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विवेचना व्यवस्था, न्याय की रीढ़ या भ्रष्ट तंत्र का हथियार

 विवेचना व्यवस्था, न्याय की रीढ़ या भ्रष्ट तंत्र का हथियार



कटनी  |  किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र की न्याय व्यवस्था केवल अदालतों की चारदीवारी तक सीमित नहीं होती, बल्कि उसकी वास्तविक ताकत उस विवेचना व्यवस्था में छिपी होती है जो अपराध के पीछे का सच सामने लाने का काम करती है।अदालत वही निर्णय देती है जो तथ्य और सबूत उसके सामने प्रस्तुत किए जाते हैं। यदि विवेचना निष्पक्ष, ईमानदार और सत्य आधारित हो तो न्याय व्यवस्था मजबूत होती है, लेकिन यदि जांच भ्रष्टाचार, दबाव और चापलूसी की भेंट चढ़ जाए तो न्याय केवल कागजों तक सीमित रह जाता है। आज देश में आम जनता के बीच यह धारणा तेजी से मजबूत हुई है कि कई मामलों में विवेचना सत्य की खोज के लिए नहीं, बल्कि प्रभावशाली लोगों को बचाने और कमजोर वर्ग को दबाने के लिए की जाती है। पैसों के बल पर जांच की दिशा बदल देना, राजनीतिक दबाव में केस कमजोर करना, सबूत गायब करना और अपराधियों को बचाने के लिए कागजों में कहानी बदल देना यह सब न्याय व्यवस्था पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा करता है। जब विवेचक सत्ता के सामने झुकने लगे और सत्य की जगह जी-हजूरी को प्राथमिकता देने लगे, तब न्याय की आत्मा घायल होने लगती है।

सबसे चिंताजनक स्थिति तब पैदा होती है जब निर्दोष लोग वर्षों तक अदालतों के चक्कर काटते रहते हैं और असली अपराधी रसूख व पैसे के दम पर बच निकलते हैं। इससे समाज में यह संदेश जाता है कि इस देश में न्याय नहीं, बल्कि पहुंच और पैसा चलता है।परिणामस्वरूप आम आदमी के मन से कानून का भय और न्यायपालिका पर विश्वास दोनों कमजोर होने लगते हैं। यही कारण है कि भ्रष्टाचार बढ़ता है, अपराधियों के हौसले बुलंद होते हैं और व्यवस्था के प्रति सम्मान धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है।यह समझना होगा कि अदालतें तभी सही न्याय दे सकती हैं जब उनके सामने सच्चाई रखी जाए।यदि विवेचना ही झूठ, दबाव और भ्रष्टाचार की नींव पर खड़ी हो, तो न्याय तक पहुंचना कठिन हो जाता है। इसलिए देश को केवल कानून बदलने की नहीं, बल्कि विवेचना व्यवस्था की मानसिकता बदलने की जरूरत है। विवेचक का धर्म किसी नेता, अधिकारी या उद्योगपति की सेवा करना नहीं, बल्कि केवल सत्य और संविधान के प्रति निष्ठावान रहना होना चाहिए।आज आवश्यकता ऐसे विवेचकों की है जो सत्ता नहीं, सत्य के सामने झुकें; जो पैसों के लिए नहीं, न्याय के लिए काम करें; जो चापलूसी नहीं, बल्कि संविधान की गरिमा बचाने का साहस रखें। क्योंकि विवेचक की कलम केवल एक रिपोर्ट नहीं लिखती, बल्कि किसी निर्दोष का भविष्य और किसी अपराधी की सजा तय करती है। यदि वही कलम बिक जाए, डर जाए या दबाव में झुक जाए, तो न्याय व्यवस्था का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाता है। भारत को यदि वास्तव में न्यायपूर्ण और मजबूत राष्ट्र बनाना है तो विवेचना व्यवस्था को राजनीतिक हस्तक्षेप, भ्रष्टाचार और चमचागिरी की संस्कृति से मुक्त करना होगा। क्योंकि न्याय व्यवस्था की असली ताकत कानून की किताबों में नहीं, बल्कि उस ईमानदार विवेचना में छिपी होती है जो बिना डर, बिना दबाव और बिना बिके सत्य को सामने लाने का साहस रखती है।

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