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खरी अखरी सवाल उठाते हैं पालकी नहीं स्वाभिमान सदैव तानाशाही से लड़ा है जब भी मरा है गर्व से मरा है

 खरी अखरी सवाल उठाते हैं पालकी नहीं

स्वाभिमान सदैव तानाशाही से लड़ा है जब भी मरा है गर्व से मरा है



क्या युद्ध की डोर ईरान के हाथ में है ? क्योंकि पूरी दुनिया की इकाॅनामी पर असर होमर्ज रूट से पड़ रहा है और होमर्ज रूट पर कब्जा ईरान का है। मिडिल ईस्ट के भीतर अमेरिकी बेस, जो सैकड़ा भर से ज्यादा हैं उनमें से अधिकतर बेस, को ईरान ने ध्वस्त कर दिया है। वेस्ट एशिया के भीतर काम कर रहे अमेरिकी कंसुलेट और एंबेस पूरी तरह से डिस्टर्ब हैं। अमेरिका अपने लोगों को सुरक्षित निकालने के अलावा ऐसा कोई भी कदम उठाने की स्थिति में नहीं आ पा रहा है जिससे लगे कि वह ईरान के भीतर रिजम चेंज करने की दिशा में कदम उठा रहा है। क्या युद्ध को लेकर वाकई ऐसी परिस्थिति आ गई है जहां ईरान के भीतर से आर्डर बहुत साफ है - इस युद्ध का मकसद ईरान, इस्लाम, खामनेई की विचारधारा, इस्लामिक देशों को साथ खड़ा करने की सोच, वेस्ट एशिया में इजराइल मौजूदगी यानी मौजूदगी के खिलाफ और अपने साथ खड़े देशों को एक स्वायत्त परिस्थिति देने की सोच। ईरान ने अगर युद्ध को अंजाम तक पहुंचाने के लिए अपने देश को तैयार कर लिया है तो मैसेज ना केवल अमेरिका और इजराइल के लिए है बल्कि पूरी दुनिया के लिए है कि ईरान में हर कोई अपनी जान की बाजी लगाने को तैयार है। और अमेरिका के भीतर सैनिक ही सवाल उठा रहे हैं कि इस युद्ध में अमेरिकी सैनिक इजराइल के लिए अपनी जान क्यों दें ? तो क्या अमेरिका इस युद्ध हट जाएगा ? अगर नहीं हटा तो क्या युध्द को टेक्टफुली लंबा खींचने का प्रयास करेगा ? सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि क्या पहली बार अमेरिका, वह भी उस दौर में, जब दुनिया में लड़ाई ट्रेड और टेरिफ को लेकर शुरू हुई, वो अपने गोल से हटकर उस जमीन पर आकर खड़ा हो गया है जहां उसके पास ना ट्रेड बचेगा ना टेरिफ और वार उसको बरसों तक उलझाये रखेगा ? शायद ईरान इस दिशा में पूरे युद्ध को डिजाइन कर चुका है !


We are on to come before your presence today lifting the arms of our president we pray for you continue blessings and favor to rest open him. We pray for wisdom from heaven to flood his heart, his mind and lard you will guide him in this challenging times are facing today. Grace protection and father we just you continue to give are president strength he needs to lead our grate nation yes we comeback to one nation under God individual liberty and justice for all we pray your heaven blessings open him in Jesus name. शायद यह पहला मौका होगा जब युद्ध के समय अमेरिकी राष्ट्रपति को उनकी टीम घेर कर खड़ी हो जाती है और धर्मगुरु पाठ शुरू कर देते हैं। यानी यह मैसेज देने की कोशिश की जा रही है कि एक तरफ ईसाइयत है, दूसरी तरफ इस्लामिक है। तो यह क्यों ना माना जाय कि अमेरिका को सिविलाइजेशन और रिलीजियस काॅन्फ्लक्ट में तब्दील करने की कोशिश की जा रही है।


