अशोक पाण्डेय व्यवस्था से टकराने वाला एक 'कलम का सिपाही', अधिकारी चमके, कविता लिखने में माहिर, हर समस्या का निदान, कानून के हैं विशेष जानकार
अशोक पाण्डेय व्यवस्था से टकराने वाला एक 'कलम का सिपाही', अधिकारी चमके, कविता लिखने में माहिर, हर समस्या का निदान, कानून के हैं विशेष जानकार
कटनी | कहते हैं कि कलम में वो ताकत होती है जो बड़े से बड़े सिंहासन को हिला सकती है। कुछ ऐसी ही मिसाल पेश कर रहे हैं पोड़ी कला बी में जन्मे और वर्तमान में मुरवारी के निवासी अशोक पाण्डेय, जन्म से ही कड़े संघर्ष और मेहनत के दम पर आगे बढ़ने वाले अशोक जी की लेखनी के आज आस-पास के क्षेत्रों में खूब चर्चे हैं। उनकी कलम की धार ऐसी है कि हर विषय पर उनका गहरा ज्ञान साफ झलकता है, और जब वे कविताएं लिखते हैं, तो सुनने और पढ़ने वाले मंत्रमुग्ध हो जाते हैं।
*बिगड़े काम को बनाने के माहिर लेखनी से चमके अधिकारी*
स्थानीय सूत्रों और चर्चाओं के अनुसार, अशोक पाण्डेय की शानदार ड्राफ्टिंग और लेखन शैली का लाभ उठाकर कई बड़े अधिकारियों ने अपने कार्यकाल के दौरान खूब वाहवाही लूटी। उनकी पैनी लेखनी ने कई प्रशासनिक कार्यों को चमका दिया । अशोक पाण्डेय हर विषय के ज्ञाता हैं और कविता लिखने में माहिर हैं। लेकिन जब उन्होंने इसी कलम का रुख व्यवस्था की कमियों और कुछ अधिकारियों के पीछे की सच्चाई उजागर करने में किया तो अधिकारियों ने पसीना छोड़ दिया । भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में अक्सर यह माना जाता है कि बदलाव लाने, फाइलों का पहिया घुमाने या जनता की समस्याओं का समाधान करने की शक्ति केवल लाल बत्ती वाली गाड़ी, सरकारी दफ्तर के ऊंचे ओहदों या प्रशासनिक कुर्सियों में ही निहित होती है।लेकिन समाज में कुछ ऐसे बिरले चरित्र भी होते हैं, जो बिना किसी सरकारी नौकरी या प्रशासनिक रुतबे के, केवल अपनी कलम, अदम्य साहस और कानून की गहरी समझ के बल पर पूरी व्यवस्था को हिलाने का माद्दा रखते हैं। ऐसे ही एक असाधारण व्यक्तित्व हैं अशोक पाण्डेय। अशोक पाण्डेय को जानने वाले उन्हें 'कलम का सिपाही' कहते हैं, तो आम जनता उन्हें अपनी समस्याओं का 'एकमात्र निदान' मानती है।सरकारी अमले में उनका खौफ ऐसा है कि बड़े-बड़े अधिकारी उनके तर्कों के सामने बगलें झांकने लगते हैं। बिना किसी सरकारी पद पर रहे, सरकारी व्यवस्था की नस-नस से वाकिफ होना और जटिल से जटिल कानूनी उलझनों को चुटकियों में सुलझा देना, अशोक पाण्डेय की पहचान बन चुका है।
*व्यवस्था से सीधा टकराव जब कलम बनी हथियार*
अशोक पाण्डेय का जीवन और उनकी कार्यशैली किसी फिल्मी नायक से कम नहीं है, लेकिन उनका संघर्ष पूरी तरह से धरातल पर आधारित है। आज के दौर में जहां लोग सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने से कतराते हैं और अफसरों के सामने आवाज उठाने से डरते हैं, वहीं अशोक पाण्डेय व्यवस्था की खामियों से सीधे टकरा जाते हैं।
*न्याय मांगना नहीं, न्याय को छीनना पड़ता है*
अगर कानून आपके पक्ष में हो, तो दुनिया की कोई भी प्रशासनिक ताकत आपको झुका नहीं सकती। यह अशोक पाण्डेय का मूलमंत्र है। जब भी किसी गरीब, शोषित या पीड़ित व्यक्ति की बात प्रशासनिक गलियारों में दबाई जाती है, तब अशोक पाण्डेय की कलम और उनकी आवाज मुखर हो उठती है। वे केवल शिकायतें दर्ज नहीं कराते, बल्कि वे उन शिकायतों को कानून के ऐसे अकाट्य तर्कों के साथ पिरोते हैं कि सामने बैठा अधिकारी चाहकर भी उसे नजरअंदाज नहीं कर पाता।उनकी इस व्यवस्था-विरोधी और जन-हितैषी छवि के कारण उन्हें एक ऐसे योद्धा के रूप में देखा जाता है, जिसने खुद को व्यवस्था का गुलाम बनाने के बजाय, व्यवस्था को जनता के प्रति जवाबदेह बनाने का बीड़ा उठाया है।
