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प्राचार्य रतन भलावे की कार्यप्रणाली पर खड़े हों रहे सवाल बच्ची को तिलक लगाने पर टीसी देने की बात कहीं होना चाहिए प्राचार्य रतन भलावे पर कार्यवाही , ढीमरखेड़ा जनपद शिक्षा केंद्र के मुरवारी का मामला

 प्राचार्य रतन भलावे की कार्यप्रणाली पर खड़े हों रहे सवाल बच्ची को तिलक लगाने पर टीसी देने की बात कहीं होना चाहिए प्राचार्य रतन भलावे पर कार्यवाही , ढीमरखेड़ा जनपद शिक्षा केंद्र के मुरवारी का मामला 



ढीमरखेड़ा |  भारत एक धर्मनिष्ठ देश है, जहां आस्था और शिक्षा दोनों को समान रूप से महत्व दिया जाता है। विशेषकर श्रावण माह में भगवान शिव की भक्ति पूरे देश में जोरों पर होती है। लोग श्रद्धा से मंदिर जाते हैं, पूजा करते हैं और माथे पर तिलक या चंदन का टीका लगाकर ईश्वर को स्मरण करते हैं। यही आस्था जब किसी सार्वजनिक संस्था में विवाद का कारण बन जाए, तब समाज में गंभीर प्रश्न उठते हैं क्या धार्मिक प्रतीकों के प्रदर्शन की अनुमति स्कूलों में नहीं होनी चाहिए? क्या यह किसी की व्यक्तिगत पहचान या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश नहीं है? इसी संदर्भ में ढीमरखेड़ा जनपद शिक्षा केंद्र अंतर्गत मुरवारी गांव के शासकीय आर.के. गौतम हायर सेकेंडरी स्कूल में एक बेहद चिंताजनक घटना सामने आई है। कक्षा 11वीं की छात्रा किरण बख्शी ने श्रावण के पावन माह में चंदन का तिलक लगाकर स्कूल पहुंची, तो स्कूल के प्राचार्य रतन भलावे ने न केवल उसे डांटा, बल्कि तिलक मिटवा दिया और टीसी देने की धमकी तक दे डाली। यह घटना न केवल स्थानीय ग्रामीणों में आक्रोश का कारण बनी, बल्कि पूरे समाज को सोचने पर विवश कर गई कि क्या हम अपने ही मूल्यों से दूर हो रहे हैं? किरण बख्शी, जो कि एक सामान्य ग्रामीण पृष्ठभूमि की प्रतिभाशाली छात्रा है, अपने माथे पर परंपरागत रूप से चंदन का तिलक लगाए विद्यालय पहुंची। यह तिलक उसने श्रावण मास में की गई पूजन-आरती के बाद लगाया था। जब वह विद्यालय के प्रांगण में पहुंची, तभी विद्यालय के प्राचार्य रतन भलावे की नज़र उस पर पड़ी। उन्होंने सार्वजनिक रूप से छात्रा को रोका और तिलक को लेकर आपत्ति जताई।प्राचार्य ने तीखी भाषा में कहा “यह मंदिर नहीं है, यह कोई आश्रम नहीं है जहाँ तुम तिलक लगाकर आओ। इस स्कूल में धार्मिक प्रतीकों की कोई जगह नहीं है।” इतना कहकर उन्होंने छात्रा से तिलक तुरंत मिटाने को कहा और धमकी दी कि यदि भविष्य में ऐसा दोबारा हुआ, तो उसे स्कूल से निकाला जाएगा। यही नहीं, उन्होंने कहा “कल अपने माता-पिता को लेकर आओ और टीसी ले जाओ, फिर आश्रम में एडमिशन करा लेना।” यह बात सुनकर छात्रा बुरी तरह टूट गई, वह फफककर रो पड़ी और घर जाकर अपने माता-पिता को पूरी घटना बताई। यह सुनते ही माता-पिता और गांव के लोग आक्रोशित हो गए और विद्यालय पहुँचकर प्राचार्य से जवाबतलबी की।

*ग्रामीणों और अभिभावकों का विरोध*

जैसे ही यह खबर मुरवारी गांव में फैली, ग्रामीणों में रोष व्याप्त हो गया। विद्यालय पहुंचे परिजनों और ग्रामीणों ने स्पष्ट रूप से पूछा कि क्या तिलक लगाना अब अपराध है? क्या एक छात्रा को उसकी धार्मिक पहचान के लिए प्रताड़ित किया जा सकता है?ग्रामीणों ने कहा, “श्रावण मास में शिवभक्ति और तिलक हमारी संस्कृति का हिस्सा है। यह देश संविधान से चलता है, लेकिन हमारी संस्कृति भी उसका आधार है।” अभिभावकों ने जिला प्रशासन से इस मामले में उचित कार्रवाई की मांग की। उन्होंने कहा कि किसी भी शिक्षक या प्राचार्य को यह अधिकार नहीं है कि वह बच्चों की धार्मिक भावनाओं का अपमान करे।