इस युद्ध में ईरान के जरिए यह बात निकल कर आ रही है कि मिडिल ईस्ट में अमेरिका के जितने भी अड्डे हैं वो पूरी तरह से खत्म हो गये हैं और दुनिया भर में यही संदेश जाए कि ईरान ने मिडिल ईस्ट में अमेरिकी बेस खत्म कर दिए हैं। मिडिल ईस्ट के देश अब अपने तरीके से अपना काम करने के लिए स्वतंत्र हैं। अपनी सुरक्षा खुद करें और आने वाले समय में उनकी भूमिका इस्लामिक कंट्रीज के तौर पर इजराइल के खिलाफ अग्रेसिव होनी चाहिए क्योंकि गाजापट्टी में इजराइल ने जो कुछ भी किया उसे मिडिल ईस्ट के देशों समेत किसी ने भी स्वीकार नहीं किया है। इस दौर में ईरान के भीतर रीजन चेंज हो या ना हो लेकिन जिस तरह से ईरान के लोग तुर्की में पनाह ले रहे हैं और इजराइल तुर्की को दूसरा ईरान कहने से चूक नहीं रहा है तो यह परिस्थिति कल को मिडिल ईस्ट के देशों के बीच भी आयेगी तो क्यों नहीं इस युद्ध को आखिरी लड़ाई के तौर पर लड़ा जाना चाहिए ? जिसमें जीत मिलने की संभावना इसलिए बलवती हैं क्योंकि इस वक्त दुनिया की भावनाएं अमेरिका से ज्यादा ईरान के साथ जुड़ रही हैं। ईरान के भीतर खामनेई के जिंदा रहते जो विरोध प्रदर्शन हो रहा था खामनेई की हत्या के बाद ईरान के हर नागरिक को लगने लगा है कि अगर देश को बचाना है तो एकजुट होना पड़ेगा।


अमेरिका ईरान की इकाॅनामी को ध्वस्त करने की भरसक कोशिश कर रहा है लेकिन ईरान अपनी इकाॅनामी को सम्हाले हुए है। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पिचसियान ने कहा कि कुछ देशों ने मध्यस्थता की कोशिश शुरू की है। हमारा जवाब बहुत साफ है। हम क्षेत्र में शांति के लिए प्रतिबद्ध हैं लेकिन अपने देश की गरिमा और अधिकार की रक्षा करने में हमें जरा भी हिचक नहीं है। यानी जो मध्यस्थता करने का प्रयास कर रहे हैं वे समझ जाएं कि हमारे ऊपर हमले होते रहें और हम झुक जाएं तो ऐसा नहीं होगा। मध्यस्थता का मकसद उन्हें दिखाना चाहिए जिन्होंने ईरानी जनता को कम आंक कर उकसावे की आग लगाई है। मतलब ईरान बातचीत के साथ ही मध्यस्थता से इंकार कर रहा है। वह मिडिल ईस्ट की परिस्थितियों को बदलने के साथ ही इजराइल को उसके अपने देश में केन्द्रित रखना चाहता है। एक तरीके से अमेरिका के लिए भी संदेश है कि आपकी शर्तों पर चीजें नहीं चलेंगी। जबकि राष्ट्रपति ट्रंप अपने ट्रूथ पर लिखते हैं : There will be no deal with Iran except U N CONDITIONAL SURENDER! After that and the selection of a GREAT & ACCEPTABLE LEADER(s). We and many of our wonderful and very brave allies and partners, will work tivelessly to bring Iran back from the brink of destruction, making it economically bigger, better, and stronger than ever before. IRAN WILL HAVE A GREAT FUTURE MAKE IRAN GREAT AGAIN (MIGA!) Thank you for your attention to this matter !


