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खरी-अखरी सवाल उठाते हैं पालकी नहीं धनखड़ को गेटआउट किया गया या फिर धनखड़ ने जस्टिस लोया बनने से पहले इस्तीफा दिया ?

 खरी-अखरी सवाल उठाते हैं पालकी नहीं

धनखड़ को गेटआउट किया गया या फिर धनखड़ ने जस्टिस लोया बनने से पहले इस्तीफा दिया ? 



उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के द्वारा अचानक और अप्रत्याशित तरीके से दिए गए इस्तीफे को लेकर पत्रकारों और राजनीतिक विश्लेषकों के बीच दो तरह की स्टोरी चल रही है। एक कहानी कहती है कि इस्तीफे का मजबून बनाकर धनखड़ के पास भेज कर दस्तखत कराये गये यानी देशी भाषा में कहा जाय तो उन्हें गेट आउट कर दिया गया तो दूसरी कहानी कहती है कि धनखड़ के इस्तीफे के पीछे खुद को वी वी गिरी बनाने की चाहत है। अब जिस तरह का बयान धनखड़ का सामने आया है कि वे न तो दिये गये इस्तीफे पर पुनर्विचार करेंगे ना ही विदाई भाषण देंगे। वह भी बता रहा है कि भीतर ही भीतर कुछ तो खिचड़ी पक रही है। इस बात पर भी चर्चा हो रही है कि क्या एडवोकेट जगदीप धनखड़ का इस्तीफा खुद को जस्टिस लोया होने से बचाने के लिए तो नहीं है और वे कुछ ही दिनों में सत्यपाल मलिक की भूमिका में तो दिखाई नहीं देंगे।


माननीय राष्ट्रपति जी, सेहत को प्राथमिकता देने और डाक्टर की सलाह को मानने के लिए मैं संविधान के अनुच्छेद 67(A) के अनुसार अपने पद से इस्तीफा दे रहा हूं। मैं भारत के राष्ट्रपति में गहरी कृतज्ञता प्रगट करता हूं। आपका समर्थन अडिग रहा। जिनके साथ मेरा कार्यकाल शांतिपूर्ण और बेहतरीन रहा। मैं माननीय प्रधानमंत्री और मंत्री परिषद के प्रति भी गहरी कृतज्ञता व्यक्त करता हूं। प्रधानमंत्री का सहयोग और अमूल्य समर्थन रहा है और मैंने अपने कार्यकाल के दौरान उनसे बहुत कुछ सीखा है। माननीय सांसदो से मुझे जो स्नेह, विश्वास और अपनापन मिला वह मेरी स्मृति में हमेशा रहेगा और मैं इस बात के लिए आभारी हूं कि मुझे इस महान लोकतंत्र में उपराष्ट्रपति के रूप में जो अनुभव और ज्ञान मिला वो अत्यंत मूल्यवान रहा। यह मेरे लिए सौभाग्य और संतोष की बात रही कि मैंने भारत के अभूतपूर्व आर्थिक प्रगति और इस परिवर्तनकारी युग में उसके तेज विकास को देखा और उसमें भागीदारी की। हमारे राष्ट्र के इस इतिहास के महत्वपूर्ण दौर में सेवा करना मेरे लिए सच्चे सम्मान की बात रही। आज जब मैं इस सम्माननीय पद को छोड़ रहा हूं, मेरे दिल में भारत की उपलब्धियों और शानदार भविष्य के लिए गर्व और अटूट विश्वास है। गहरी श्रद्धा और आभार के साथ जगदीप धनखड़। 


ये उस अंग्रेजी में लिखे इस्तीफा पत्र का तरजुमा हैं जो महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू को लिखा गया है। इस पत्र में इस्तीफे का कारण स्वास्थ्य बताया गया है और यह बात किसी भी खूंट से विश्वसनीय नहीं लगती है। यह ठीक है कि तकरीबन एक महीना पहले 25 जून को उत्तराखंड के नैनीताल में कुमाऊं युनिवर्सिटी के गोल्डन जुबली कार्यक्रम में बतौर चीफ गेस्ट रहे धनखड़ की तबीयत बिगड़ी थी। इसके पहले 9 मार्च को सीने में दर्द होने के कारण दिल्ली एम्स में 3 दिन भर्ती भी रहे। मगर 21 जुलाई को मानसून सत्र के पहले दिन उन्होने बकायदा सदन की कार्यवाही को संचालित किया। शाम को विपक्षी पार्टियों के नेताओं से मुलाकात भी की लेकिन रात को 9 बजे उपराष्ट्रपति कार्यालय के ट्यूटर अकाउंट पर अपलोड किये गये इस्तीफा पत्र से देश को जानकारी हुई कि देश के द्वितीय नागरिक जगदीप धनखड़ ने उपराष्ट्रपति पद से स्वास्थ्य कारणों के चलते इस्तीफा दे दिया है। मगर सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि उपराष्ट्रपति जैसे संवैधानिक पद पर बैठा हुआ व्यक्ति अस्वस्थता की वजह से पद त्याग करता है और राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, गृहमंत्री सहित एक की तरफ से भी संवेदना तक व्यक्त नहीं की गई। 