*प्राचार्य रतन भलावे के कथन की आलोचना*

प्राचार्य रतन भलावे का कथन “स्कूल से एक बच्ची जाएगी तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा” एक शिक्षाविद के लिए न केवल अशोभनीय है, बल्कि शिक्षा की मूल भावना के खिलाफ भी है। यह बात शिक्षा के समावेशी दृष्टिकोण और छात्र-छात्राओं के हित में बनाए गए मूल्यों की अवहेलना है। शिक्षक का कार्य बच्चों को शिक्षा देना, उन्हें प्रेरित करना, मार्गदर्शन करना होता है ना कि उन्हें अपमानित कर बाहर का रास्ता दिखाना। प्राचार्य की यह बात एक पूरे समुदाय, विशेषकर ग्रामीण समाज के आत्मसम्मान पर चोट है, जो वर्षों से शिक्षा को अपनी प्राथमिकता बनाकर सामाजिक प्रगति की दिशा में कार्य कर रहा है।

*धार्मिक पहचान बनाम शैक्षणिक अनुशासन*

प्राचार्य रतन भलावे का तर्क यह हो सकता है कि विद्यालय एक धर्मनिरपेक्ष संस्था है और वहाँ धार्मिक प्रतीकों को अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। लेकिन यहाँ यह प्रश्न खड़ा होता है कि क्या एक साधारण चंदन तिलक, जो एक छात्रा ने अपनी श्रद्धा के कारण लगाया, इतना बड़ा उल्लंघन है कि उसे स्कूल से निकालने की धमकी दी जाए? संविधान के अनुच्छेद 25 के अंतर्गत भारत में प्रत्येक नागरिक को धर्म की स्वतंत्रता प्राप्त है। यदि वह स्वतंत्रता स्कूल या कॉलेज में सीमित कर दी जाती है, तो क्या यह छात्र की पहचान के साथ अन्याय नहीं है?

*मनोवैज्ञानिक प्रभाव और बाल अधिकारों का उल्लंघन*

छात्रा किरण बख्शी एक किशोरी है, जो अभी अपने व्यक्तित्व को गढ़ रही है। इस प्रकार की सार्वजनिक फटकार और अपमान से उसके आत्मसम्मान को गहरी चोट पहुंची है। वह भावनात्मक रूप से आहत हुई और रोते हुए विद्यालय से घर लौटी। यह घटना न केवल शिक्षा की गरिमा को ठेस पहुंचाती है, बल्कि बाल अधिकारों के भी खिलाफ है। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) के दिशा-निर्देश स्पष्ट रूप से कहते हैं कि किसी भी छात्र को उसके धार्मिक विश्वास, पहनावे या रीति-रिवाजों को लेकर प्रताड़ित नहीं किया जा सकता।

टिप्पणियाँ

  1. जब किसी एक धर्म के बच्चे को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार है और यह संविधान में भी वर्णित है, इसलिए धार्मिक स्वतंत्रता उसको मिलनी चाहिए, किन्तु जब वही छात्र किसी दूसरे धर्म से हो तो कुछ जातिवादी, वर्गवादी, धर्मवादी मानसिक कुप्रवृत्तियों के लोगों को दूसरे धर्म के बच्चों की धार्मिक स्वतंत्रता नहीं दिखती ।एक नीति की बात कही जाए तो किसी भी शैक्षिक संस्थानों में किसी भी धर्म का कोई स्थान नहीं है,वह शैक्षिक संस्था है, इसलिए धर्म की आस्था के लिए मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारा, गिरजाघर आदि हैं जहां जाकर अपनी भक्ति कर सकते हैं। आप पत्रकार एवं सम्पादक हैं शायद आपको जानकारी नहीं है, कितने ही स्कूलों में जाति , धर्म, वर्ग के आधार पर जातिवादी मानसिक कुप्रवृत्तियों के शिक्षकों ने छात्र-छात्राओं की हत्याएं तक कर डाली हैं तो यह कैसा धर्म, वर्ग एवं जाति है जिसके कारण हत्याएं तक शिक्षक कर देते हैं,जो बिल्कुल भी सही नहीं है, यही मुस्लिम वर्ग के छात्र टोपी एवं हिजाब पहन कर आएं तो फिर धार्मिक स्वतंत्रता का जिक्र नहीं करोगे, क्योंकि उन्हें शैक्षिक संस्था में इसकी अनुमति नहीं है और पूरा एक विशेष जाति एवं धर्म समुदाय का समाज विरोध करेगा, तब उस छात्र की धार्मिक स्वतंत्रता का हनन नहीं होगा। मैं किसी धर्म का विरोधी नहीं हूं क्योंकि यह बहुत गम्भीर विषय हैं, जो लोगों की आस्था से जुड़ा है, जिसके बारे में ज्यादा कुछ नहीं कह सकता, परन्तु शैक्षिक संस्थानों में धार्मिक अनुष्ठानों को प्रतिबंधित किया जाना चाहिए, क्योंकि इनमें सभी धर्मों के छात्र अध्ययन करतें हैं, ऐसा मेरा मानना है,बाकी लोगों की जो इच्छा हो मैं उसके बारे में नहीं कह सकता।

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