जहां अमेरिकी अधिकारी दुनिया भर में अमेरिकी ताकत का इजहार करते हुए ईरान को अंजाम तक पहुंचाने का जिक्र करते हैं वहीं ईरान भी पलटवार करते हुए यह कहने से नहीं चूकता है कि युद्ध को अंजाम तक तो हम ही लेकर जायेंगे। ईरान के विदेश मंत्री से जब पत्रकार ने पूछा अगर अमेरिकी सेना ईरान में घुस आये तो क्या होगा ? मंत्री का जवाब था हम इंतज़ार कर रहे हैं वह आ तो जाए। हम आखिरी दम तक लड़ने के लिए तैयार हैं। पिछले बरस जब 12 दिन तक युद्ध हुआ था तब ईरान की ताकत इतनी तो नहीं थी ! उस वक्त तो सीधे तौर पर इजराइल ने हमला किया था, अमेरिका पीछे खड़ा था लेकिन इस वक्त तो इजराइल और अमेरिका ने मिलकर हमला किया है। तो ईरान के भीतर इतनी ताकत आ कहां से गई ? अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस दौर में जो जिओपाॅलिटिक्स पनप रही है और आर्थिक तथा वार के साथ मिलकर जो न्यू वर्ल्ड ऑर्डर चल रहा है उसने अमेरिका को लेकर बहुत सारे सवाल खड़े कर दिए हैं। इसलिए दुनिया के देशों की सहानुभूतिक नजरें ईरान की तरफ हैं। जिस तरह से अमेरिका ने डेढ़ सौ से ज्यादा स्कूली बच्चियों को मौत के घाट उतारा, जिस तरह से अमेरिकी पनडुब्बी ने विशाखापट्टनम में भारत के साथ युध्दाभ्यास के बाद वापस लौट रहे ईरान के हथियार विहीन युद्धपोत को हिन्द महासागर में डुबो डाला। तो दुनिया के सामने यह सवाल आकर खड़ा हो गया कि क्या दुनिया को अमेरिका के कहे अनुसार चलना होगा या फिर अमेरिका की बातों का काउंटर करना होगा ?


ईरान बखूबी जानता है कि अमेरिका उसकी इकाॅनामी को खत्म करना चाहता है। अमेरिका ने ईरान पर 1996, 2006, 2012,  2018 में भी आर्थिक प्रतिबंध लगाये थे और अभी भी प्रतिबंध लगा ही हुआ है इसके बावजूद भी अगर ईरान अपने पैरों पर खड़ा हुआ है तो यह अमेरिका के लिए चुनौती और चेतावनी दोनों है। पूरे मिडिल ईस्ट में अमेरिकन ऐंबेसी या कंसुलेट काम नहीं कर रहे हैं। ईरान ने अपने मिसाइल और ड्रोन के जरिए ऐसी स्थिति पैदा कर दी है कि दुबई में सन्नाटा पसरा हुआ है। बहरीन, कतर, सऊदी अरब के साथ ही पूरे मिडिल ईस्ट में जहां पर भी रिफाइनरी काम कर रही थी या जहां पर भी तेल निकालने का काम हो रहा था वहां पर 70-75 प्रतिशत काम ठप्प पड़ गया है। होमर्ज रूट पर ईरान ने पूरे तरीके से कब्जा किया हुआ है। यानी दुनिया के किसी कंटेनर, शिप की आवाजाही नहीं हो पा रही है। ईरान लगातार अपनी खतरनाक मिसाइलों और ड्रोन के जरिए इजराइल और अमेरिका को नुकसान पहुंचाने में लगा हुआ है। सवाल है कि क्या उसे चीन से सिस्टमैटिक तरीके से मदद मिल रही है ? वाशिंग्टन पोस्ट ने एक रिपोर्ट साझा करते हुए लिखा है कि रशिया ने यूक्रेन युद्ध के दौरान जो अमेरिकन इंफॉर्मेशन जमा की जैसे अमेरिकन डिफेंस सिस्टम, वारशिप्स, कंसोलेट्स, वायु वेस वह सब कुछ ईरान को पासआन कर रहा है।


