सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

खरी-अखरी सवाल उठाते हैं पालकी नहीं अपनी विश्वसनीयता खो रहीं अदालतें सर्वोच्च न्यायालय से बेपरवाह दिखते हैं निचले न्यायालय

 खरी-अखरी सवाल उठाते हैं पालकी नहीं

अपनी विश्वसनीयता खो रहीं अदालतें

सर्वोच्च न्यायालय से बेपरवाह दिखते हैं निचले न्यायालय



अफलातून का कथन आज भी कालजयी शास्वत सत्य है कि कानून के जाल में छोटी मछलियां फंसती हैं मगरमच्छ नहीं, वे जाल फाड़ कर बाहर निकल आते हैं। कानून सबके लिए बराबर है यह दुनिया का सबसे बड़ा झूठ है। छोटी अदालतों से लेकर सर्वोच्च अदालत द्वारा समय-समय पर दिए गए फैसले भी इस पर अपनी मुहर लगाते दिखाई देते हैं। आजकल तो हाईकोर्ट और निचले कोर्ट के जजों के लिए सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्तियों के दिशा निर्देश ठीक उसी तरह दिखते हैं जैसे" भैंस के आगे बीन बजाओ भैंस पड़ी पगुराय" । सुप्रीम कोर्ट के कई न्यायमूर्तियों ने यहां तक कि सीजेआई ने अनेकों बार कहा है कि "जमानत नियम है, जेल अपवाद"। मगर देखने में आता है कि हाईकोर्ट और निचली अदालतें सुप्रीम कोर्ट के इस कहे को एक कान से सुनकर दूसरे कान से बाहर निकाल देती हैं या कह सकते हैं कि वे वरिष्ठ अदालत के कहे को अपने ठेंगे पर रखती हैं। जेलों में बंद विचाराधीन कैदियों का अनुपात तकरीबन 4:1 का है। जिसमें सामान्य से लेकर संगीन धाराओं में बंद कैदी हैं। जो जमानत के लिए अदालतों में एड़ियां रगड़ रहे हैं मगर उन्हें जमानत नहीं दी जा रही है। वहीं हत्या और बलात्कार में सजा काट रहे अपराधियों को पैरोल और फर्लो के नाम पर बाहर भेजा जा रहा है। जिसका सबसे बड़ा सबूत है हत्या और बलात्कार के जुर्म में आजीवन कारावास की सजा काट रहा बाबा राम रहीम। जिसे पिछले सात सालों में दस बार पैरोल और फर्लो के नाम पर रिहा किया गया है। खास बात यह है कि इस हत्यारे व बलात्कारी को पैरोल व फर्लो पर रिहा तब किया जाता है जब दिल्ली, यूपी, पंजाब, हरियाणा जैसे राज्यों में चुनाव होने वाले होते हैं। जिससे वह अपने रसूख वाले इलाके में मतदाताओं पर अपने रसूख का प्रभाव डाल कर सत्तापक्ष (भारतीय जनता पार्टी) के पक्ष में वोटों का ध्रुवीकरण करा सके ! हाल ही में चंद रोज पहले बाबा राम रहीम को फर्लो में रिहा किया गया है। प्रासंगिक है कि उसके बाहर आते ही केंचुआ द्वारा हरियाणा में विधानसभा चुनाव कराने की घोषणा कर दी गई। अब इसे संयोग या प्रयोग श्रेणी से हटाकर प्रायोजित श्रेणी में रखा जाना चाहिए। हाल ही में एक और दुष्कर्मी बाबा आशाराम को इलाज कराने के नाम पर पैरोल दी गई है। देखा जा रहा है कि देशभर के हाईकोर्ट और निचली अदालतें "जमानत नियम - जेल अपवाद" के उलट "जेल नियम - जमानत अपवाद" पर काम कर रही हैं, मगर हत्या - बलात्कार के सजायाफ्ताओं को पैरोल/फर्लो पर रिहा करने में अत्याधिक उदारवादी दिखती हैं, खासतौर पर तब जब वह दुष्कर्मी असरदार व्यक्ति हो और सत्ता पक्ष को फायदा पहुंचाने का माद्दा रखता हो। न्यायालयों पर ऊंगली इसलिए भी उठाया जाना प्रासंगिक कहा जा सकता है कि बहुमत से चुने गए मुख्यमंत्री, मंत्री, सामाजिक कार्यकर्ता, डाक्टर, छात्र नेता वर्षों - महीनों से जमानत के अभाव में जेल में बंद हैं। कानून की बारिकियों से अनजान व्यक्ति भी इतना तो समझ ही रहा है कि जेल में बंद मुख्यमंत्री, मंत्री, डाक्टर, सामाजिक कार्यकर्ता, छात्र नेताओं की जमानत अर्जियां इसलिए खारिज कर दी जा रही हैं कि वे सत्ता पक्ष के लिए चुनौतियां पेश कर रहे हैं। यह भी कह सकते हैं कि हाईकोर्ट और निचली अदालतें राज्य सरकार के ईशारे पर कठपुतलियों की तरह काम कर रही हैं। जिन राज्यों में गैर भाजपाई सरकारें हैं वहां पर भी हाईकोर्ट और निचली अदालतों के कुछ जजेज के फैसलों में पार्टी विशेष की मानसिकता का असर दिखाई देता है और इसे बल तब मिलता है जब वे जजेज अधिवार्षिकी पूरी कर या बीच में ही पद त्याग कर दल विशेष को ज्वाइन कर लेते हैं। कह सकते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति भी इस मानसिकता से अछूते नहीं हैं (जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस अरुण मिश्रा आदि) ।  सत्तापक्ष से जुड़े दुष्कर्मियों के प्रति सरकारों सहित हाईकोर्ट और निचली अदालतों द्वारा बरती जा रही उदारता को लेकर सुप्रीम कोर्ट के माथे पर चिंता की गहरी लकीरें साफ दिखाई दे रही है। हाल ही में आम आदमी पार्टी (आप) नेता मनीष सिसोदिया को जमानत पर रिहा करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एकबार फिर से इसी चिंता का जिक्र किया है। सीजेआई डीवाई चंद्रचूड तो प्रायः अपने हर भाषण में इस बात पर जोर देते रहते हैं कि हाईकोर्ट और निचली अदालतों के जजेज को ईमानदारी के साथ न्याय-शास्त्रीय व्याकरण को अंगीकार करने की जरूरत है।


