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भनपुरा 1 ग्राम पंचायत में बिना सरपंच के सील - साइन के हुए बिल पास क्या पंचायत सचिव राजेश पटैल सरकारी धन का कर रहे दुरुपयोग?

 भनपुरा 1 ग्राम पंचायत में बिना सरपंच के सील - साइन के हुए बिल पास क्या पंचायत सचिव राजेश पटैल सरकारी धन का कर रहे दुरुपयोग?



ढीमरखेड़ा |  मध्यप्रदेश के कटनी जिले की जनपद पंचायत अंतर्गत आने वाली भनपुरा 1 ग्राम पंचायत इन दिनों एक बड़े विवाद और भ्रष्टाचार के आरोपों के घेरे में आ गई है। यहां के पंचायत सचिव राजेश पटैल पर यह आरोप लगे हैं कि उन्होंने सरपंच कांता बाई कोल की जानकारी और सहमति के बिना लाखों रुपये के बिल पास करवाकर शासकीय राशि की निकासी कर डाली। इस पूरे मामले में गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं कि क्या यह कार्यवाही योजनाबद्ध तरीके से की गई एक फर्जीवाड़ा है, और क्या इसके पीछे अधिकारियों की मिलीभगत है? सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार भनपुरा 1 ग्राम पंचायत में विकास कार्यों और निर्माण योजनाओं के नाम पर लाखों रुपये की राशि पंचायत के खाते से निकाली गई है। लेकिन जब इन कार्यों से संबंधित बिलों की पड़ताल की गई तो यह पाया गया कि अधिकतर बिलों पर न तो पंचायत सचिव राजेश पटैल के हस्ताक्षर हैं और न ही ग्राम पंचायत की निर्वाचित सरपंच कांता बाई कोल के सील-साइन। यह एक अत्यंत गंभीर प्रशासनिक लापरवाही ही नहीं, बल्कि स्पष्ट रूप से भ्रष्टाचार की ओर संकेत करता है।

 *सरपंच की अनपढ़ता सचिव को मिली छूट?*

भनपुरा 1 की वर्तमान सरपंच कांता बाई कोल एक ग्रामीण महिला हैं और अनपढ़ हैं। उनकी अनपढ़ता का फायदा उठाते हुए पंचायत सचिव राजेश पटैल पर आरोप है कि वह मनमाने ढंग से बिल बनवा रहे हैं, भुगतान करवा रहे हैं और कार्यों को बिना किसी निगरानी के पूरा (या अधूरा) दिखाकर शासकीय राशि निकाल रहे हैं। यह स्थिति केवल ग्राम पंचायत भनपुरा 1 तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संपूर्ण व्यवस्था में व्याप्त उस बीमारी को दर्शाती है जिसमें अधिकारी वर्ग निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को मूर्ख बनाकर अपनी जेब भरते हैं।

*बिना सील-साइन वाले बिल क्यों पास हुए?*

प्रश्न उठता है कि अगर बिलों पर सरपंच या सचिव की अधिकृत मुहर और हस्ताक्षर नहीं हैं, तो फिर वे किस आधार पर पास किए गए? जनपद पंचायत के अधिकारी, लेखा विभाग, और खंड स्तरीय तकनीकी सहायक सभी इस निकासी प्रक्रिया में शामिल होते हैं। ऐसे में क्या यह निकासी अकेले सचिव राजेश पटैल द्वारा संभव है? संभवतः नहीं। यह एक संगठित भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है जिसमें जिम्मेदार अधिकारी या तो आंखें मूंदे बैठे हैं या फिर इस गड़बड़ी में उनकी भी हिस्सेदारी है।

 *जिम्मेदार अधिकारी क्या कर रहे हैं?*

जब किसी पंचायत में इस प्रकार की गड़बड़ी होती है तो सबसे पहले इसकी जिम्मेदारी जनपद पंचायत सीईओ, सहायक यंत्री, उपयंत्री, और तकनीकी सहायक की होती है। इन सभी की यह नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी है कि वे कार्यों की गुणवत्ता जांचें, बिलों का सत्यापन करें और सुनिश्चित करें कि राशि का दुरुपयोग न हो। अगर भनपुरा 1 के मामले में ऐसा नहीं हुआ, तो जांच केवल सचिव राजेश पटैल तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उन सभी अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में आनी चाहिए जिन्होंने यह गड़बड़ी अनदेखी की।

*ग्रामीणों का आक्रोश*

स्थानीय ग्रामीणों में इस पूरे मामले को लेकर आक्रोश है। उनका कहना है कि पंचायत में अगर विकास कार्यों के नाम पर लाखों रुपये की निकासी हो रही है, तो फिर गांव की स्थिति इतनी दयनीय क्यों है? सड़कें टूटी हुई हैं, स्ट्रीट लाइटें बंद हैं, नालियां गंदगी से भरी हुई हैं, और सफाईकर्मी नियमित काम पर नहीं आते। फिर ये पैसे कहां जा रहे हैं?

*न्यायिक और प्रशासनिक कार्रवाई की मांग*

इस पूरे मामले की निष्पक्ष और गहन जांच आवश्यक है। संबंधित अधिकारियों के खिलाफ FIR दर्ज होनी चाहिए और EOW (Economic Offenses Wing) या लोकायुक्त से जांच करवाई जानी चाहिए। यदि यह सिद्ध होता है कि राशि का दुरुपयोग हुआ है, तो दोषियों से वसूली की जाए, उनकी सेवा समाप्त की जाए और आपराधिक मामला दर्ज हो।

*अनपढ़ जनप्रतिनिधि एक बड़ी चिंता*

भनपुरा 1 की सरपंच कांता बाई कोल की अनपढ़ता और सचिव पर निर्भरता यह दिखाती है कि कैसे हमारे लोकतंत्र की सबसे निचली इकाई में नेतृत्व कर रहे लोग अक्सर प्रशासनिक प्रक्रिया की जानकारी के अभाव में अधिकारियों की कठपुतली बन जाते हैं। क्या यह समय नहीं है कि ग्राम पंचायत प्रतिनिधियों को शपथ ग्रहण के बाद एक प्रशिक्षण अनिवार्य रूप से दिया जाए, जिससे वे ऐसी धोखाधड़ी को समझ सकें और मुकाबला कर सकें?

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