ईरान इस हकीकत को समझ रहा है कि उसके अस्तित्व की लड़ाई या तो उसको क्षेत्रीय तौर पर सबसे ताकतवर बना देगी या फिर यह लड़ाई बरसों-बरस तक चलेगी क्योंकि ईरान जटिल है, बड़ा है, उसकी भौगोलिक स्थिति अफगानिस्तान से भी ज्यादा जटिल है। यानी युद्ध इतनी जल्दी थमने के आसार नहीं हैं। वहीं अमेरिका लगातार यू-टर्न ले रहा है। यूएस के साथ खड़े रहने वाले स्पेन, फ्रांस, ब्रिटेन, कनाडा सभी ईरान पर हुए हमले को गलत बताते हुए अमेरिका से किनारा कर रहे हैं। शायद इसीलिए राष्ट्रपति ट्रंप युध्द से बाहर निकलने का रास्ता तलाशते हुए डिफेंसिव हो रहे हैं। ईरान के भीतर अमेरिकी पैदल सेना भेजने की वकालत करने वाले पेंटागन से व्हाइट हाउस सहमत नहीं हो रहा है। जहां युध्द को लेकर इजराइल अग्रेसिव है तो अमेरिका डिफेंसिव है वहीं यूरोपियन और नाटो कंट्रीज दोनों परिस्थितियों को नकार रही हैं। कल तक जो व्हाइट हाउस की प्रवक्ता यूक्रेन युद्ध को लेकर रूस को खलनायक बताती थी। अब वही बदलती हुई युध्द की परिस्थितियों में अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा कहे गए शब्दों को सही ठहराने के लिए कह रही है : Resolution is always negotiation. This is a question to the U S. Again based on factor was going to strike the United States was going to strike assets in the region and he made a determination to launch operation epic theory based on all off those reg.


इजराइल के भीतर की परिस्थितियां भी नाजुक हैं। इजराइल ने जिस तरह से लेबनान पर हमला किया उससे लग रहा है कि मसला सिर्फ ईरान भर का नहीं है मसला आने वाले समय में इजराइल पूरे वेस्ट एशिया में क्षेत्रीय ताकत के तौर पर अपनी चौधराहट जतलाना चाहता है। अमेरिका जो अभी तक मान रहा था कि संकट खामनेई है लेकिन अब उसे समझ आने लगा है कि खामनेई का ना होना ज्यादा बड़ा संकट बन गया है। अमेरिका के साथ खड़े देशों का रुख भी ईरान और खामनेई को लेकर बदला है तभी तो ब्रिटेन, स्पेन, फ्रांस, कनाडा तक ने ईरान पर किए गए हमले और खामनेई की हत्या, डेढ़ सौ से ज्यादा स्कूली बच्चियों की हत्या को गलत करार दिया है। इसका मतलब है कि अंतरराष्ट्रीय लक्ष्मण रेखा को लांघा जा चुका है। युध्द शुरू होने से पहले कटघरे में खामनेई थे तो युद्ध होने के बीच में इजराइल और अमेरिका खड़े हो चुके हैं कटघरे में । क्या नई परिस्थिति इजराइल को खत्म कर देगी ? क्या अमेरिका को पीछे धकेल देगी ? क्या दुनिया में न्यू वर्ल्ड आर्डर अमेरिका की दादागिरी को पूरे तरीके से उसकी साख के साथ खत्म करने की दिशा में कदम बढ़ा देगा ?