*सरकारी नौकरी में न होकर भी 'अफसरों से ज्यादा समझ*
अशोक पाण्डेय की सबसे बड़ी खासियत यह है कि उन्होंने कभी किसी सरकारी पद का लालच नहीं किया, लेकिन उनकी प्रशासनिक और कानूनी समझ किसी भी आईएएस (IAS) या पीसीएस (PCS) अधिकारी से कम नहीं, बल्कि कई मायनों में उनसे कहीं अधिक व्यावहारिक है।
*नियमों की उंगलियों पर गिनती सरकारी नियमावली*
जनहित गारंटी अधिनियम, आरटीआई (RTI) एक्ट, और भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं पर उनकी पकड़ इतनी मजबूत है कि वे अफसरों को उन्हीं की भाषा में मात देते हैं। फाइलों की चाल को समझना वे जानते हैं कि कौन सी फाइल किस टेबल पर क्यों रुकी है और उसे आगे बढ़ाने के लिए किस कानूनी चाबी की जरूरत है। अक्सर देखा जाता है कि बड़ी-बड़ी कुर्सियों पर बैठे अधिकारी जब अशोक पाण्डेय के सामने बैठते हैं, तो उनकी प्रशासनिक धमक और 'चमक' फीकी पड़ जाती है। पाण्डेय जी के अकाट्य तथ्यों और कानूनी धाराओं के सामने अफसरों को अपने फैसले बदलने पड़ते हैं।प्रशासनिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि यदि किसी मामले में अशोक पाण्डेय ने हस्तक्षेप कर दिया है, तो उसका समाधान होना तय है, क्योंकि वे हवा में बातें नहीं करते, बल्कि दस्तावेजी सबूतों और कानूनी प्रावधानों के साथ मैदान में उतरते हैं।
*हर समस्या का अचूक निदान आम जनता के 'मसीहा*
अशोक पाण्डेय के पास आने वाले मामलों की फेहरिस्त बहुत लंबी है। जमीन का विवाद हो, पेंशन रुकी हो, पुलिसिया प्रताड़ना का मामला हो या फिर किसी सरकारी योजना में भ्रष्टाचार अशोक पाण्डेय हर मर्ज की दवा जानते हैं।
*कानून के विशेष जानकार 'बिना डिग्री के सबसे बड़े विधि विशेषज्ञ'*
अशोक पाण्डेय ने भले ही पारंपरिक रूप से वकालत को अपना पेशा न बनाया हो, लेकिन कानून की उनकी समझ किसी वरिष्ठतम अधिवक्ता से कम नहीं है। देश के संविधान से लेकर स्थानीय निकाय के उप-नियमों तक का उन्हें गहरा ज्ञान है। वे मानते हैं कि कानून आम जनता की सुरक्षा के लिए है, न कि उन्हें डराने के लिए।जब कोई अधिकारी कानून का हवाला देकर किसी गरीब को डराने की कोशिश करता है, तो अशोक पाण्डेय वहां ढाल बनकर खड़े हो जाते हैं। वे उस अधिकारी को कानून की वही धाराएं पढ़ाते हैं, जो जनता के अधिकारों की रक्षा करती हैं।उनकी इसी खूबी के कारण बड़े-बड़े विधि विशेषज्ञ भी कई बार जटिल कानूनी मामलों में अशोक पाण्डेय से अनौपचारिक रूप से सलाह लेने आते हैं।
*कविता लिखने में माहिर 'हृदय से कवि, कर्म से क्रांतिकारी'*
अशोक पाण्डेय केवल एक कठोर, तार्किक और व्यवस्था से लड़ने वाले व्यक्ति ही नहीं हैं,उनके भीतर एक बेहद संवेदनशील और भावुक हृदय भी धड़कता है। वे कविता लिखने में बेहद माहिर हैं। उनकी कविताएं केवल मनोरंजन का साधन नहीं हैं, बल्कि वे समाज की विसंगतियों, गरीबों के दर्द और व्यवस्था की क्रूरता पर तीखा प्रहार करती हैं। जब वे अपनी कलम उठाते हैं, तो कभी वे व्यवस्था के खिलाफ अंगारे उगलते हैं, तो कभी समाज के हाशिए पर खड़े व्यक्ति के आंसू पोंछते नजर आते हैं। उनकी कविताओं में कबीर जैसी बेबाकी और निराला जैसी विद्रोही चेतना साफ दिखाई देती है।
"फाइलों के जंगलों में हक मेरा खोया खड़ा,
चंद अफसरों की मेज पर इंसाफ रोया खड़ा।
पर उठा ली है कलम तो अब न पीछे हटेंगे,
जब तलक सूरज न निकले, हम अंधेरों से लड़ेंगे।
उनकी ये पंक्तियां उनके जीवन के उद्देश्य को साफ बयां करती हैं। अपनी कविताओं के माध्यम से वे जन-चेतना को जगाने का काम करते हैं। अक्सर आंदोलनों और सार्वजनिक मंचों पर जब वे अपनी कविताओं का पाठ करते हैं, तो युवाओं और पीड़ितों में एक नई ऊर्जा का संचार हो जाता है।

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