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मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को सिहोरा जिला बनाने में क्या दिक्कत है न बनाना हो तो साफ मना करे सरकार जिला की ही तो मांग है, कोई और नहीं मुख्यमंत्री से वार्ता ने दी सिहोरा जिला आंदोलन को नई दिशा, बदला आंदोलन का स्वरूप

 मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को सिहोरा जिला बनाने में क्या दिक्कत है न बनाना हो तो साफ मना करे सरकार जिला की ही तो मांग है, कोई और नहीं मुख्यमंत्री से वार्ता ने दी सिहोरा जिला आंदोलन को नई दिशा, बदला आंदोलन का स्वरूप



सिहोरा ।  मध्यप्रदेश में लंबे समय से लंबित सिहोरा को जिला बनाए जाने की मांग एक बार फिर केंद्र में आ गई है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से हाल ही में हुई वार्ता के बाद सिहोरा जिला आंदोलन ने अब नया और अधिक संगठित स्वरूप ग्रहण कर लिया है। आंदोलनकारियों का कहना है कि जब सरकार से केवल एक जिला बनाने की ही मांग की जा रही है, न कोई विशेष पैकेज, न कोई असंवैधानिक अपेक्षा, तो फिर सरकार को इसमें असमर्थता क्यों महसूस हो रही है। यदि सरकार सिहोरा को जिला नहीं बनाना चाहती, तो उसे स्पष्ट रूप से “न” कहने का साहस दिखाना चाहिए, ताकि जनता भ्रम और आश्वासनों के जाल से बाहर आ सके।

*वर्षों पुरानी मांग, लेकिन आज भी अनसुनी*

सिहोरा को जिला बनाने की मांग कोई नई नहीं है। वर्षों से यह क्षेत्र प्रशासनिक उपेक्षा का दंश झेलता आ रहा है। भौगोलिक दृष्टि से सिहोरा एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है, जहां से कई तहसीलें, पंचायतें और ग्रामीण अंचल जुड़े हुए हैं। इसके बावजूद नागरिकों को आज भी जिला स्तर के कार्यों के लिए जबलपुर या अन्य जिलों के चक्कर काटने पड़ते हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, राजस्व, पुलिस और न्यायिक सेवाओं में देरी और असुविधा आम बात बन चुकी है।आंदोलनकारियों का सवाल सीधा है जब राज्य में इससे छोटे और कम आबादी वाले क्षेत्रों को जिला बनाया जा सकता है, तो सिहोरा क्यों नहीं?

*मुख्यमंत्री से वार्ता, उम्मीद और असंतोष दोनों*

हाल ही में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से हुई वार्ता ने आंदोलन को एक नई दिशा जरूर दी है, लेकिन इससे पूरी संतुष्टि नहीं मिली। आंदोलन समिति का कहना है कि वार्ता में संवेदनशीलता तो दिखाई दी, परंतु ठोस आश्वासन या समयबद्ध निर्णय का अभाव रहा। यही कारण है कि अब आंदोलन ने केवल धरना-प्रदर्शन तक सीमित रहने के बजाय एक सुनियोजित और दस्तावेज़-आधारित रणनीति अपनाने का निर्णय लिया है।

*रणनीतिक दबाव की ओर बढ़ता आंदोलन*

लक्ष्य जिला सिहोरा आंदोलन समिति ने स्पष्ट किया है कि अब आंदोलन का उद्देश्य केवल भावनात्मक अपील तक सीमित नहीं रहेगा। इसके तहत सिहोरा को जिला बनाए जाने में शामिल होने वाले सभी संभावित क्षेत्रों, तहसीलों और पंचायतों से समर्थन पत्र एकत्र किए जाएंगे। इन समर्थन पत्रों को जिला एवं संभाग प्रशासनिक पुनर्गठन आयोग को सौंपा जाएगा, जिससे यह साबित किया जा सके कि सिहोरा जिले की मांग केवल कुछ लोगों की नहीं, बल्कि व्यापक जनसमर्थन वाली मांग है। समिति का मानना है कि जब सरकार के सामने तथ्य, आंकड़े और जनसमर्थन एक साथ रखे जाएंगे, तब निर्णय टालना आसान नहीं होगा।

