अगर इस देश में न्याय जिंदा होता तो संसद की आधी कुर्सियां खाली होती और जेलों में पैर रखने की जगह नहीं बचती
अगर इस देश में न्याय जिंदा होता तो संसद की आधी कुर्सियां खाली होती और जेलों में पैर रखने की जगह नहीं बचती
मध्यप्रदेश | राजनीति, प्रशासन और न्याय व्यवस्था पर गहराते अविश्वास का प्रतीक बनता जा रहा है। आम नागरिक के बीच यह चर्चा तेज है कि क्या कानून सबके लिए समान है, या फिर ताकत और पद के आगे न्याय अक्सर कमजोर पड़ जाता है। देश की संसद, जिसे लोकतंत्र का मंदिर कहा जाता है, वहीं कई जनप्रतिनिधियों पर गंभीर आपराधिक मामलों के आरोप वर्षों से लंबित हैं। चुनाव जीतने के बाद भी इन मामलों का निपटारा नहीं हो पाता, और आरोपी खुलेआम सत्ता के गलियारों में घूमते नजर आते हैं।सवाल यह उठता है कि जब कानून बनाने वाले ही कानून के घेरे में हों, तो आम जनता को न्याय कैसे मिलेगा वहीं दूसरी ओर, जेलों की स्थिति भी किसी से छिपी नहीं है। छोटे अपराधों में पकड़े गए गरीब, मजदूर और वंचित वर्ग के लोग वर्षों तक विचाराधीन कैदी बनकर जेलों में सड़ते रहते हैं। उनके पास न तो महंगे वकील होते हैं, न ही राजनीतिक संरक्षण । न्याय की धीमी गति उनके जीवन की सबसे बड़ी सजा बन जाती है। न्यायपालिका की प्रक्रिया पर भी सवाल उठ रहे हैं । तारीख पर तारीख, सालों तक चलने वाले मुकदमे और बढ़ता न्यायिक बोझ व्यवस्था की कमियों को उजागर करते हैं । कई मामलों में फैसला आने तक पीढ़ियां बदल जाती हैं, लेकिन न्याय अधूरा ही रह जाता है । विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कानून का निष्पक्ष और सख्ती से पालन हो, तो सत्ता और अपराध के गठजोड़ पर लगाम लग सकती है । राजनीति के अपराधीकरण को रोकने, त्वरित न्याय व्यवस्था लागू करने और कमजोर वर्गों को कानूनी सहायता देने की सख्त जरूरत है । आज यह कथन केवल एक तीखा वाक्य नहीं, बल्कि व्यवस्था के सामने खड़ा एक आईना है। सवाल यह नहीं है कि संसद की कितनी कुर्सियां खाली होतीं या जेलें कितनी भर जातीं, सवाल यह है कि क्या हम सच में एक ऐसे देश की ओर बढ़ रहे हैं जहां न्याय जिंदा है या सिर्फ कागजों और भाषणों तक सीमित होकर रह गया है ।

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