रोटी की मजबूरी और बिकती इंसानियत मजदूरों की पीड़ा पर समाज की खामोशी, रोटी के लिए इस दुनिया में मजदूरों के तन बिक जाते हैं, मजदूरों के तन का जिक्र ही क्या, मुर्दों के कफ़न बिक जाते हैं
रोटी की मजबूरी और बिकती इंसानियत मजदूरों की पीड़ा पर समाज की खामोशी, रोटी के लिए इस दुनिया में मजदूरों के तन बिक जाते हैं, मजदूरों के तन का जिक्र ही क्या, मुर्दों के कफ़न बिक जाते हैं
कटनी | आज भी दुनिया के कई हिस्सों में मजदूर वर्ग अपनी मेहनत, पसीने और कभी - कभी अपनी गरिमा तक को बेचने के लिए मजबूर है। पेट की आग इतनी बड़ी होती है कि वह इंसान को हर तरह की कठिनाई और अपमान सहने पर मजबूर कर देती है। भारत जैसे विकासशील देश में मजदूरों का जीवन संघर्षों से भरा हुआ है।शहरों की चमक-दमक, ऊंची इमारतें, सड़कें, पुल और कारखाने जिन हाथों की मेहनत से खड़े होते हैं, वही हाथ अक्सर दो वक्त की रोटी के लिए तरसते नजर आते हैं। विडंबना यह है कि जो लोग देश के विकास की नींव रखते हैं, वही लोग सबसे अधिक असुरक्षित और उपेक्षित जीवन जीते हैं।मजदूरों की सबसे बड़ी समस्या अस्थिर रोजगार और कम मजदूरी है। दिहाड़ी मजदूर सुबह काम की तलाश में घर से निकलते हैं, लेकिन यह तय नहीं होता कि शाम को उनके हाथ में मजदूरी आएगी या नहीं। कई बार उन्हें पूरे दिन की मेहनत के बाद भी उचित भुगतान नहीं मिलता। ठेकेदारी व्यवस्था और श्रम कानूनों की कमजोर निगरानी के कारण मजदूरों का शोषण लगातार जारी है। गरीबी और मजबूरी का यह आलम केवल मजदूरों तक सीमित नहीं है। समाज में ऐसी घटनाएं भी सामने आती हैं, जहां लोगों की मजबूरी का फायदा उठाकर इंसानियत तक का सौदा कर लिया जाता है। यही कारण है कि कहा जाता है कि यहां “मुर्दों के कफ़न तक बिक जाते हैं। यह केवल एक प्रतीकात्मक कथन नहीं, बल्कि यह दर्शाता है कि लालच और असंवेदनशीलता किस हद तक बढ़ चुकी है।कोविड-19 महामारी के समय यह सच्चाई और भी स्पष्ट होकर सामने आई थी। लाखों मजदूर शहरों से अपने गांवों की ओर पैदल लौटते नजर आए। भूख, प्यास और अनिश्चित भविष्य के बीच उन्होंने सैकड़ों किलोमीटर का सफर तय किया। उस समय देश ने देखा कि विकास की चमक के पीछे कितनी बड़ी आबादी संघर्ष कर रही है।सरकारें समय-समय पर मजदूरों के लिए योजनाएं और कानून बनाती हैं। मनरेगा जैसी योजनाओं ने ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार का कुछ सहारा दिया है, लेकिन अभी भी मजदूरों के जीवन में स्थायी बदलाव लाने के लिए बहुत कुछ किया जाना बाकी है। श्रमिकों के लिए बेहतर वेतन, सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं और सम्मानजनक कार्य परिस्थितियां सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है।इसके साथ ही समाज की संवेदनशीलता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। जब तक हम मजदूरों को केवल श्रम का साधन मानते रहेंगे और उन्हें बराबरी का सम्मान नहीं देंगे, तब तक उनकी स्थिति में वास्तविक सुधार संभव नहीं है। मजदूर केवल आर्थिक व्यवस्था का हिस्सा नहीं, बल्कि समाज की रीढ़ होते हैं। आज जरूरत है कि मजदूरों की समस्याओं को केवल सहानुभूति से नहीं, बल्कि ठोस नीतियों और संवेदनशील सोच के साथ देखा जाए। जब मजदूर का पसीना सम्मान और सुरक्षा के साथ जुड़ जाएगा, तभी समाज में वास्तविक विकास और न्याय की स्थापना हो सकेगी।

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