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इस सिस्टम में सत्यमेव जयते सिर्फ सरकारी दीवारों पर अच्छा लगता है, हकीकत में तो पैसा मेव जयते है

 इस सिस्टम में सत्यमेव जयते सिर्फ सरकारी दीवारों पर अच्छा लगता है, हकीकत में तो पैसा मेव जयते है



कटनी  |  देश की सरकारी इमारतों, दफ्तरों और कार्यालयों की दीवारों पर बड़े गर्व से लिखा रहता है ‘सत्यमेव जयते’। यह वाक्य सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की आत्मा और नैतिक आधार माना जाता है। लेकिन आज का कड़वा सच यह है कि यह वाक्य दीवारों तक ही सीमित होकर रह गया है।ज़मीनी हकीकत में अक्सर यह महसूस होता है कि सिस्टम पर ‘पैसा मेव जयते’ का बोलबाला है। आज आम नागरिक का अनुभव यही कहता है कि बिना पैसे के न तो काम समय पर होता है, न ही न्याय आसानी से मिलता है। एक छोटा सा प्रमाण पत्र बनवाना हो, किसी योजना का लाभ लेना हो, या फिर किसी शिकायत पर कार्रवाई करवानी हो हर मोड़ पर “खर्चा-पानी” की अनकही मांग सामने आ जाती है।

*रिश्वत बना सिस्टम का अनकहा नियम*

सरकारी दफ्तरों में फैली यह बीमारी अब किसी से छिपी नहीं है। कागज फाइलों में दबे रहते हैं, जब तक उन्हें नोटों की हवा न मिले। कई मामलों में काम करना अधिकारियों की जिम्मेदारी होती है, लेकिन उसे ‘एहसान’ की तरह पेश किया जाता है। यह स्थिति सिर्फ बड़े शहरों तक सीमित नहीं, बल्कि ग्रामीण इलाकों और पंचायत स्तर तक गहराई से फैली हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों में विकास कार्यों के नाम पर जारी राशि का बड़ा हिस्सा कागजों में खर्च दिखा दिया जाता है, जबकि ज़मीन पर काम अधूरा या पूरी तरह गायब रहता है। सड़क, नाली, आवास, स्वच्छता हर योजना में भ्रष्टाचार की शिकायतें आम हो चुकी हैं।

*ईमानदारी की कीमत, बेईमानी का इनाम*

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इस सिस्टम में ईमानदारी अक्सर बोझ बन जाती है। जो अधिकारी या कर्मचारी नियमों के अनुसार काम करना चाहता है, उसे परेशान किया जाता है, उसका स्थानांतरण कर दिया जाता है या फिर मानसिक दबाव बनाया जाता है। वहीं दूसरी ओर, जो ‘सेटिंग’ में माहिर होते हैं, उन्हें मलाईदार पद और मलाईदार जिम्मेदारियाँ मिल जाती हैं। यही वजह है कि युवा वर्ग के मन में भी यह धारणा बनने लगी है कि मेहनत और सच्चाई से नहीं, बल्कि पैसे और पहुंच से सफलता मिलती है। यह सोच लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक संकेत है।

*जनता का भरोसा हो रहा कमजोर*

जब नागरिक बार-बार यह देखता है कि सच बोलने वाला परेशान होता है और गलत करने वाला बेखौफ घूमता है, तो सिस्टम से उसका भरोसा उठने लगता है। लोग शिकायत करने से डरने लगते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि शिकायत करने पर भी परिणाम शून्य ही रहेगा।

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