*अश्वनी बडगैया अधिवक्ता* 

_स्वतंत्र पत्रकार_

टिप्पणियाँ

popular post

ढीमरखेड़ा के दूरस्थ आधा दर्जन से अधिक गांव पहुंचकर जिला पंचायत सीईओ ने निर्माण एवं विकास कार्यों की नब्ज़ टटोलेते हुए परखी गुणवत्ता, सुश्री कौर ने अच्छे साइट सिलेक्शन की सराहना कर पीठ थपथपाई तो कहीं नाराजगी भी जताई, निर्धारित समयावधि में कार्यों को गुणवत्ता के साथ पूर्ण कराने अधिकारियों को दिए निर्देश

 ढीमरखेड़ा के दूरस्थ आधा दर्जन से अधिक गांव पहुंचकर जिला पंचायत सीईओ ने निर्माण एवं विकास कार्यों की नब्ज़ टटोलेते हुए परखी गुणवत्ता, सुश्री कौर ने अच्छे साइट सिलेक्शन की सराहना कर पीठ थपथपाई तो कहीं नाराजगी भी जताई, निर्धारित समयावधि में कार्यों को गुणवत्ता के साथ पूर्ण कराने अधिकारियों को दिए निर्देश कटनी | भीषण गर्मी, तपती दोपहरी का वक्त,सकरी मेढ़ें, कटीली झाड़ियों और खेतों के बीच पगडंडी मार्ग से ऊबड़ खाबड़ पथरीली राहों में पसीने से तरबतर जिला पंचायत सीईओ सुश्री हरसिमरनप्रीत कौर ने ढाई से तीन किलोमीटर पैदल चलकर विकासखंड ढीमरखेड़ा के दूरस्थ आधा दर्जन से अधिक गांवों में निर्माण एवं विकास कार्यों की नब्ज़ टटोली। इस दौरान उन्होंने ढीमरखेड़ा, कोठी, झिन्ना पिपरिया, भमका, खमतरा पहरुआ एवं अन्य गांव पहुंचकर, नवीन स्वीकृत जनपद पंचायत भवन निर्माण कार्य स्थल,गेहूं खरीदी केंद्र, जल गंगा संवर्धन अभियान के अंतर्गत खेत तालाब, डगवेल, आंगनवाड़ी भवन एवं शासकीय हायर सेकेंडरी स्कूल में लैब एवं अतिरिक्त कक्ष निर्माणाधीन कार्यों की गुणवत्ता को परखा और प्रगति की जानकारी ली। इस दौरान उन्होंने ढीमरखेड़ा म...

