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जनता को हर चीज़ मुफ़्त देना दया नहीं होता, अक्सर वह आदत बन जाती है, जब मेहनत का मूल्य घटता है तो जिम्मेदारी भी धीरे-धीरे मरने लगती है, मनोविज्ञान कहता है कि जो चीज़ बिना प्रयास मिलती है, उसकी कदर नहीं होती, शिक्षा, न्याय और इलाज सहारा हैं, लेकिन मुफ़्तखोरी कमज़ोरी सिखा देती है

 जनता को हर चीज़ मुफ़्त देना दया नहीं होता, अक्सर वह आदत बन जाती है, जब मेहनत का मूल्य घटता है तो जिम्मेदारी भी धीरे-धीरे मरने लगती है, मनोविज्ञान कहता है कि जो चीज़ बिना प्रयास मिलती है, उसकी कदर नहीं होती, शिक्षा, न्याय और इलाज सहारा हैं, लेकिन मुफ़्तखोरी कमज़ोरी सिखा देती है



संपादक राहुल पाण्डेय  |  जनता को हर चीज़ मुफ़्त देना पहली नज़र में करुणा और जनहित का प्रतीक लगता है, लेकिन गहराई से देखें तो यह नीति कई बार समाज को मज़बूत करने के बजाय उसे कमज़ोर बना देती है। दया और सशक्तिकरण में बारीक लेकिन बेहद अहम अंतर है। दया वह है जो कठिन समय में सहारा दे, जबकि सशक्तिकरण वह है जो व्यक्ति को अपने पैरों पर खड़ा होना सिखाए। दुर्भाग्यवश, आज की राजनीति और नीतियों में यह रेखा अक्सर धुंधली होती जा रही है। मनोविज्ञान स्पष्ट रूप से कहता है कि जो चीज़ बिना प्रयास के मिलती है, उसकी कदर नहीं होती। जब मेहनत का मूल्य घटता है, तो ज़िम्मेदारी भी धीरे-धीरे मरने लगती है। व्यक्ति यह मानने लगता है कि राज्य या व्यवस्था हर आवश्यकता अपने आप पूरी कर देगी। इस सोच का सीधा असर कामकाज की नैतिकता, सामाजिक उत्तरदायित्व और आत्मसम्मान पर पड़ता है। मुफ्त सुविधाएं जब अस्थायी राहत से आगे बढ़कर स्थायी आदत बन जाती हैं, तो वे विकास की गति को रोक देती हैं।

यह कहना भी सही नहीं होगा कि हर तरह की मुफ्त सुविधा गलत है। शिक्षा, न्याय और इलाज ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ राज्य का सहारा अनिवार्य है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक समान पहुंच समाज की बुनियाद मज़बूत करती है। सुलभ न्याय व्यवस्था लोकतंत्र की रीढ़ है और स्वास्थ्य सेवाएं मानवीय गरिमा से जुड़ा प्रश्न हैं। इन क्षेत्रों में “मुफ़्त” शब्द दरअसल निवेश का दूसरा नाम है मानव संसाधन में निवेश।समस्या तब शुरू होती है जब मुफ्तखोरी को वोट बैंक की राजनीति का औज़ार बना लिया जाता है। बिना लक्ष्य, बिना शर्त और बिना जवाबदेही के दी जाने वाली सुविधाएं लोगों को आत्मनिर्भर बनाने के बजाय निर्भर बना देती हैं। मेहनत करने वाला और न करने वाला दोनों को एक समान लाभ मिलने लगता है। नतीजा यह होता है कि ईमानदार श्रम का उत्साह टूटता है और समाज में असंतोष पनपता है। आर्थिक दृष्टि से भी मुफ्तखोरी का बोझ अंततः जनता पर ही पड़ता है। सरकारी खजाना असीमित नहीं होता। जब बिना ठोस योजना के अनुदान और मुफ्त योजनाएं चलाई जाती हैं, तो या तो विकास कार्य रुकते हैं या करों का बोझ बढ़ता है। आने वाली पीढ़ियां कर्ज़ और संसाधनों की कमी का दंश झेलती हैं। यह नीतिगत दूरदर्शिता की कमी का स्पष्ट संकेत है। असल ज़रूरत है संतुलन की। सरकार का कर्तव्य है कि वह कमजोर वर्गों को सहारा दे, लेकिन साथ ही उन्हें सक्षम भी बनाए। मुफ्त राशन के साथ कौशल प्रशिक्षण, बेरोज़गारी भत्ते के साथ रोज़गार सृजन, और सब्सिडी के साथ जवाबदेही यही टिकाऊ मॉडल हो सकता है। सहायता ऐसी हो जो व्यक्ति को आगे बढ़ने का रास्ता दिखाए, न कि उसे वहीं रोक दे। समाज को यह भी समझना होगा कि अधिकारों के साथ कर्तव्य जुड़े होते हैं। केवल पाने की मानसिकता नागरिकता को खोखला कर देती है। जब व्यक्ति योगदान देना बंद कर देता है, तो व्यवस्था भी धीरे-धीरे चरमराने लगती है। आत्मनिर्भरता केवल आर्थिक शब्द नहीं, यह मानसिक और नैतिक अवस्था भी है।अंततः, सच्ची दया वह नहीं जो बार-बार मुफ्त थाली परोस दे, बल्कि वह है जो हाथ में औज़ार थमा दे। शिक्षा, न्याय और इलाज ये सहारे हैं, जिन पर कोई समझौता नहीं होना चाहिए। लेकिन हर सुविधा को मुफ्त बनाकर हम एक ऐसा समाज गढ़ रहे हैं, जहाँ मेहनत की जगह मांग हावी हो जाती है। अगर हमें मजबूत, जिम्मेदार और आत्मसम्मानी नागरिक चाहिए, तो नीतियों को मुफ्तखोरी से निकालकर सशक्तिकरण की दिशा में मोड़ना ही होगा।

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