*हर माह आंदोलन को मिलेगी नई ऊर्जा*

आंदोलन को निरंतर और जीवंत बनाए रखने के लिए समिति ने एक अहम निर्णय लिया है। अब प्रत्येक माह के दूसरे शनिवार को अनिवार्य बैठक और रैली आयोजित की जाएगी। इन आयोजनों का उद्देश्य केवल भीड़ जुटाना नहीं, बल्कि जनचेतना को बनाए रखना और सरकार को यह याद दिलाना है कि सिहोरा की जनता अपने अधिकार के लिए शांतिपूर्ण, लेकिन दृढ़ संघर्ष कर रही है।

आंदोलनकारियों का कहना है कि यह लड़ाई लंबी हो सकती है, लेकिन नियमित कार्यक्रमों के माध्यम से इसे कमजोर नहीं पड़ने दिया जाएगा।

*अनशन का बदला स्वरूप, लेकिन संदेश वही*

आंदोलन के प्रमुख चेहरे और अनशनकारी प्रमोद साहू द्वारा अनशन के स्वरूप में किया गया बदलाव भी चर्चा का विषय बना हुआ है। एक कन्या के हाथों आहार ग्रहण कर उन्होंने अनशन को विराम दिया, लेकिन आंदोलन समाप्त नहीं किया। इसे मुख्यमंत्री और सरकार पर डाले गए एक मनोवैज्ञानिक और नैतिक दबाव के रूप में देखा जा रहा है। इस कदम के माध्यम से आंदोलनकारियों ने यह संदेश देने का प्रयास किया है कि उनका संघर्ष न तो जिद्दी है, न ही अराजक, बल्कि संवेदनशील, मानवीय और सकारात्मक सोच पर आधारित है।

*पत्रकार वार्ता में आंदोलन का रोडमैप*

सिहोरा में आयोजित पत्रकार वार्ता के दौरान लक्ष्य जिला सिहोरा आंदोलन समिति ने आंदोलन के नए स्वरूप की औपचारिक जानकारी दी। समिति ने साफ कहा कि आंदोलन पूरी तरह लोकतांत्रिक, शांतिपूर्ण और जनआधारित रहेगा। किसी भी प्रकार की हिंसा, अव्यवस्था या कानून-व्यवस्था को प्रभावित करने वाले कदम नहीं उठाए जाएंगे। समिति ने यह भी स्पष्ट किया कि सिहोरा को जिला बनाए जाने तक यह संघर्ष अलग-अलग रूपों में जारी रहेगा चाहे वह ज्ञापन के माध्यम से हो, प्रशासनिक आयोग से संवाद के जरिए हो या जनजागरूकता अभियानों के रूप में।

*सरकार से सीधा सवाल*

आंदोलनकारियों का सरकार से सीधा सवाल है क्या सिहोरा को जिला बनाना प्रशासनिक रूप से असंभव है, या फिर यह केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी का परिणाम है? यदि सरकार के पास कोई ठोस कारण हैं, तो उन्हें सार्वजनिक रूप से सामने लाया जाए। और यदि कोई बाधा नहीं है, तो फिर निर्णय में देरी क्यों? लोगों का कहना है कि लगातार आश्वासन देना और निर्णय टालना जनता के विश्वास के साथ खिलवाड़ है।

*सिहोरा का जिला बनना क्यों जरूरी?*

सिहोरा को जिला बनाए जाने से न केवल प्रशासनिक सुविधा बढ़ेगी, बल्कि क्षेत्र के समग्र विकास को भी गति मिलेगी। जिला बनने से नए सरकारी कार्यालय खुलेंगे, रोजगार के अवसर बढ़ेंगे, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं सुलभ होंगी और स्थानीय स्तर पर निर्णय लेने की प्रक्रिया मजबूत होगी।

इसके अलावा, ग्रामीण अंचलों को सीधे जिला प्रशासन से जोड़ने में मदद मिलेगी, जिससे योजनाओं का क्रियान्वयन अधिक प्रभावी हो सकेगा।

 *निर्णय अब टालना मुश्किल*

मुख्यमंत्री से हुई वार्ता के बाद सिहोरा जिला आंदोलन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अब यह केवल भावनाओं का आंदोलन नहीं रहा, बल्कि एक सुव्यवस्थित, तथ्यपरक और जनसमर्थन से लैस संघर्ष बन चुका है। सरकार के सामने अब विकल्प साफ हैं या तो सिहोरा को जिला बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएं, या फिर जनता को स्पष्ट रूप से बताया जाए कि यह संभव नहीं है।

लेकिन एक बात तय है सिहोरा की जनता अब चुप बैठने वाली नहीं है। जिला की मांग पर यह आंदोलन तब तक जारी रहेगा, जब तक सिहोरा को उसका अधिकार नहीं मिल जाता।

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