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आदिवासी छात्रावास की बच्चियों की सुरक्षा पर संकट, ग़ौर कटियाघाट छात्रावास का मामला और व्यवस्था पर सवाल , जबलपुर का मामला

 आदिवासी छात्रावास की बच्चियों की सुरक्षा पर संकट, ग़ौर कटियाघाट छात्रावास का मामला और व्यवस्था पर सवाल , जबलपुर का मामला



जबलपुर  |  मध्यप्रदेश में संचालित आदिवासी छात्रावासों का उद्देश्य है गरीब, वंचित और दूरस्थ क्षेत्रों की आदिवासी बालिकाओं को शिक्षा का अवसर देना, सुरक्षित आवास प्रदान करना और उन्हें बेहतर भविष्य की ओर अग्रसर करना। लेकिन जब इन छात्रावासों में ही बच्चियाँ असुरक्षित महसूस करें, जब उनकी गोपनीयता और गरिमा से समझौता हो, तो यह न केवल शिक्षा व्यवस्था की विफलता है बल्कि यह राज्य और समाज के लिए भी गहरी चिंता का विषय है। ग़ौर कटियाघाट के पास स्थित शासकीय अनुसूचित जनजाति छात्रावास में घटित घटनाएँ इसी चिंता का सजीव उदाहरण हैं। बाल कल्याण समिति और राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की टीम ने जब छात्रावास का निरीक्षण किया तो बच्चियों ने अपनी व्यथा स्पष्ट शब्दों में बताई। उन्होंने कहा कि छात्रावास का स्वीपर उन्हें नहाते समय देखता है। बच्चियों ने यह भी बताया कि वे हमेशा भयभीत रहती हैं और इस वातावरण में वे पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे पातीं। किसी भी छात्रावास की मूल भावना सुरक्षित माहौल है, लेकिन यहाँ सुरक्षा की जगह असुरक्षा और भय व्याप्त है।

*पर्चियों में उभरी सच्चाई*

बाल कल्याण समिति की महिला सदस्यों ने बच्चियों से सीधे प्रश्न करने के बजाय उन्हें पर्चियाँ दीं, ताकि वे बिना डर के अपनी समस्याएँ लिख सकें। जब इन पर्चियों का अध्ययन किया गया तो अनेक गंभीर तथ्य सामने आए। बच्चियों ने लिखा कि पुरुष कर्मचारियों का देर रात तक आवागमन होता है, नहाते समय झाँकने की घटनाएँ होती हैं, साफ-सफाई नहीं होती और छात्रावास में गंदगी का आलम है। यह स्थिति न केवल छात्रावास प्रबंधन की लापरवाही को उजागर करती है, बल्कि यह इस ओर भी इशारा करती है कि बच्चियाँ लंबे समय से पीड़ा सह रही थीं परंतु उनकी बात सुनने वाला कोई नहीं था।

*बीमार बच्चियाँ और गंदगी*

निरीक्षण के दौरान 30 से अधिक बच्चियाँ बीमार मिलीं। छात्रावास में पंजीकृत 101 छात्राओं में से 89 ही मौजूद थीं। बाकी बच्चियों में से कई बिना अनुमति घर चली गई थीं। यह इस बात का संकेत है कि बच्चियाँ छात्रावास में असहज और असुरक्षित महसूस कर रही थीं। गंदगी का स्तर इतना अधिक था कि शौचालयों से दुर्गंध आ रही थी और बीमारियों का खतरा हर जगह मंडरा रहा था। साफ-सफाई जैसी बुनियादी सुविधा तक छात्रावास में उपलब्ध नहीं थी।

*अधीक्षिका और उनके परिवार का हस्तक्षेप*

जाँच के दौरान पाया गया कि छात्रावास अधीक्षिका सरिता मरकाम मौके पर मौजूद नहीं थीं। बल्कि उनके निवास पर उनके पति और दो वयस्क बेटे रहते थे। परिसर में उनकी कारें और मोटरसाइकिल खड़ी थीं। यह छात्रावास के नियमों का घोर उल्लंघन है। अधीक्षिका का पूरा परिवार छात्रावास परिसर में रह रहा था, जिससे बच्चियों की निजता और सुरक्षा पर सवाल उठता है। यहाँ तक कि देर रात पुरुषों का आवागमन बच्चियों की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा था।

*राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की भूमिका*

इस मामले को राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने गंभीरता से लिया। आयोग के सदस्य ओंकार सिंह ने कलेक्टर को तत्काल कार्रवाई के निर्देश दिए। आयोग की सक्रियता यह दर्शाती है कि बच्चियों की शिकायत को नजरअंदाज नहीं किया गया। लेकिन यह भी स्पष्ट है कि यदि बच्चियों ने आयोग में शिकायत न की होती, तो यह मामला शायद कभी सामने न आता। यह प्रशासनिक ढांचे की निष्क्रियता और अनदेखी को उजागर करता है।

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