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ढीमरखेड़ा न्यायाधीश पूर्वी तिवारी शासकीय कस्तूरबा गांधी बालिका छात्रावास रामपुर पहुंचकर बच्चों को किया जागरूक, शासकीय कस्तूरबा गांधी बालिका छात्रावास रामपुर में विधिक शिविर, जागरूकता, जिम्मेदारी और बदलाव की ओर एक सार्थक कदम,

 ढीमरखेड़ा न्यायाधीश पूर्वी तिवारी शासकीय कस्तूरबा गांधी बालिका छात्रावास रामपुर पहुंचकर बच्चों को किया जागरूक, शासकीय कस्तूरबा गांधी बालिका छात्रावास रामपुर में विधिक शिविर, जागरूकता, जिम्मेदारी और बदलाव की ओर एक सार्थक कदम, 



कटनी |  जिले में सामाजिक जागरूकता और विधिक साक्षरता की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब यह प्रयास बालिकाओं तक पहुंचे, तो उसका प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है, क्योंकि एक शिक्षित बालिका न केवल अपने भविष्य को संवारती है, बल्कि पूरे समाज को एक नई दिशा देती है। इसी दृष्टिकोण को केंद्र में रखते हुए, शासकीय कस्तूरबा गांधी बालिका छात्रावास, रामपुर में जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के निर्देशन में एक महत्वपूर्ण विधिक शिविर का आयोजन किया गया। इस शिविर में मुख्य अतिथि के रूप में न्यायाधीश श्री पूर्वी तिवारी (ढीमरखेड़ा) उपस्थित रही, जिन्होंने नशा मुक्ति, जनसंख्या नियंत्रण, शिक्षा और समाज में महिला सशक्तिकरण जैसे विषयों पर विस्तार से विचार साझा किए। यह विधिक शिविर, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण कटनी के अध्यक्ष श्री जितेंद्र कुमार शर्मा के निर्देशन में आयोजित किया गया था। विधिक सेवा प्राधिकरण का उद्देश्य है कि समाज के प्रत्येक वर्ग तक न्याय की पहुँच सुनिश्चित हो, विशेषकर उन लोगों तक जो सामाजिक, आर्थिक या शैक्षिक रूप से पिछड़े हैं। कस्तूरबा गांधी बालिका छात्रावास जैसी संस्था में शिविर आयोजित करना इसलिए भी अधिक प्रभावशाली है क्योंकि यहां रहने वाली बालिकाएं अक्सर ग्रामीण, आदिवासी या कमजोर सामाजिक पृष्ठभूमि से आती हैं। नशा मुक्ति के प्रति जागरूकता फैलाना। जनसंख्या नियंत्रण और इसके सामाजिक प्रभावों पर जानकारी देना। बालिकाओं को उनके विधिक अधिकारों से परिचित कराना। शिक्षा के महत्व और सामाजिक दायित्व की भावना को जागृत करना।

*न्यायाधीश पूर्वी तिवारी द्वारा नशा मुक्ति पर विचार*

न्यायाधीश पूर्वी तिवारी ने नशा मुक्ति विषय पर बड़ी ही संवेदनशीलता और गंभीरता से अपने विचार रखे। उन्होंने बताया कि “नशा केवल एक व्यक्ति को ही नहीं, बल्कि पूरे परिवार, समाज और अंततः राष्ट्र को प्रभावित करता है।” उन्होंने बालिकाओं को बताया कि किस प्रकार से नशे की लत एक व्यक्ति के सोचने-समझने की शक्ति को नष्ट कर देती है। उन्होंने कहा कि शुरुआत में लोग मनोरंजन, तनाव से मुक्ति या दोस्तों के दबाव में नशा करते हैं, लेकिन धीरे-धीरे यह एक ऐसी लत बन जाती है जिससे बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है।

*नशे के सामाजिक और पारिवारिक प्रभाव*

न्यायाधीश ने उदाहरणों के माध्यम से यह समझाया कि एक नशेड़ी व्यक्ति अपने घर की आर्थिक स्थिति को खराब कर देता है, घर में हिंसा और तनाव का माहौल बन जाता है, बच्चों की पढ़ाई पर असर पड़ता है और अंततः पूरा समाज इसकी चपेट में आ जाता है। उन्होंने बताया कि नशा करने वाला व्यक्ति अपराध की ओर भी आकर्षित होता है चोरी, लूट, मारपीट, बलात्कार जैसी घटनाएं नशे की हालत में अधिक होती हैं।

*बालिकाओं को नशे से बचाने की प्रेरणा*

बालिकाओं को विशेष रूप से यह समझाया गया कि नशे से दूर रहना न केवल उनके स्वास्थ्य और भविष्य के लिए आवश्यक है, बल्कि वह दूसरों को भी प्रेरित कर सकती हैं। एक बालिका यदि अपने परिवार और आस-पड़ोस में इस विषय पर बात करती है, तो वह समाज में बदलाव का माध्यम बन सकती है।