जबकि जगदीप धनखड़ ने मोदी सरकार का रक्षा कवच बनकर संवैधानिक मर्यादाओं को भी तार - तार करने में कोई कोताही नहीं बरती। भारत के इतिहास में जगदीप धनखड़ एक ऐसे उपराष्ट्रपति के रूप में याद किये जायेंगे जिन्होंने अपने कार्यकाल के बीच में इस्तीफा दिया है जबकि इसके पहले उपराष्ट्रपति ने या तो राष्ट्रपति चुन लिये जाने की वजह से इस्तीफा दिया था या फिर दुनिया को अलविदा कहने से कुर्सी खाली हुई थी। जगदीप धनखड़ को 6 अगस्त 2022 में उपराष्ट्रपति चुना गया था और उनका कार्यकाल 10 अगस्त 2027 तक था। जगदीप धनखड़ को उपराष्ट्रपति बनाने का निर्णय बीजेपी द्वारा उनके पश्चिम बंगाल के राज्यपाल रहते लिया गया था जहां उन्होंने ममता बनर्जी की सरकार की नाक में दम कर रखा था। राज्यसभा में सभापति की आसंदी पर बैठकर उन्होंने जिस सिद्दत के साथ मोदी सरकार पर आंच नहीं आने दी भले ही उसके लिए थोक के भाव विपक्षी सांसदों को सदन से निष्कासित करना पड़ा। जगदीप धनखड़ इस मामले में भी देश के इकलौते उपराष्ट्रपति के रूप में जाने जायेंगे जिन पर विपक्ष ने पक्षपात का आरोप लगाते हुए पद से हटाये जाने का नोटिस दिया था। मोदी सरकार का पक्ष लेते हुए उन्होंने न्यायपालिका से भी दो - दो हाथ करने से परहेज नहीं किया। जहां चीफ जस्टिस आफ इंडिया का कहना है कि संविधान सबसे ऊपर है वहीं धनखड़ ने कहा कि संसद तो संविधान से भी ऊपर है। जबकि ऐसा कहना न तो संवैधानिक मर्यादाओं के अनुकूल है न ही उपराष्ट्रपति को आधिकारिक इजाजत देता है। 


संसद के बाहर और भीतर 21 जुलाई और उससे पहले घटे घटनाक्रम पर एक नजर डाली जाय तो कुछ हद तक जगदीप धनखड़ के इस्तीफे के पीछे छिपे कारणों का अंदाजा लगाया जा सकता है। सत्र शुरू होने के पहले धनखड़ की विपक्षी पार्टियों के नेताओं से अंतरंग मुलाकात यहां तक कि इंडिया गठबंधन से पल्ला झाड़ने के बाद अरविंद केजरीवाल की जगदीप धनखड़ से हुई गुफ्तगूं। सत्र के दौरान पहले दिन ही विपक्षी नेता मल्लिकार्जुन खरगे को मोदी सरकार को कटघरे में खड़ा करने के लिए पूरा मौका देना इसके बाद बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा द्वारा सभापति के अधिकारों को हडपते हुए उपराष्ट्रपति और सभापति आसंदी की गरिमा और मर्यादा को रौंदना, संसद के भीतर अपने कार्यालय में बीजेपी के वरिष्ठ और प्रभावशाली नेताओं के साथ पीएम मोदी की मुलाकात, संसद के भीतर ही गृहमंत्री अमित शाह द्वारा अपने कार्यालय में एनडीए के मंत्रियों से आपात मुलाकात। 


क्या जगदीप धनखड़ को इत्मिनान हो गया है कि मोदी सरकार जल्द ही धराशायी होने वाली है और उन्होंने अपनी आगे की पारी खेलने की बिसात बिछाते हुए इस्तीफा दिया है ? क्या आने वाले वक्त में जगदीप धनखड़ सत्यपाल मलिक का किरदार निभाते हुए दिखाई देंगे और झुका हुआ जाट और टूटी हुई खाट की मरम्मत करेंगे ? कारण जगदीप धनखड़ की फितरत मैदान छोड़कर भागने वाली तो नहीं है। चलते - चलते आजादी के बाद से चुने हुए उपराष्ट्रपतियों पर एक नजर डाल ली जानी चाहिए। प्रथम उपराष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा करने के बाद राष्ट्रपति बने। जाकिर हुसैन भी कार्यकाल पूरा करने के बाद राष्ट्रपति चुने गए (1962-67)। वी वी गिरी की गद्दी जरूर गई मगर बाद में वे राष्ट्रपति बने (1976-69)। गोपाल स्वरूप पाठक (1969-74), बी डी जत्ती (1974-79), मोहम्मद हिदायुतउल्ला (1979-84), रामास्वामी वेंकटरमन (1984-87) उसके बाद राष्ट्रपति बन गये, शंकर दयाल शर्मा (1987-92), के आर नारायणन (1992-97), कृष्णकांत (1997-2002) (कार्यकाल पूरा होने के बीच ही निधन हो गया था), भैरोंसिंह शेखावत (2002-07), मोहम्मद हाफिज अंसारी (2007-2017) (लगातार दो कार्यकाल पूरा किया), वैंकैया नायडू (2017-22) और उसके बाद जगदीप धनखड़ 2022 - 21 जुलाई 2025 - (रहना था 2027 तक क्या मोदी द्वारा राष्ट्रपति नहीं बनाये जाने की नियत भांप गए थे धनखड़)।


अश्वनी बडगैया अधिवक्ता 

स्वतंत्र पत्रकार

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