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एक ही बंदर काफी है बाग को उजाड़ने के लिए उस देश का क्या होगा जहां हर राजनीतिक पद पर बंदर बैठे हों

 एक ही बंदर काफी है बाग को उजाड़ने के लिए उस देश का क्या होगा जहां हर राजनीतिक पद पर बंदर बैठे हों

कटनी  |   एक ही बंदर पूरे बाग को उजाड़ने के लिए काफी होता है। वह अपनी शरारत, लालच और अविवेक से पेड़ों को नुकसान पहुंचा देता है, फलों को तोड़ देता है और पूरे वातावरण को अस्त-व्यस्त कर देता है। लेकिन जरा कल्पना कीजिए उस स्थिति की, जब बाग की रखवाली करने के लिए ही बंदरों को बैठा दिया जाए।जब बाग का माली ही अपनी जिम्मेदारी भूलकर उसे उजाड़ने में लग जाए, तब उस बाग का भविष्य क्या होगा? आज की राजनीति को देखकर यह प्रश्न बार-बार मन में उठता है कि देश की बागडोर जिन लोगों के हाथों में है, क्या वे सच में देश को संवारने आए हैं या उसे अपने स्वार्थों के लिए इस्तेमाल करने आए हैं? जब नेतृत्व में समझदारी, ईमानदारी और दूरदर्शिता की कमी हो जाती है, तब राष्ट्र की स्थिति भी उसी बाग की तरह हो जाती है जिसे बंदरों की टोली ने घेर लिया हो।राजनीति का मूल उद्देश्य समाज की सेवा करना होता है। लोकतंत्र में जनता अपने प्रतिनिधियों को इस उम्मीद से चुनती है कि वे उनकी समस्याओं का समाधान करेंगे, देश को विकास की राह पर आगे बढ़ाएंगे और न्यायपूर्ण व्यवस्था स्थापित करेंगे। लेकिन जब राजनीति सेवा की जगह सत्ता, स्वार्थ और धन कमाने का माध्यम बन जाती है, तब वही प्रतिनिधि जनता के लिए बोझ बन जाते हैं। कभी-कभी किसी संस्था या व्यवस्था में एक-दो भ्रष्ट या अयोग्य लोग भी आ जाते हैं। यह एक सामान्य मानवीय कमजोरी है। लेकिन जब पूरी व्यवस्था ही अयोग्यता, लालच और अवसरवादिता से भर जाए, तब स्थिति भयावह हो जाती है। यह ठीक उसी तरह है जैसे बाग में एक बंदर आ जाए तो नुकसान सीमित होता है, लेकिन अगर हर पेड़ पर बंदर बैठ जाएं तो बाग का बचना लगभग असंभव हो जाता है। आज राजनीति में एक बड़ी समस्या यह है कि योग्यता और नैतिकता से ज्यादा महत्व जाति, धन और प्रभाव को मिलने लगा है। चुनाव जीतने के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं, जातीय समीकरण बनाए जाते हैं, झूठे वादे किए जाते हैं और जनता को भावनाओं के नाम पर भड़काया जाता है। परिणाम यह होता है कि चुनाव जीतने के बाद नेता का पहला लक्ष्य जनता की सेवा नहीं बल्कि चुनाव में लगाया गया पैसा निकालना और सत्ता का लाभ उठाना बन जाता है। इस स्थिति का सबसे बड़ा नुकसान आम नागरिक को होता है। जब नेतृत्व कमजोर और स्वार्थी हो जाता है, तब शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सुरक्षा और विकास जैसे मूल मुद्दे पीछे छूट जाते हैं। योजनाएं बनती तो हैं, लेकिन उनका लाभ जमीन तक नहीं पहुंचता। कागजों में सड़कें बन जाती हैं, पुल तैयार हो जाते हैं, जलाशयों की मरम्मत दिखा दी जाती है, लेकिन हकीकत में जनता को कुछ नहीं मिलता । इतिहास गवाह है कि किसी भी देश की तरक्की उसके नेतृत्व की गुणवत्ता पर निर्भर करती है। जापान, सिंगापुर और दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने मजबूत और ईमानदार नेतृत्व के कारण कम समय में जबरदस्त विकास किया। वहीं कई ऐसे देश भी हैं जहां भ्रष्ट और अक्षम नेतृत्व के कारण प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर होने के बावजूद गरीबी और अराजकता का माहौल बना हुआ है। जब राजनीतिक पदों पर बैठे लोग अपनी जिम्मेदारी को समझने के बजाय केवल व्यक्तिगत लाभ और सत्ता के खेल में उलझ जाते हैं, तब लोकतंत्र कमजोर होने लगता है। लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है, बल्कि यह जिम्मेदारी, जवाबदेही और नैतिकता का भी नाम है। अगर इन मूल्यों को भुला दिया जाए, तो लोकतंत्र भी धीरे-धीरे केवल एक दिखावा बनकर रह जाता है। समस्या का एक और पहलू यह है कि आज समाज में भी राजनीति को लेकर एक तरह की निराशा और उदासीनता फैल रही है। कई लोग यह मानने लगे हैं कि राजनीति में ईमानदार लोगों के लिए जगह नहीं है। यह सोच भी खतरनाक है, क्योंकि अगर अच्छे लोग राजनीति से दूर हो जाएंगे तो मैदान केवल स्वार्थी और अवसरवादी लोगों के लिए ही खुला रह जाएगा।इसलिए केवल नेताओं को दोष देना भी पूरी तरह सही नहीं है। लोकतंत्र में जनता ही असली मालिक होती है। अगर जनता जागरूक और जिम्मेदार होगी, तो गलत लोगों को सत्ता में आने से रोका जा सकता है। लेकिन अगर जनता जाति, धर्म, पैसे या भावनात्मक नारों के आधार पर वोट देगी, तो फिर व्यवस्था में बदलाव की उम्मीद करना मुश्किल होगा। आज जरूरत इस बात की है कि राजनीति को फिर से सेवा और नैतिकता के मार्ग पर लाया जाए। इसके लिए शिक्षा, जागरूकता और सामाजिक जिम्मेदारी बेहद जरूरी है। युवाओं को भी राजनीति से दूरी बनाने के बजाय उसमें सकारात्मक भागीदारी करनी चाहिए। जब नई पीढ़ी ईमानदारी और विचारशीलता के साथ नेतृत्व में आएगी, तब व्यवस्था में बदलाव संभव होगा । देश केवल सरकारों से नहीं बनता, बल्कि जनता, संस्थाओं और नेतृत्व के सामूहिक प्रयास से बनता है। अगर हम चाहते हैं कि हमारा देश मजबूत, समृद्ध और न्यायपूर्ण बने, तो हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि बाग की रखवाली ऐसे लोगों के हाथों में हो जो उसे संवारने का इरादा रखते हों, न कि उजाड़ने का।अंत में यही कहा जा सकता है कि एक बंदर बाग को उजाड़ सकता है, लेकिन अगर हर राजनीतिक पद पर बंदर बैठ जाए तो पूरा बाग ही खतरे में पड़ जाता है। इसलिए समय की मांग है कि हम अपने लोकतंत्र को मजबूत करें, सही लोगों को चुनें और गलत लोगों को सत्ता से दूर रखें। क्योंकि अगर बाग को बचाना है, तो माली को समझदार, जिम्मेदार और ईमानदार होना ही पड़ेगा। तभी देश का भविष्य सुरक्षित रह सकता हैं।

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