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सड़क हादसे में पैर गंवाने वाले पीड़ित को मिला न्याय, कोर्ट ने सुनाया ₹62.66 लाख के मुआवजे का फैसला बीमा कंपनी की 'दलीलें' खारिज, अधिवक्ता प्रशांत मिश्रा और बालकिशन चौधरी ने की दमदार पैरवी

 सड़क हादसे में पैर गंवाने वाले पीड़ित को मिला न्याय, कोर्ट ने सुनाया ₹62.66 लाख के मुआवजे का फैसला बीमा कंपनी की 'दलीलें' खारिज, अधिवक्ता प्रशांत मिश्रा और बालकिशन चौधरी ने की दमदार पैरवी



जबलपुर । मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (तीसवां अपर न्यायाधीश बृजेश सिंह, जिला जबलपुर) की अदालत ने एक बड़ा फैसला सुनाते हुए सड़क हादसे में अपना पैर गंवाने वाले ट्रक चालक अनिल मेहरा के पक्ष में 62 लाख 66 हजार 683 रुपये का मुआवजा (अवार्ड) पारित किया है। पीड़ित की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता प्रशांत मिश्रा और बालकिशन चौधरी की दलीलों और दस्तावेजी सबूतों के आगे बीमा कंपनी की चालबाजी नहीं टिक सकी।

*लापरवाही से ओवरटेक करने के कारण हुआ था हादसा*

प्रकरण की जानकारी देते हुए अधिवक्ता प्रशांत मिश्रा और बालकिशन चौधरी ने बताया कि घटना 21 जुलाई 2022 की रात करीब 8:00 बजे की है। कटनी जिले के ग्राम पचपेढ़ी निवासी अनिल मेहरा अपने ट्रक (क्रमांक MH 09 Q-1645) को जबलपुर से दुर्ग (छत्तीसगढ़) लेकर जा रहे थे।

जब वह मंडला जिले के गाजीपुर बायपास पर भारत पेट्रोल पंप के पास पहुंचे, तभी पीछे से आ रहे एक अन्य ट्राला (क्रमांक CG 09 Z-3244) के चालक ने तेजी और लापरवाही से वाहन चलाते हुए उन्हें ओवरटेक किया। ट्राला चालक ने अचानक अनिल के ट्रक के सामने अपनी गाड़ी खड़ी कर दी। अनिल ने फौरन ब्रेक लगाया, लेकिन ट्रक की रफ्तार के कारण वह तुरंत नहीं रुक सका और ट्राले से जा टकराया।

*काटना पड़ा दाहिना पैर, बायां भी हुआ चकनाचूर*

इस भयानक टक्कर में अनिल का शरीर बुरी तरह पिचक गया था। उन्हें तुरंत 108 एंबुलेंस से जिला अस्पताल मंडला ले जाया गया, जहां प्राथमिक उपचार और पुलिस की लिखापढ़ी के बाद गंभीर हालत को देखते हुए जबलपुर रेफर कर दिया गया।

जबलपुर के जामदार अस्पताल में इलाज के दौरान डॉक्टरों को अनिल का दाहिना पैर जांघ के नीचे से काटना पड़ा। वहीं उनका बायां पैर भी पूरी तरह चकनाचूर हो गया, जिससे वह काम करने लायक नहीं रहा। इसके बाद आगाचौक स्थित लाइफ मेडिसिटी अस्पताल में भी उनका लंबा उपचार चला। इस हादसे ने अनिल को हमेशा के लिए स्थायी रूप से विकलांग बना दिया।

*नहीं चली बीमा कंपनी की चालबाजी*

मामले को टालने के लिए बीमा कंपनी ने कोर्ट में तर्क दिया कि आवेदक के खुद के वाहन का ब्रेक फेल हुआ था और 4 दिन की देरी से एफआईआर (FIR) दर्ज कराई गई थी। कंपनी का दावा था कि पीड़ित को झूठे तरीके से फंसाकर मुआवजा लेने के उद्देश्य से गाड़ी को इस केस में शामिल किया गया है, इसलिए बीमा कंपनी का कोई उत्तरदायित्व नहीं बनता। पीड़ित के वकीलों ने बीमा कंपनी के इन दावों के खिलाफ कोर्ट के समक्ष ठोस दस्तावेजी प्रमाण प्रस्तुत किए। न्यायालय ने इन सबूतों से सहमत होते हुए बीमा कंपनी की दलीलों को खारिज कर दिया और पीड़ित अनिल मेहरा के पक्ष में ₹62,66,683/- का ऐतिहासिक अवार्ड पारित कर उन्हें न्याय दिलाया।

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