हमने गलती कर दी है और उसकी भरपाई हमें करनी है। इसी बातचीत के दौर में अमेरिकी राष्ट्रपति ने इजराइल को भी लेबनान से बातचीत करने का सुझाव या कहें निर्देश दिया और 14 अप्रैल की तारीख भी तय हो गई लेकिन बेरूत की सड़कों पर लोगों का हुजूम निकलकर विरोध प्रदर्शन करने निकल पड़ा यह कहते हुए कि जिस इजराइल ने मिसाइलें दाग कर सैकड़ों लोगों को मौत के घाट उतार दिया, जिसे यूनाइटेड नेशंस ने भी मानवीय त्रासदी (HUMITERIAN CRISIS) कहा है तो फिर ऐसे देश के साथ बातचीत नहीं होनी चाहिए और लेबनान ने बातचीत करने से मना कर दिया। 

लेबनान का यह मैसेज तेहरान से इस्लामाबाद भी पहुंचा। समझौते के लिए झुकना नहीं है। सवाल अड़ने का नहीं अपने हक को मांगने का है। अपने हक को अपने साथ रखकर अपने भविष्य की रणनीति को तय करने का है। यानी अमेरिका का नैरेटिव और ईरान का भविष्य दोनों एक साथ आकर बातचीत की मेज पर खड़े हो गए। सवाल यह है कि खास तौर पर जिन पांच मुद्दों पर सीधा टकराव है उनको लेकर आगे भी बातचीत चलती रहे ऐसी व्यवस्था हो सकती है क्या ? लेकिन ऐसी व्यवस्था तभी लागू हो सकती है जब युद्ध विराम पूरे तरीके से लागू रहे यानी युद्ध भले ही खत्म न हो लेकिन युद्ध संघर्ष थम जाए। टाॅक टेबल पर बैठकर अमेरिका नैरेटिव खोज रहा है जबकि ईरान फैक्ट्स चाहता है। उस जमीन को चाहता है जिस पर खड़े होकर वह कह सके कि हमारे ऊपर प्रतिबंध क्यों लगाए गए ? लगाए गए प्रतिबंधों की भरपाई कौन करेगा ? हार्मुज रूट जब हमारे दायरे में है तो हम उसको अपने नियंत्रण में क्यों नहीं लें ? बातचीत की मेज कभी भी जीत हार तय नहीं करती। जब ट्रंप एक रात ईरान की सभ्यता खत्म करने का जिक्र करते हैं और उसके बाद इस्लामाबाद में बातचीत की मेज पर पहुंच कर भी यह कहते हैं कि समझौता हो या न हो हमें कोई फर्क नहीं पड़ता है तो फिर कैसे सफल हो सकती है बातचीत और कैसे हो सकता है समझौता। 

राष्ट्रपति ट्रंप ने समझौते के लिए जिन खिलाड़ियों को मैदान में उतारा है उसमें अनुभव की दृष्टि से अपरिपक्व उप राष्ट्रपति जेडी वेंस हैं। ट्रेड डील करने वाले स्टीव विटकाॅफ हैं। जेरई कुशनर हैं जो ट्रंप के दामाद और सीनियर एडवाइजर हैं जो ट्रंप के पारिवारिक बिजनेस को संभालते हैं तथा यसमैन के तौर पर सेना प्रमुख को हटाकर सेना की कमान संभालने वाले ब्रेड कूपर हैं। ये सभी केवल ट्रंप द्वारा निर्देशित शब्दों को कहने आये हैं। यानी जितनी चाबी भरी राम ने उतना चले खिलौना। ईरान की तरफ से संसद के अध्यक्ष मोहम्मद गलिफाफ, विदेश मंत्री अब्बास अद्राची, उप विदेश मंत्री मजीद तकखांची हैं जो कह रहे हैं कि वो अपनी बात नहीं अपने देश के लोगों की बात करने आए हैं। उनके देश के लोग जैसा चाहते हैं उस दिशा में आगे बढ़ने आए हैं। इस बातचीत की मेज से हम अपने देशवासियों के घावों पर लगाने वाला मलहम तलाशने आए हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि अगर इस युद्ध को लेकर अमेरिका के भीतर आवाम गुस्से में है तो इजराइल के भीतर भी लोगों में गुस्सा है क्योंकि इजराइल पर तो तीन तरफ से हमला हो रहा है जिसमें एक ओर यमन है, दूसरी तरफ लेबनान है और तीसरी तरफ ईरान है। लेकिन ईरान के भीतर की परिस्थिति इसके बिल्कुल उलट है वहां पर लोग अपनी जिंदगी, अपने देश, अपने अस्तित्व और अपने भविष्य को सवांरने और सम्हालने के लिए एकजुट होकर माला के मोती बन चुके हैं। शायद इसीलिए बातचीत के साथ साथ भीतर ही भीतर युद्ध की तैयारी भी कर रहे हैं। जब बातचीत ही नाउम्मीदी और एक दूसरे पर अविश्वसनीयता की जमीन पर टिकी हो तो फेस टू फेस भी कोई मायने रखता नहीं है।

अश्वनी बडगैया अधिवक्ता

स्वतंत्र पत्रकार

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