जहां अमेरिकी और भारतीय मीडिया कह रहा है कि ईरान बरबाद हो गया है वहीं सीएनएन का पत्रकार ग्राउंड रिपोर्टिंग करते हुए कह रहा है कि ईरान में कोई घबराहट नहीं है। कोई पतन नहीं, कोई विद्रोह नहीं। अमेरिकी उप विदेश मंत्री क्रिस्टोफर लेंड्रो ने भारत की सरजमीं (दिल्ली) में खड़े होकर कहा "हम भारत के साथ वो गल्तियां नहीं दुहरायेंगे जो हमने 20 साल पहले चीन के साथ की थी" । यानी हम भारत को चीन जितना शक्तिशाली नहीं बनने देंगे। अमेरिकी आर्थिक सचिव स्काॅट बेसेंट ने कहा "अमेरिका भारत को 30 दिनों के लिए अस्थाई रूप से रूसी तेल खरीदने की अनुमति दे रहा है। यह छूट सिर्फ समुद्र में फंसे रूसी जहाजों पर लागू होगी जो 5 मार्च तक लोड किये गये हैं और भारतीय रिफाइनर को 3 अप्रैल 2026 तक डिलीवरी लेने की अनुमति दी गई है" । यानी अमेरिका ने भारत को रूसी तेल खरीदने की कंडीशनल परमीशन दी है। भारत रूस के उन्हीं टैंकरों से तेल ले सकता है जो अभी हिन्द महासागर टेरिटरी में खड़े हैं। भारत प्रतिदिन ढाई मिलियन बैरल से ज्यादा कच्चा तेल नहीं खरीदेगा जबकि भारत की प्रतिदिन की जरूरत 4 से 5 मिलियन बैरल पेट्रोलियम की रहती है। अमेरिका जिस तरह से भारत के साथ निम्नस्तरीय व्यवहार कर रहा है और भारत की मौजूदा राजनीतिक सत्ता खामोशी बरत रही है तो सवाल उठना लाजिमी है कि क्या भारत अमेरिका का उपनिवेश है? क्या भारत अमेरिका का गुलाम है? किसी भी देश का उपनिवेश हो जाना गुलामी की दिशा में बढ़ता हुआ एक कदम होता है। 


देखा जा रहा है कि भारत से संबंधित हर घोषणा अमेरिका द्वारा की जाती है। आपरेशन सिंदूर के समय सीजफायर की घोषणा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने की। जिसका बखान सेंचुरी पार कर गया है। हाल ही में रशियन राष्ट्रपति पुतिन के अत्यंत विश्वसनीय कहे जाने वाले सलाहकार ब्लडिमोर का बयान आया जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय मीडिया को बताया कि भारत पाक स्ट्राइक के समय अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप का फोन पुतिन जी के पास आया था जिसमें उन्होंने बताया था कि उन्होंने भारत के आग्रह पर भारत पाक स्ट्राइक में सीजफायर करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है और भारत और पाकिस्तान के बीच में सीजफायर हुआ है वह ट्रंप की पहल पर ही हुआ है। ट्रेड डील किये जाने की इकतरफा जानकारी अमेरिका ने दी। जिस तरह से अमेरिका ने भारत में युध्दाभ्यास के बाद लौट रहे शस्त्रविहीन युध्दपोत को हिन्द महासागर में डुबो कर निहत्थे सैकड़ा भर सैनिकों की हत्या कर दी और भारत को इसकी सूचना तक नहीं दी जबकि वह इस क्षेत्र का NET SECURITY PARTNER है। GENEVA CONVENTION के मुताबिक NAVAL CONFLICT में शामिल पक्षों को ये देखे बिना कि वो किस तरफ हैं घायलों, बीमारों और जहाज दुर्घटना में फंसे लोगों की तुरंत खोज और देखभाल करनी चाहिए। ब्लूमबर्ग की एक खबर में कहा गया है कि इजराइल के एक मामूली जनरल ने भारत के 140 करोड़ लोगों को इजराइली श्रमिक मशीन बताया है। रुपया अपने निम्नतर स्तर पर है। युध्द की विभीषिका के नाम पर कमाई का धंधा शुरू हो गया है। एलपीजी के दाम तीन गुना बढ़ा दिए गये हैं। 


सवाल तो यही है कि "क्या भारत अब अपनी उर्जा नीति भी खुद तय नहीं कर सकता" ? क्या भारत के हर पेट्रोल पंप पर THANK YOU MODI JI FOR RUSSIAN CRUDE APPROVAL FROM USA वाले बैनर दिखेंगे ? सोशल मीडिया पर तो लिखा जाने लगा है - THEN - THE USA IS OUR FRIEND NOT THE BOSS. THEY CAN'T DICTATE INDIA ON THEIR TERMS. NOW - SAAR, OIL KHARIDNE PERMISSION DE DO.  दादा MERCY PETITION लिखते थे, पोते PERMISSION LETTER लिख रहे हैं। 


अश्वनी बडगैया अधिवक्ता

स्वतंत्र पत्रकार

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