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आखिर कनिष्ठ आपूर्ति अधिकारी पीयूष शुक्ला की संपत्ति की जांच कब

 आखिर कनिष्ठ आपूर्ति अधिकारी पीयूष शुक्ला की संपत्ति की जांच कब



कटनी  |  सरकारी कुर्सी जनता की सेवा के लिए होती है, लेकिन जब वही कुर्सी सवालों के घेरे में आ जाए तो फिर जांच की मांग उठना स्वाभाविक है। इन दिनों क्षेत्र में कनिष्ठ आपूर्ति अधिकारी पीयूष शुक्ला की संपत्ति को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है। आमजन के बीच यह सवाल लगातार उठ रहा है कि आखिर नौकरी में आने से पहले उनकी आर्थिक स्थिति क्या थी और अब कितनी संपत्ति अर्जित हो चुकी है? यदि सब कुछ नियम और कानून के दायरे में है तो फिर पारदर्शिता से जांच कराने में हिचक कैसी? जनता का कहना है कि शासन की योजनाओं का लाभ गरीबों तक पहुंचाने वाले विभाग में बैठे अधिकारियों की जीवनशैली और बढ़ती संपत्ति पर समय-समय पर निगरानी होना बेहद जरूरी है। राशन व्यवस्था, खाद्यान्न वितरण और सार्वजनिक आपूर्ति प्रणाली सीधे गरीब और मध्यम वर्ग के जीवन से जुड़ी होती है। ऐसे में यदि किसी अधिकारी की संपत्ति अचानक चर्चा का विषय बन जाए तो सवाल उठना लाजिमी है। क्षेत्र में लोग खुलकर कह रहे हैं कि नौकरी से पहले आखिर पीयूष शुक्ला के पास कितनी जमीन, मकान, वाहन और बैंक बैलेंस था? और वर्तमान समय में उनकी चल-अचल संपत्ति कितनी है? क्या उनकी आय के ज्ञात स्रोतों से यह संपत्ति मेल खाती है या नहीं? यह जांच केवल एक व्यक्ति की नहीं बल्कि पूरे सिस्टम में पारदर्शिता कायम करने की कसौटी बन सकती है। जनता के बीच यह भी चर्चा है कि छोटे पद पर रहते हुए यदि आलीशान जीवनशैली दिखाई दे तो संदेह और गहरा जाता है। गांव की चौपालों से लेकर शहर की चाय दुकानों तक लोग यही चर्चा करते नजर आ रहे हैं कि शासन को इस मामले में निष्पक्ष जांच करानी चाहिए। यदि अधिकारी बेदाग हैं तो जांच से उनका सम्मान और बढ़ेगा, लेकिन यदि कहीं गड़बड़ी मिली तो यह भ्रष्टाचार पर बड़ा प्रहार साबित होगा। प्रदेश सरकार लगातार भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की बात करती रही है। मुख्यमंत्री से लेकर वरिष्ठ अधिकारी तक पारदर्शिता और ईमानदारी की दुहाई देते हैं। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि जिन अधिकारियों पर सवाल उठ रहे हैं, उनकी संपत्ति का सार्वजनिक और निष्पक्ष सत्यापन कराया जाए। जनता जानना चाहती है कि आखिर सरकारी नौकरी के कुछ वर्षों में संपत्ति का ग्राफ कैसे तेजी से बढ़ा? सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या विभागीय स्तर पर समय-समय पर संपत्ति का सत्यापन किया जाता है? यदि किया जाता है तो उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं होती? आखिर क्यों आम नागरिकों को सूचना के अधिकार का सहारा लेना पड़ता है? पारदर्शिता तभी मजबूत होगी जब अधिकारी खुद आगे आकर अपनी संपत्ति का विवरण सार्वजनिक करें।

यह मामला केवल एक अधिकारी तक सीमित नहीं है।जनता का मानना है कि हर विभाग में समय-समय पर अधिकारियों की संपत्ति की जांच होना चाहिए। क्योंकि भ्रष्टाचार की सबसे बड़ी जड़ तब पनपती है जब जवाबदेही खत्म हो जाती है। गरीबों के राशन पर राजनीति और घोटालों की खबरें पहले भी सामने आती रही हैं। ऐसे में आपूर्ति विभाग पर जनता की निगाहें हमेशा टिकी रहती हैं।अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस मांग को कितनी गंभीरता से लेता है। क्या निष्पक्ष जांच होगी? क्या नौकरी से पहले और वर्तमान संपत्ति का पूरा ब्यौरा सामने आएगा? या फिर मामला चर्चाओं तक ही सीमित रह जाएगा? फिलहाल जनता जवाब चाहती है, क्योंकि लोकतंत्र में सवाल पूछना जनता का अधिकार है और जवाब देना व्यवस्था की जिम्मेदारी।

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