*जनसंख्या वृद्धि, एक गंभीर चुनौती*

विधिक शिविर में न्यायाधीश पूर्वी तिवारी ने जनसंख्या वृद्धि के मुद्दे को भी गहराई से उठाया। उन्होंने कहा कि “जनसंख्या वृद्धि अब केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि एक सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय संकट बन चुका है।”जनसंख्या बढ़ने के साथ खाद्यान्न की माँग बढ़ती है, लेकिन संसाधनों की कमी के कारण गरीबी और भुखमरी बढ़ती है। बढ़ती आबादी के कारण जल, वायु, भूमि और ध्वनि प्रदूषण चरम पर पहुँच रहे हैं। सीमित रोजगार अवसरों के कारण युवाओं को नौकरी नहीं मिलती और वे निराशा, अपराध या नशे की ओर बढ़ते हैं। परिणामस्वरूप महंगाई बढ़ती है और आम जनता का जीवन कठिन हो जाता है। अधिक जनसंख्या से सरकारी अस्पतालों, शिक्षा संस्थानों और मूलभूत सेवाओं पर अत्यधिक बोझ पड़ता है। न्यायाधीश ने कहा कि केवल सरकार द्वारा कानून बनाना पर्याप्त नहीं, समाज को भी अपनी सोच बदलनी होगी। विवाह की सही उम्र, दो बच्चों की नीति, परिवार नियोजन के उपायों की जानकारी और प्रचार आवश्यक है। उन्होंने बताया कि जागरूकता से ही इस संकट से निपटा जा सकता है। शिक्षा ही वह साधन है जिससे आप अपने अधिकार जान सकती हैं, आत्मनिर्भर बन सकती हैं और समाज में सम्मानपूर्वक जीवन जी सकती हैं। उन्होंने उदाहरणों के माध्यम से यह बताया कि शिक्षा से एक बालिका केवल नौकरी पाने योग्य ही नहीं बनती, बल्कि वह अपने परिवार और समाज की दिशा और दशा बदलने की ताकत भी रखती है। एक शिक्षित बेटी, मां बनकर आने वाली पीढ़ी को भी शिक्षित बनाती है।

*कस्तूरबा बालिकाओं के लिए संदेश*

न्यायाधीश ने छात्रावास की बालिकाओं को प्रेरित करते हुए कहा कि वे अपने जीवन को संवारने का सपना देखें, डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, पुलिस अफसर या शिक्षक बनने की ठानें। उन्होंने यह भी कहा कि केवल पढ़ाई ही नहीं, आत्म-रक्षा, नैतिकता, समय प्रबंधन और स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहना भी उतना ही आवश्यक है। 

*विधिक अधिकारों की जानकारी*

शिविर में यह भी बताया गया कि हर नागरिक को संविधान द्वारा कुछ अधिकार मिले हैं, जिनकी जानकारी आवश्यक है। घरेलू हिंसा अधिनियम 2005, बाल विवाह निषेध अधिनियम,बाल श्रम निषेध अधिनियम, शिक्षा का अधिकार अधिनियम , बाल यौन अपराधों से संरक्षण अधिनियम, इन सभी अधिकारों की जानकारी से बालिकाएं किसी भी प्रकार के शोषण से स्वयं को बचा सकती हैं और दूसरों की भी मदद कर सकती हैं।

*बालिकाओं की भागीदारी और प्रतिक्रिया*

शिविर के दौरान कई बालिकाओं ने अपने विचार साझा किए। उन्होंने बताया कि इस प्रकार के शिविर उन्हें आत्मविश्वास देते हैं और यह एहसास कराते हैं कि वे अकेली नहीं हैं कानून और न्याय उनके साथ है। कुछ बालिकाओं ने कविता, नारे और भाषण के माध्यम से नशा मुक्ति, शिक्षा और महिला सशक्तिकरण पर अपने विचार रखे। अंत में न्यायाधीश पूर्वी तिवारी ने सभी बालिकाओं को एक संकल्प दिलवाया "हम कभी नशा नहीं करेंगे, अपने आसपास के लोगों को नशा मुक्त रहने की प्रेरणा देंगे। हम शिक्षा को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाएंगे और समाज में बदलाव लाएंगे।" इस विधिक शिविर का समापन न केवल एक औपचारिक कार्यक्रम था, बल्कि यह उस विचार की शुरुआत थी, जो आने वाले समय में कई घरों, गांवों और स्कूलों तक पहुंचकर समाज को एक नई दिशा देगा।शासकीय कस्तूरबा गांधी बालिका छात्रावास रामपुर में आयोजित यह विधिक शिविर एक अत्यंत प्रेरणादायक और सामाजिक रूप से आवश्यक पहल थी। न्यायाधीश पूर्वी तिवारी के विचारों ने बालिकाओं के मन में जिम्मेदारी, आत्मविश्वास और उद्देश्य की भावना को जगाया। नशा मुक्ति, जनसंख्या नियंत्रण, शिक्षा और विधिक अधिकारों जैसे मुद्दों पर आधारित यह शिविर आने वाले समय में समाज में सकारात्मक बदलाव लाने में सहायक सिद्ध होगा। समाज की हर बेटी यदि शिक्षित, जागरूक और सशक्त होगी, तो वह स्वयं में एक विधिक योद्धा होगी, जो न केवल अन्याय से लड़ेगी, बल्कि समाज को नया रास्ता भी दिखाएगी।

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