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अश्लीलता हमारी अपनी खोज हैं ईश्वर की नहीं, अगर ईश्वर की होती तो वह हमे कपड़े पहनाकर पैदा करता, इन तीन चेहरों पर ही सारा कुंभ खत्म कर दिया ,क्या तन की खूबसूरती ,आंखों की खूबसूरती एक उच्च शिक्षित व्यक्ति का बाबा बनना क्या यही कुंभ की महत्ता

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ढीमरखेड़ा | कुंभ मेला, जो भारतीय संस्कृति और अध्यात्म का प्रतीक है, एक ऐसी महाकुंभ यात्रा है जो हर 12 वर्ष में होती है। यह एक दिव्य अवसर है, जहाँ लाखों लोग एकत्रित होते हैं, अपनी आत्मा को शुद्ध करने और परमात्मा से मिलने के लिए। लेकिन हाल ही में, इस विशाल धार्मिक आयोजन का जो चित्र मीडिया ने प्रस्तुत किया है, वह न केवल अत्यधिक शोरगुल और विकृत है, बल्कि इसने कुंभ की असली महत्ता और उद्देश्य को भी नजरअंदाज किया है। मीडिया ने अश्लीलता और यौन आकर्षण को प्राथमिकता दी, जबकि कुंभ का वास्तविक उद्देश्य आत्म-ज्ञान, धार्मिक जागरूकता और ध्यान की ओर मार्गदर्शन करना था। कुंभ मेला एक सांस्कृतिक और धार्मिक घटना से कहीं अधिक है। यह आध्यात्मिक यात्रा का प्रतीक है। भारतीय सनातन धर्म में, यह मान्यता है कि कुंभ में स्नान करने से सारे पाप धुल जाते हैं और व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह पुण्य और शुद्धि का अवसर होता है, जहां व्यक्ति अपने जीवन को पुनः परिभाषित करता है और ईश्वर से साक्षात्कार करता है। लेकिन आजकल, इस अवसर को केवल प्रदर्शन और दिखावे के रूप में देखा जा रहा है। जो खोज हमें अपने अंदर करनी चाहिए थी, वही हम बाहर की दुनिया में ढूंढ रहे हैं। कुंभ मेला एक जटिल प्रक्रिया है, जो मानसिक, शारीरिक और आत्मिक शुद्धि की ओर मार्गदर्शन करता है।

 *मीडिया और उसकी भूमिका*

मीडिया ने कुंभ मेले को एक दृश्य माध्यम बना दिया है, जहां सबसे ज्यादा आकर्षण अश्लीलता और बाहरी आकर्षण पर है। यदि हम इन तीन चेहरों की बात करें, जिन पर मीडिया ने सबसे ज्यादा ध्यान केंद्रित किया, तो हम देखते हैं कि इनमें से कुछ महात्मा और संत, जो अपने ज्ञान और साधना से संसार को आलोकित कर सकते थे, उन्हें मीडिया ने सिर्फ उनके बाहरी रूप, रूप-रंग और उनके पहनावे के आधार पर चित्रित किया। यह कुंभ की महत्ता को नुकसान पहुंचाने वाला कदम था। हमने कुंभ को एक महात्मा के जीवन से जोड़ने की बजाय, उसे एक प्रदर्शन का रूप दे दिया है। एक उच्च शिक्षित व्यक्ति का बाबा बनना, या तन की सुंदरता और आंखों की सुंदरता को महत्त्व देना, क्या यही कुंभ का उद्देश्य था? क्या इससे हमें आत्म-ज्ञान या धर्म के वास्तविक अर्थ को समझने का कोई अवसर मिला?

 *आत्म-ज्ञान की खोज*

कुंभ मेला हमें अपने अंदर की दुनिया को समझने और अपने आत्म को शुद्ध करने का अवसर देता है। इस अद्भुत आयोजन में, हम न केवल बाहरी शारीरिक शुद्धि की बात करते हैं, बल्कि आत्मिक शुद्धि और मानसिक संतुलन की भी आवश्यकता होती है। जहाँ एक ओर हमें महान संतों और गुरुओं से शिक्षा प्राप्त करनी चाहिए थी, वहीं हमने उसे एक आकर्षण का विषय बना दिया है। हमने कुंभ मेले को केवल एक भीड़-भाड़ वाला आयोजन बना दिया है, जहां धार्मिक और आध्यात्मिक ज्ञान की कमी है। यह सत्य है कि मीडिया का दोष है, लेकिन क्या हम खुद अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो सकते हैं? हमने इस महान अवसर को हंसी-ठहाकों और चर्चा के आधार पर नष्ट कर दिया, जहां हमें आंतरिक शांति, संतुलन और आत्मज्ञान की प्राप्ति करनी चाहिए थी।

*समुचित चर्चा और संजीवनी*

अगर हम सचमुच कुंभ की असली महत्ता को समझना चाहते हैं, तो हमें इस विषय पर गंभीरता से चर्चा करनी चाहिए। इस आयोजन को केवल एक धार्मिक उत्सव के रूप में नहीं देखना चाहिए, बल्कि इसे जीवन के सबसे महत्वपूर्ण अवसर के रूप में देखना चाहिए, जहां हम अपनी आत्मा को शुद्ध कर सकते हैं। कुंभ मेला हमें एक यथार्थवादी दृष्टिकोण और आंतरिक शांति की प्राप्ति का अवसर देता है।कुंभ मेला एक अध्यात्मिक यात्रा है, जहां हमें अपने अंदर झांकने और सच्चाई को खोजने का मौका मिलता है। यह हमारे जीवन को नया मोड़ दे सकता है, बशर्ते हम इसे सही दृष्टिकोण से देखें। हमें अपने सनातनी धर्म की महत्ता को समझने की आवश्यकता है, और इसे केवल एक प्रदर्शनी के रूप में न देख कर इसे एक गहरे और समर्पित अनुष्ठान के रूप में अपनाना चाहिए। कुंभ मेला केवल एक धार्मिक मेला नहीं है, बल्कि यह जीवन की सच्चाई, आत्मा की शुद्धि और आत्मज्ञान की खोज का प्रतीक है। हमें इसे एक आत्मिक यात्रा के रूप में देखना चाहिए, न कि एक मनोरंजन या प्रदर्शन के रूप में। यह समय है कि हम अपने ध्यान और उद्देश्य को सही दिशा में लगाएं और कुंभ मेला जैसे महान अवसर का सही उपयोग करें। हमें इस आयोजन का पूरा लाभ उठाने के लिए अपने अंदर की सच्चाई को पहचानने की आवश्यकता है।

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