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जब पुलिस ही टूटने लगे थानों में बढ़ती थकान और व्यवस्था पर गंभीर सवाल, यदि पुलिसकर्मी का मन टूट गया, तो थाना भवन तो खड़ा रहेगा, लेकिन अपराधियों के मन से कानून का भय समाप्त हो सकता है

 जब पुलिस ही टूटने लगे थानों में बढ़ती थकान और व्यवस्था पर गंभीर सवाल, यदि पुलिसकर्मी का मन टूट गया, तो थाना भवन तो खड़ा रहेगा, लेकिन अपराधियों के मन से कानून का भय समाप्त हो सकता है



कटनी  |  देश की कानून व्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले पुलिस विभाग के भीतर इन दिनों एक गहरी और चिंताजनक हलचल देखी जा रही है। यह हलचल किसी आंदोलन या हड़ताल के रूप में नहीं, बल्कि एक शांत और अंदरूनी बदलाव के रूप में सामने आ रही है। कई पुलिसकर्मी अपनी नौकरी छोड़ने का मन बना रहे हैं, कुछ ने नौकरी छोड़ दी है और कई ऐसे हैं जो भीतर ही भीतर मानसिक दबाव और निराशा से जूझ रहे हैं। सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि जो पुलिसकर्मी कभी अपने बच्चों को भी वर्दी में देखना चाहते थे, आज वही अपने परिवार के सदस्यों को पुलिस सेवा में जाने से रोकने लगे हैं। यह स्थिति केवल व्यक्तिगत थकान का परिणाम नहीं है, बल्कि पुलिस व्यवस्था में आए कई बदलावों का नतीजा है। आज देशभर के थानों में पुलिसकर्मियों का बड़ा हिस्सा अपराध नियंत्रण या जनता की सुरक्षा से ज्यादा कागजी और डिजिटल प्रक्रियाओं में उलझा हुआ दिखाई देता है। थानों में अब पुलिस की पारंपरिक भूमिका के साथ-साथ फॉर्म भरने, रिपोर्ट तैयार करने, डेटा अपलोड करने और विभिन्न डिजिटल प्लेटफॉर्म पर जानकारी दर्ज करने का भारी दबाव है। फोटो भेजो, प्रमाण दो, रिपोर्ट अपलोड करो जैसी व्यवस्थाएं अब पुलिसकर्मियों की दिनचर्या का हिस्सा बन गई हैं।परिणामस्वरूप जहां पहले पुलिसकर्मी बीट पर अधिक समय बिताते थे, अब उनका बड़ा समय कंप्यूटर स्क्रीन के सामने गुजरने लगा है। तकनीक का उपयोग निश्चित रूप से समय की आवश्यकता है, लेकिन जब तकनीक आवश्यकता से अधिक बोझ बन जाए तो वह व्यवस्था को मजबूत करने के बजाय कमजोर करने लगती है। पुलिस व्यवस्था में भी कुछ ऐसा ही होता दिखाई दे रहा है। हर काम को डिजिटल बनाने की होड़ में यह भूलने की कोशिश हो रही है कि पुलिस का काम केवल डेटा और रिपोर्ट नहीं बल्कि सामाजिक परिस्थितियों, स्थानीय समस्याओं और मानवीय व्यवहार को समझकर काम करना भी है। एक और बड़ा बदलाव पुलिस की भूमिका में देखने को मिल रहा है।पुलिसकर्मी अब केवल कानून व्यवस्था संभालने वाले अधिकारी नहीं रह गए हैं, बल्कि कई बार उन्हें “इवेंट मैनेजर” की तरह भी काम करना पड़ता है।योग दिवस, पर्यावरण दिवस, मातृभाषा दिवस, साइबर जागरूकता अभियान, आत्मरक्षा प्रशिक्षण, सड़क सुरक्षा कार्यक्रम जैसे अनेक आयोजनों में पुलिस की सक्रिय भागीदारी अनिवार्य कर दी गई है। निस्संदेह समाज में जागरूकता फैलाना महत्वपूर्ण है, लेकिन जब इन कार्यक्रमों की संख्या इतनी बढ़ जाए कि पुलिस का मूल कार्य ही पीछे छूटने लगे, तब व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है। कई बार सफलता का पैमाना अपराध नियंत्रण नहीं बल्कि आयोजित कार्यक्रमों की संख्या बन जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों के थानों की स्थिति तो और भी कठिन है। सीमित स्टाफ और संसाधनों के बावजूद पुलिसकर्मियों को न केवल अपराध नियंत्रण करना होता है बल्कि अनेक सामाजिक अभियानों, बैठकों, रिपोर्टिंग और कार्यक्रमों की जिम्मेदारी भी निभानी पड़ती है। विद्यालयों में प्रशिक्षण देना, साइबर जागरूकता अभियान चलाना, विभिन्न समितियों की बैठकें आयोजित करना, सरकारी योजनाओं की निगरानी करना ये सभी कार्य भी पुलिसकर्मियों के जिम्मे आ गए हैं। इस बढ़ते कार्यभार का सबसे गंभीर प्रभाव पुलिसकर्मियों के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। लगातार निगरानी, हर काम का प्रमाण देने की बाध्यता और उच्चाधिकारियों की अपेक्षाओं का दबाव कई पुलिसकर्मियों के आत्मविश्वास को कमजोर कर रहा है। परिवार के लिए समय न मिलना, सामाजिक जीवन से दूरी और लगातार तनाव की स्थिति ने पुलिसकर्मियों को भावनात्मक रूप से भी थका दिया है। इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या पुलिस अपने मूल उद्देश्य से दूर होती जा रही है पुलिस का प्राथमिक दायित्व अपराध नियंत्रण, कानून व्यवस्था बनाए रखना और अपराधियों में भय पैदा करना है। लेकिन जब पुलिस का बड़ा समय आंकड़ों, रिपोर्टों और कार्यक्रमों में बीतने लगे तो यह चिंता स्वाभाविक है कि कहीं व्यवस्था का मूल लक्ष्य पीछे तो नहीं छूट रहा। आज कई लोग यह महसूस करने लगे हैं कि थाने अपराध नियंत्रण के केंद्र के बजाय कई बार केवल औपचारिक प्रक्रियाओं के केंद्र बनकर रह गए हैं। यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो समाज में असुरक्षा की भावना बढ़ सकती है। समय की मांग है कि पुलिस व्यवस्था को नए सिरे से संतुलित किया जाए। तकनीक का उपयोग हो, लेकिन वह पुलिसकर्मियों पर बोझ न बने। सामाजिक कार्यक्रम भी हों, लेकिन वे पुलिस के मूल कार्यों को प्रभावित न करें। उच्चाधिकारियों और नीति निर्माताओं को यह समझना होगा कि पुलिस केवल एक विभाग नहीं बल्कि समाज की सुरक्षा का आधार है। यदि पुलिसकर्मी मानसिक रूप से थक जाएंगे और व्यवस्था से उनका विश्वास उठ जाएगा तो इसका प्रभाव पूरी कानून व्यवस्था पर पड़ेगा। आज जरूरत है कि पुलिस थानों को फिर से अपराध नियंत्रण के प्रभावी केंद्र बनाया जाए, पुलिसकर्मियों के कार्यभार को संतुलित किया जाए और उनके मानसिक स्वास्थ्य तथा सम्मान को प्राथमिकता दी जाए।

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