आखिर कनिष्ठ आपूर्ति अधिकारी पीयूष शुक्ला की संपत्ति की जांच कब

 आखिर कनिष्ठ आपूर्ति अधिकारी पीयूष शुक्ला की संपत्ति की जांच कब कटनी  |  सरकारी कुर्सी जनता की सेवा के लिए होती है, लेकिन जब वही कुर्सी सवालों के घेरे में आ जाए तो फिर जांच की मांग उठना स्वाभाविक है। इन दिनों क्षेत्र में कनिष्ठ आपूर्ति अधिकारी पीयूष शुक्ला की संपत्ति को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है। आमजन के बीच यह सवाल लगातार उठ रहा है कि आखिर नौकरी में आने से पहले उनकी आर्थिक स्थिति क्या थी और अब कितनी संपत्ति अर्जित हो चुकी है? यदि सब कुछ नियम और कानून के दायरे में है तो फिर पारदर्शिता से जांच कराने में हिचक कैसी? जनता का कहना है कि शासन की योजनाओं का लाभ गरीबों तक पहुंचाने वाले विभाग में बैठे अधिकारियों की जीवनशैली और बढ़ती संपत्ति पर समय-समय पर निगरानी होना बेहद जरूरी है। राशन व्यवस्था, खाद्यान्न वितरण और सार्वजनिक आपूर्ति प्रणाली सीधे गरीब और मध्यम वर्ग के जीवन से जुड़ी होती है। ऐसे में यदि किसी अधिकारी की संपत्ति अचानक चर्चा का विषय बन जाए तो सवाल उठना लाजिमी है। क्षेत्र में लोग खुलकर कह रहे हैं कि नौकरी से पहले आखिर पीयूष शुक्ला के पास कितनी जमीन, मकान, वाहन और बै...

जनपद अध्यक्ष सुनीता संतोष दुबे ने किया 10 लाख रुपये के विकास कार्यों का भूमि पूजन

 जनपद अध्यक्ष सुनीता संतोष दुबे ने किया 10 लाख रुपये के विकास कार्यों का भूमि पूजन ढीमरखेड़ा ।  जनपद पंचायत ढीमरखेड़ा की जनपद अध्यक्ष सुनीता संतोष दुबे द्वारा ग्राम बिछिया एवं धनवाही में कुल 10 लाख रुपये लागत के विकास कार्यों का विधि-विधान के साथ भूमि पूजन किया गया। भूमि पूजन कार्यक्रम में ग्रामीणों एवं जनप्रतिनिधियों की उत्साहपूर्ण सहभागिता देखने को मिली।कार्यक्रम के दौरान ग्राम बिछिया में 6 लाख रुपये की लागत से बनने वाले सांस्कृतिक भवन निर्माण कार्य का शुभारंभ किया गया। वहीं ग्राम धनवाही में मुख्य मार्ग से पंकज सिंह के घर की ओर 4 लाख रुपये की लागत से बनने वाले ड्रेनेज निर्माण कार्य का भूमि पूजन संपन्न हुआ। इस अवसर पर अनिरुद्ध पांडेय, त्रिवेणी ज्योतिषी, सत्यनारायण पांडेय, ओमप्रकाश गर्ग, रामप्रसाद, मुरारीलाल, सरपंच संजय दाहिया, उपसरपंच विराट पाण्डेय, सचिव, रोजगार सहायक सहित बड़ी संख्या में ग्रामीणजन उपस्थित रहे।कार्यक्रम में उपस्थित ग्रामीणों एवं जनप्रतिनिधियों ने क्षेत्र में हो रहे विकास कार्यों के लिए जनपद अध्यक्ष सुनीता संतोष दुबे का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इन निर्माण क...